छत्तीसगढ़ में ई-नीलामी के बाद भी रेत सिंडिकेट का कब्जा, नेता भी शामिल
समझें क्या है पूरा मामला
छत्तीसगढ़ के रेत घाटों पर वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई है। घाटों के संचालन को लेकर लगातार हिंसक झड़पें हो रही हैं। रसूखदार लोग अपने समर्थकों के नाम पर आवेदन डालते हैं। इसके बाद मिलकर एक बड़ा अवैध सिंडिकेट बना लेते हैं। इस वजह से आम जनता को महंगी रेत मिल रही है।
रेत घाटों पर खूनी संघर्ष
मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश की तरह अब छत्तीसगढ़ में भी रेत घाटों पर खूनी संघर्ष होने लगा है। घाटों के संचालन के लिए गैंगवार की स्थिति बन चुकी है। इस आपसी लड़ाई में लोगों की हत्याएं तक हो रही हैं। बलौदाबाजार जिले के रेत घाटों में मिले शवों से यह साफ हो गया है। इन घाटों पर अब पूरी तरह से सिंडिकेट का राज चलता है।
रेत घाटों को अपने कब्जे में लेने के लिए स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि जुटे हैं। यहां तक कि कई विधायक भी वर्चस्व की इस लड़ाई में शामिल हो चुके हैं। यही वजह है कि आए दिन रेत को लेकर प्रदेश के अलग-अलग घाटों में हिंसा हो रही है।
ई-नीलामी के बाद भी सिंडिकेट
रायपुर, बलौदाबाजार, धमतरी, महासमुंद और गरियाबंद समेत लगभग सभी जिलों में रेत घाटों का आवंटन किया जा रहा है। सरकार इसके लिए ई-नीलामी (E-auction) व्यवस्था का उपयोग कर रही है। इसके बावजूद रेत घाट के संचालन में रसूखदार, उद्योगपति और शराब कारोबारी सक्रिय हैं। वे पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
एक रेत घाट के लिए न्यूनतम 2000 से ज्यादा आवेदन जमा होते हैं। ये सभी आवेदन रसूखदार लोग अपने समर्थकों के नाम से डलवाते हैं। जिसकी पर्ची निकलती है, फिर वे सभी ठेकेदार मिलकर एक सिंडिकेट बनाते हैं।
तीन गुना महंगी मिल रही रेत
आमतौर पर सभी जिलों में 500 फीट की एक हाइवा गाड़ी के लिए पिट पास (Pit Pass) मिलता है। इसमें रॉयल्टी मिलाकर सरकारी कीमत 5500 रुपये के आसपास रहती है। लेकिन किसी भी जिले में एक हाइवा रेत 10 से 12 हजार रुपये से कम में नहीं मिलती है।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जिनको भी रेत घाट मिलता है, वे अपना सिंडिकेट बनाते हैं। वे लोडिंग की एक ही ऊंची कीमत तय करते हैं। गाड़ी चलाने वाले और लोकल सप्लायरों की मजबूरी रहती है कि वे रेत इन्हीं से खरीदें।
अफसरों और नेताओं का हिस्सा
इस सिंडिकेट की वजह से बिना किसी रोक-टोक के रेत तय सरकारी कीमत से दो से तीन गुना ज्यादा दाम पर बेची जाती है। इसके खिलाफ कोई भी विरोध नहीं करता है। यदि किसी का हिस्सा तय नहीं किया जाए तो वह रेत घाट से गाड़ी ही निकलने नहीं देता है। इस वजह से ठेकेदारों को मजबूरी में सिंडिकेट बनाना पड़ता है।
यही सिंडिकेट तय करता है कि किसको कितना हिस्सा मिलेगा। रेत घाट से मिलने वाला एक हिस्सा गांव वालों का भी होता है। पिछले साल कई पंचायतों में इस तरह के वीडियो वायरल हो रहे थे। इन वीडियो में रेत घाट से मिलने वाला हिस्सा तय किया जा रहा था। इसके अलावा अफसरों, वहां के नेताओं और पंचायत प्रतिनिधियों का हिस्सा भी तय किया जाता है।
कई बार गांवों के रसूखदार अपनी तय शर्तों पर रेत घाट का संचालन करना चाहते हैं। लेकिन सामने वाला गुट इसका कड़ा विरोध करता है। इस वजह से विवाद लगातार बढ़ जाता है।
FAQ
- रेत घाटों के आवंटन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार किस आधुनिक व्यवस्था का उपयोग कर रही है?
उत्तर: छत्तीसगढ़ सरकार रेत घाटों के पारदर्शी आवंटन के लिए ई-नीलामी (E-auction) व्यवस्था का उपयोग कर रही है। - रेत परिवहन के लिए सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले आधिकारिक परमिट/पास को क्या कहा जाता है?
उत्तर: रेत या अन्य खनिजों के वैध परिवहन के लिए सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले परमिट को पिट पास (Pit Pass) कहा जाता है। - खनन के संदर्भ में 'रॉयल्टी' (Royalty) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: रॉयल्टी वह कानूनी शुल्क या कर है जो किसी भी खनिज (जैसे रेत, कोयला) को जमीन से निकालने के बदले ठेकेदार या खनन कंपनी द्वारा राज्य सरकार के राजस्व विभाग को चुकाया जाता है।
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