बस्तर ओलंपिक की सफलता के बाद अब सरगुजा ओलंपिक, उत्तर छत्तीसगढ़ में खेलों का नया दौर
Raipur. छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी बहुल इलाकों में खेल संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रही है। बस्तर ओलंपिक 2025 के सफल आयोजन के बाद अब 'सरगुजा ओलंपिक 2025-26' ने उत्तर छत्तीसगढ़ में खेलों के नए दौर की शुरुआत कर दी है। इस आयोजन में खिलाड़ियों की अभूतपूर्व भागीदारी देखने को मिली है, जिससे साफ संकेत मिल रहा है कि ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में खेलों के प्रति उत्साह तेजी से बढ़ रहा है।
सरगुजा ओलंपिक के लिए 28 दिसंबर 2025 से 25 जनवरी 2026 तक पंजीयन प्रक्रिया चली। सरगुजा संभाग के छह जिलों से लगभग 3 लाख 50 हजार खिलाड़ियों ने अपना नाम दर्ज कराया। इनमें 1 लाख 59 हजार पुरुष और 1 लाख 89 हजार महिलाएं शामिल हैं। महिला खिलाड़ियों की संख्या पुरुषों से अधिक होना इस आयोजन की सबसे खास बात मानी जा रही है। यह ग्रामीण समाज में बदलते माहौल और खेलों में बढ़ती महिला भागीदारी को दर्शाता है।
12 खेल विधाओं को किया शामिल
सरगुजा ओलंपिक में कुल 12 खेल विधाओं को शामिल किया गया है। प्रतियोगिताएं विकासखंड, जिला और संभाग स्तर पर आयोजित की जा रही हैं। इन खेलों में कबड्डी, खो-खो, तीरंदाजी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, हॉकी, कुश्ती और रस्साकसी जैसी प्रतियोगिताएं शामिल हैं। पारंपरिक खेलों के साथ-साथ आधुनिक खेलों को भी मंच दिया गया है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के युवा अपनी प्रतिभा को अलग-अलग खेलों में दिखा सकें।
अपने आप में खास है लोगो
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्वयं सरगुजा ओलंपिक का 'लोगो' जारी किया था। इस लोगो में सरगुजा अंचल की प्रकृति, संस्कृति और खेल भावना को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया गया है। लोगो के केंद्र में मैनपाट स्थित प्रसिद्ध 'टाइगर पॉइंट' जलप्रपात की आकृति दिखाई गई है। यह जलप्रपात हरियाली, ऊर्जा और निरंतर प्रवाह का प्रतीक माना जाता है। लोगो के बीच में 'सरगुजा ओलंपिक 2026' अंकित है, जो इस आयोजन की पहचान और क्षेत्रीय गौरव को दर्शाता है।
लोगो के चारों ओर 12 खेलों के प्रतीक चिह्न बनाए गए हैं, जो समावेशिता और सभी खिलाड़ियों को समान अवसर देने का संदेश देते हैं। रंगों का संयोजन आयोजन की ऊर्जा और उत्साह को दर्शाता है। लाल रंग को विशेष रूप से शामिल किया गया है, जिसका संबंध पहाड़ी कोरवा जनजाति की परंपराओं से माना जाता है। इस समुदाय में लाल रंग को शक्ति, साहस और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
गजरु को बनाया शुभंकर
सरगुजा ओलंपिक के लिए 'गजरु' को शुभंकर बनाया गया है। यह शुभंकर हाथी की आकृति पर आधारित है, जो सरगुजा क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। आदिवासी समाज में हाथी को शक्ति, धैर्य, बुद्धिमत्ता और एकता का प्रतीक माना जाता है। हाथी की यही विशेषताएं खेल भावना से भी जुड़ी हुई हैं। हाथी झुंड में चलता है, इसलिए यह टीम वर्क और सामूहिक सहभागिता का भी संदेश देता है।
तीन चरणों में पूरी प्रतियोगिता
सरगुजा ओलंपिक को तीन चरणों में आयोजित किया जा रहा है। सबसे पहले विकासखंड स्तर पर प्रतियोगिताएं शुरू हुईं, जिनकी शुरुआत जनवरी के अंतिम सप्ताह से हुई। इसके बाद ब्लॉक स्तर पर जीतने वाले खिलाड़ियों के बीच जिला स्तर की प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। कई जिलों में ये मुकाबले पूरे भी हो चुके हैं। अंतिम चरण संभाग स्तर का होगा, जहां सभी जिलों के विजेता खिलाड़ी अंबिकापुर में आमने-सामने होंगे।
यह है इस ओलंपिक का मकसद
इस आयोजन का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता कराना नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों के लिए आगे का रास्ता तैयार करना भी है। राज्य सरकार ने घोषणा की है कि सरगुजा ओलंपिक में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राज्य की खेल अकादमियों में सीधे प्रवेश दिया जाएगा। इन खिलाड़ियों को ‘यूथ आइकॉन’ के रूप में पहचान दी जाएगी और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए विशेष प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाएगा। खिलाड़ियों को ‘खेलो इंडिया’ जैसे बड़े मंचों तक पहुंचाने की तैयारी भी की जा रही है।
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की मिली मेजबानी
यही नहीं, छत्तीसगढ़ को एक और बड़ा खेल आयोजन मिला है। केंद्र सरकार ने 25 मार्च से 6 अप्रैल 2026 तक होने वाले पहले 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स' की मेजबानी छत्तीसगढ़ को सौंपी है। इस आयोजन के मुकाबले रायपुर, बस्तर और सरगुजा में आयोजित किए जाएंगे। देशभर के आदिवासी खिलाड़ी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आएंगे।
कुल मिलाकर सरगुजा ओलंपिक ने उत्तर छत्तीसगढ़ में खेलों को नई पहचान दी है। बड़ी संख्या में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी यह दिखाती है कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों को लेकर नया उत्साह पैदा हुआ है।
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