100 विषयों पर पाठ्यक्रम हो रहे तैयार, स्कूलों के जरिए छत्तीसगढ़िया दांव

VINAY VERMA | Aug 24, 2026, 19:52 IST
स्कूलों में ठेठरी-खुरमी की पढ़ाई
छत्तीसगढ़ की संस्कृति अब स्कूलों की पढ़ाई का हिस्सा बनेगी। कक्षा 6वीं से 12वीं तक करीब 100 विषयों पर पाठ्य सामग्री तैयार हो रही है। इसमें ठेठरी-खुरमी, लोकनृत्य, कला, इतिहास, महापुरुष और पारंपरिक खानपान को शामिल किया जाएगा।

Raipur। अब स्कूलों में छत्तीसगढ़ को सिर्फ सामान्य ज्ञान के तौर पर नहीं पढ़ाया जाएगा। प्रदेश की मिट्टी, बोली, परंपरा, कला और लोकजीवन को पढ़ाई से जोड़ने की तैयारी है। कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए करीब 100 विषयों पर ऐसी सामग्री तैयार की जा रही है, जिसमें छत्तीसगढ़ की पहचान से जुड़े पहलुओं को शामिल किया जाएगा। खास बात यह है कि इसमें ठेठरी-खुरमी से लेकर पंथी नृत्य, डोकरा कला और बस्तर दशहरा तक को जगह मिलेगी।



100 कलाविद लिखेंगे संस्कृति का पाठ

इस पूरी कवायद के केंद्र में आर्ट रिपोजिटरी है। इसके लिए करीब 100 विषयों पर सामग्री तैयार की जा रही है। प्रदेशभर से साहित्यकार, संस्कृतिविद, शोधकर्ता, विषय विशेषज्ञ और जनसंचार विशेषज्ञ जुटाए गए हैं। इन विशेषज्ञों की मदद से विद्यार्थियों के स्तर के मुताबिक पाठ तैयार होंगे, ताकि संस्कृति सिर्फ रटने का विषय न रहकर समझने और महसूस करने का माध्यम बने।



तीन दिन की कार्यशाला में पूरा खाका

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) 3 दिन तक आवासीय कार्यशाला चल रही है। पहले दिन विषयों की प्रस्तुति, समीक्षा और समूह गठन किया गया। 25 अगस्त को सामग्री में संशोधन और अंतिम ड्राफ्ट तैयार होगा। 26 अगस्त को लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट का प्रस्तुतीकरण, संपादन और स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।



महापुरुषों से लेकर लोकनायकों तक

नई पाठ्य सामग्री में छत्तीसगढ़ की प्रमुख विभूतियों और संतों को भी जगह दी जा रही है। गुरु घासीदास, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, मिनीमाता, माधवराव सप्रे, पं. सुंदरलाल शर्मा, वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर जैसी हस्तियों के योगदान को विद्यार्थियों तक पहुंचाने की तैयारी है। साथ ही क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी पाठों में शामिल किया जाएगा।



स्कूलों में ठेठरी-खुरमी की पढ़ाई


सिरपुर से दंतेश्वरी तक इतिहास

प्रदेश की स्थापत्य और धार्मिक विरासत भी पाठ्य सामग्री का हिस्सा होगी। सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजीव लोचन मंदिर राजिम जैसे स्थलों को विद्यार्थियों से जोड़ा जाएगा। सतनाम, कबीर और रामनामी पंथ के साथ घोटुल, मितान-बदना, लमसेना और मानस मंडली जैसी परंपराओं पर भी सामग्री तैयार होगी।



नृत्य, गीत और शिल्प भी पढ़ेंगे बच्चे

हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा, गौरी-गौरा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई जैसे पर्वों के साथ पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुवा और नाचा जैसे लोकनृत्य भी पाठों में शामिल किए जाएंगे। डोकरा आर्ट, टेराकोटा, बांस और लौह शिल्प, गोदना तथा रजवार भित्ति चित्रों के जरिए स्थानीय कला को समझाया जाएगा।



वाद्ययंत्र और लोकगीतों की भी क्लास

सिर्फ इतिहास और नृत्य तक बात नहीं रुकेगी। कबीर गायन, सुवा, पंथी, देवार, ददरिया, फाग, भरथरी, विवाह और चंदैनी गीतों को भी जगह मिलेगी। मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्यों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाएगा।



थाली भी बनेगी संस्कृति की किताब

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खान-पान संस्कृति को भी इस पहल में शामिल किया गया है। ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे व्यंजनों पर सामग्री तैयार होगी। यानी बच्चों को अपनी संस्कृति किताब के पन्नों के साथ अपनी रसोई और गांव के जीवन से भी समझने का मौका मिलेगा।



पाठ के साथ दिखेगी संस्कृति

प्रत्येक विषय पर 5 से 10 मिनट की लघु फिल्मों के लिए पटकथा भी तैयार की जाएगी। इससे विद्यार्थियों को पढ़ने के साथ देखने और समझने का माध्यम मिलेगा। आर्ट रिपोजिटरी में तैयार सामग्री का उपयोग विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों, प्रशिक्षकों, शैक्षिक प्रबंधकों और पालकों के लिए भी किया जा सकेगा।



सिर्फ पढ़ाई नहीं, पहचान बचाने की कोशिश

सरकार की यह पहल प्रदेश की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोकज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश है। तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच लोककला, बोली, परंपरा और विरासत से बच्चों का रिश्ता कमजोर न हो, यही इसका बड़ा उद्देश्य है। अगर यह सामग्री जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू हुई तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति पहली बार बड़े स्तर पर स्कूल की पढ़ाई से सीधे जुड़ सकेगी।



FAQ

  1. छत्तीसगढ़ के स्कूलों में किन कक्षाओं के लिए नई सांस्कृतिक पाठ्य सामग्री तैयार की जा रही है?
    छत्तीसगढ़ की संस्कृति से जुड़ी नई पाठ्य सामग्री कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए तैयार की जा रही है।
  2. स्कूलों के नए पाठ्यक्रम में कौन-कौन से विषय शामिल होंगे?
    इसमें ठेठरी-खुरमी, लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक कला, त्योहार, ऐतिहासिक स्थल, महापुरुषों और छत्तीसगढ़ के खानपान जैसे करीब 100 विषय शामिल किए जाएंगे।
  3. छत्तीसगढ़ संस्कृति को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने का उद्देश्य क्या है?
    इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को प्रदेश की बोली, लोककला, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है, ताकि स्थानीय पहचान और लोकज्ञान को संरक्षित किया जा सके।

ये खबरें भी पढ़े...

सीएम साय के प्रयासों से छत्तीसगढ़ में तेज हुआ पीएम आवास निर्माण, 11 लाख से ज्यादा घर पूरे



NCERT सिलेबस में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कोर्स में शामिल हुईं तीजनबाई और बस्तर दशहरा की कथाएं



गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में होली पर जमकर बवाल, छात्रों ने एक-दूसरे को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा



CM हाउस में तीजा पोरा की धूम, शिव,नंदी और चुंकिया पोरा की पूजा,CM बघेल ने गाया गीत और थिरके भी



Tags:
  • छत्तीसगढ़
  • बस्तर दशहरा
  • तीजा पोरा
  • हरेली
  • गुरु घासीदास
  • छत्तीसगढ़ संस्कृति