युवाओं को नौकरी लायक बनाने में नगर निगम फेल, करोड़ों का बजट मंजूर, कहीं जमीन नहीं मिली तो कहीं हिसाब तक गायब
कहीं सेंटर के लिए जमीन नहीं मिली, कहीं पंजीयन का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है, तो कहीं युवाओं का डेटा तक तैयार नहीं है।
हिसाब मांगते ही उठे सवाल
योजना की शुरुआत इस उम्मीद के साथ हुई थी कि शहरों के युवाओं को नौकरी पाने लायक प्रशिक्षण मिलेगा। नगरीय प्रशासन विभाग ने इसके लिए नगर निगमों और दूसरे नगरीय निकायों को बड़ी रकम मंजूर की। कुछ निकायों ने अपने सेंटर बनाने की तैयारी की, जबकि कुछ ने प्रशिक्षण के लिए संस्थाओं से अनुबंध किया। हजारों युवाओं ने पंजीयन भी कराया।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि जब प्रशिक्षण ही समय पर शुरू नहीं हुआ, तो योजना पर आगे कितना काम हुआ और मंजूर राशि का इस्तेमाल कहां किया गया? नगरीय प्रशासन संचालनालय की ओर से खर्च का हिसाब मांगे जाने के बाद इन सवालों ने जोर पकड़ लिया है।
छह निगमों को 12-12 करोड़ रूपए
योजना के तहत रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, अंबिकापुर, राजनांदगांव और जगदलपुर नगर निगमों के लिए 12-12 करोड़ रूपए की वित्तीय स्वीकृति दी गई। दूसरे नगरीय निकायों के लिए 10-10 करोड़ रूपए मंजूर किए गए। इतनी बड़ी राशि का मकसद युवाओं को रोजगार से जुड़े कौशल का प्रशिक्षण देना था।
लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कई जगहों पर योजना की रफ्तार बेहद धीमी रही। अब तक कितने सेंटर तैयार हुए, कितने युवाओं को प्रशिक्षण मिला और कितनों को रोजगार से जोड़ने में मदद मिली, इसका पूरा ब्योरा सामने आना जरूरी है।
रायपुर में जमीन नहीं मिलने से अटकी योजना
राजधानी रायपुर में नगर निगम ने वर्ष 2024 के बजट में 10.15 करोड़ रूपए की लागत से अत्याधुनिक स्किल सेंटर बनाने की घोषणा की थी। शुरुआत में एनआईटी रायपुर या पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के आसपास जमीन तलाशने की योजना थी, ताकि छात्रों को पढ़ाई के साथ कौशल सीखने की सुविधा मिल सके।
लेकिन दो साल बीतने के बाद भी जमीन तय नहीं हो पाई। ऐसे में नया सेंटर बनाने की योजना अब ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है।
पुराने सेंटर को अपग्रेड करने की तैयारी
नई जमीन नहीं मिलने के बाद अब भाठागांव स्थित पुराने स्किल सेंटर को सुधारने और अपग्रेड करने की तैयारी है। महापौर मीनल चौबे के मुताबिक, नए सेंटर की जगह पुराने केंद्र को बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है, ताकि युवाओं को प्रशिक्षण मिल सके।
सवाल यह है कि जब नए सेंटर के लिए बजट और योजना पहले से तैयार थी, तो जमीन तय करने में इतना समय क्यों लगा?
बिलासपुर में पंजीयन का रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं
बिलासपुर की स्थिति भी सवाल खड़े करती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वहां अधिकारियों के पास युवाओं के पंजीयन को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। यानी योजना के तहत आवेदन करने वाले युवाओं का रिकॉर्ड और आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
जब पंजीयन का ब्योरा ही सामने नहीं है, तो प्रशिक्षण के लिए युवाओं का चयन कैसे होगा और उन्हें बुलाया कब जाएगा?
अंबिकापुर में युवाओं का डेटा अधूरा
अंबिकापुर में पंजीयन का काम एक अलग संस्था को सौंपा गया था, लेकिन वहां भी युवाओं का डेटा अब तक संकलित नहीं हो पाया है। दूसरी ओर, अन्य नगर निगमों में योजना से जुड़ी फाइलों और प्रगति की जानकारी सामने नहीं आने की बात कही जा रही है।
इन हालात में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किस निकाय ने कितना काम किया और कहां प्रक्रिया अटकी हुई है।
कोर्स तय, लेकिन ट्रेनिंग का इंतजार
योजना में कंप्यूटर ट्रेनिंग, अकाउंटिंग, टैली और ग्राफिक्स डिजाइनिंग जैसे छह महीने के रोजगारपरक कोर्स प्रस्तावित थे। इसका उद्देश्य युवाओं को नौकरी में काम आने वाले कौशल सिखाना था।
लेकिन सेंटर, पंजीयन और डेटा से जुड़ी प्रक्रिया ही अधूरी रही, तो प्रशिक्षण का लाभ युवाओं तक कैसे पहुंचेगा? पंजीयन कराने वाले युवाओं को अब भी अपनी बारी का इंतजार है।
अब तय हो जवाबदेही
यह सिर्फ रायपुर या बिलासपुर का मामला नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर पर योजना के क्रियान्वयन का सवाल है। नगरीय प्रशासन विभाग को हर निकाय से राशि के आवंटन, खर्च, तैयार सेंटर, पंजीकृत युवाओं और प्रशिक्षण की स्थिति का स्पष्ट हिसाब लेना चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी राशि गायब हो गई है। लेकिन करोड़ों रूपए की स्वीकृति के बावजूद काम अधूरा है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए।
युवाओं को नौकरी के लायक बनाने का दावा तभी सार्थक होगा, जब प्रशिक्षण शुरू हो और उसके नतीजे भी दिखाई दें।