शिक्षक दिवस: डोलती नांव में उफनती नदी को पार कर बच्चों का भविष्य संवारने निकलते हैं गुरुजी

VINAY VERMA | Sept 05, 2026, 14:21 IST
अबूझमाड़ में शिक्षकों का संघर्ष
छत्तीसगढ़ के कांकेर, सुकमा और अबूझमाड़ में शिक्षक नदी, डोंगी और जंगल-पहाड़ों के कठिन रास्ते पार कर स्कूल पहुंचते हैं। गुरुजन मुश्किल परिस्थितियों में भी बच्चों की पढ़ाई जारी रखकर शिक्षा के प्रति समर्पण की मिसाल पेश कर रहे हैं।

शिक्षक दिवस पर जब हम गुरुजनों को सम्मान देते हैं, तब छत्तीसगढ़ के जंगल और नदी-पहाड़ों के बीच कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं, जिनका हर दिन किसी परीक्षा से कम नहीं होता। स्कूल पहुंचने के लिए कहीं उफनती नदी पार करनी पड़ती है, कहीं डोंगी का सहारा लेना पड़ता है और कहीं 17 किलोमीटर जंगल-पहाड़ों के बीच पैदल चलना पड़ता है। खतरा रोज सामने होता है, लेकिन इन शिक्षकों के कदम नहीं रुकते। क्योंकि उनके लिए स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद है।



1998 से नाव ही रास्ता

कांकेर के कोयलीबेड़ा के दुर्गम बारकोट प्राथमिक शाला के शिक्षक हरिश्चंद्र वैद्य की कहानी इसी हौसले की मिसाल है। साल 1998 से वे नाव के सहारे नदी पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं। बरसात में कोटरी नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। बारकोट संगम घाट पर पानी का बहाव तेज हो जाता है। ऐसे में नाव ही स्कूल पहुंचने का रास्ता बनती है।



हर दिन नदी पार करना आसान नहीं है। पानी का मिजाज कब बदल जाए, कोई भरोसा नहीं। लेकिन बच्चों की पढ़ाई रुक जाए, यह उन्हें मंजूर नहीं।



हादसा हुआ, हिम्मत नहीं टूटी

हरिश्चंद्र कहते हैं कि डर तो लगता है, लेकिन बच्चों का भविष्य संवारने का जुनून उससे बड़ा है। एक बार नाव पलटने का हादसा भी हो चुका है। कई बार नाव डूबने जैसी स्थिति बनी। इसके बावजूद उन्होंने स्कूल जाना नहीं छोड़ा।



उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं है। यह उन बच्चों के प्रति जिम्मेदारी है, जो उनके आने का इंतजार करते हैं।



सुकमा में डोंगी बनी स्कूल बस

सुकमा के नाड़ीगुफा गांव में भी शिक्षकों की राह आसान नहीं है। यहां शबरी नदी का तेज बहाव और जलकुंभी रास्ता रोकती है। शिक्षक छोटी डोंगी के सहारे स्कूल पहुंचते हैं। कई बार नाव झाड़ियों में फंसकर पलटी और शिक्षकों को तैरकर अपनी जान बचानी पड़ी।



लेकिन अगले दिन फिर वही सफर शुरू होता है। करीब दो दशक बाद गांव में स्कूल खुला तो शिक्षकों ने तय किया कि नदी बच्चों की पढ़ाई के बीच दीवार नहीं बनेगी।



17 किलोमीटर जंगल में उम्मीद

अबूझमाड़ के पीडियाकोट आश्रम शाला के शिक्षक मानू कोर्राम साल 2009 से बच्चों को पढ़ाने के लिए इसी कठिन रास्ते से गुजर रहे हैं। पहले इंद्रावती नदी नाव से पार करते हैं। इसके बाद जंगल और पहाड़ियों के बीच करीब 17 किलोमीटर पैदल सफर तय करते हैं।



बारिश में नदी का पानी बढ़ जाए तो कई बार रास्ते में ही रात गुजारनी पड़ती है। जर्जर भवन और सीमित संसाधनों के बावजूद मानू पीछे नहीं हटते।



जहां डर था, वहां शिक्षा की रोशनी

अबूझमाड़ का यह इलाका कभी नक्सलवाद के साये के लिए जाना जाता था। आज यही शिक्षक बच्चों के हाथ में किताब देकर उनकी दुनिया बदलने की कोशिश कर रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ी जीत यही है कि गांव का बच्चा पढ़े, आगे बढ़े और अपने सपनों तक पहुंचे।



इन गुरुजनों को सलाम

कांकेर, सुकमा और अबूझमाड़ के ये शिक्षक हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षक होना सिर्फ पढ़ाना नहीं है। यह जिम्मेदारी निभाना भी है। इनके पास न आसान सड़क है, न हर सुविधा। लेकिन हौसला है।



नदी की लहरें रास्ता रोक सकती हैं। जंगल थका सकता है। पहाड़ कदम रोक सकता है। लेकिन बच्चों के भविष्य की चिंता इन गुरुजनों को हर सुबह फिर रास्ते पर ले आती है।



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