ट्रेन से मंत्रालय पहुंचेंगे अधिकारी-कर्मचारी, खर्च बचाने की तैयारी भारी, विरोध तेज
NEWS IN SHORT
- 30 करोड़ बचत का सरकारी दावा
- ट्रेन से मंत्रालय जाएंगे अधिकारी-कर्मचारी
- 40 ई-बस खरीदने की तैयारी
- कर्मचारी संगठनों का विरोध
NEWS IN DETAIL
Raipur। सरकार ने नवा रायपुर स्थित मंत्रालय और डायरेक्टरेट के कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए नई परिवहन व्यवस्था का खाका तैयार किया है। योजना यह है
कि अब अधिकारी-कर्मचारी बसों की बजाय ट्रेन से कार्यालय पहुंचेंगे। दावा किया जा रहा है कि इससे सालाना 30 करोड़ रुपए तक की बचत होगी। लेकिन प्रस्ताव सामने आते ही कर्मचारी संगठनों ने इसे कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली व्यवस्था बताया है।
रायपुर स्टेशन से शुरू होगा सफर
प्रस्ताव के मुताबिक कर्मचारी और अधिकारी पहले अपने घरों से रायपुर रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे। इसके बाद ट्रेन के जरिए नवा रायपुर के सीबीडी स्टेशन तक सफर करेंगे। सीबीडी स्टेशन से मंत्रालय और डायरेक्टरेट तक पहुंचाने के लिए अलग बस व्यवस्था बनाई जाएगी। एनआरडीए इस पूरी योजना का प्रस्ताव तैयार कर रहा है।
बसों की जगह रेल मॉडल
वर्तमान में मंत्रालय और विभिन्न विभागों तक कर्मचारियों को पहुंचाने के लिए दर्जनों बसें संचालित होती हैं। इनमें कई बसें पुरानी हो चुकी हैं। कई वाहनों की हालत भी खराब बताई जा रही है। सरकार का मानना है कि डीजल, रखरखाव और संचालन पर होने वाला बड़ा खर्च इस नई व्यवस्था से कम किया जा सकेगा।
40 नई ई-बसें खरीदने की तैयारी
योजना के तहत सीबीडी स्टेशन से कार्यालयों तक कर्मचारियों को पहुंचाने के लिए 40 छोटी ई-बसें खरीदी जाएंगी। यानी यात्रा का पहला हिस्सा ट्रेन से और दूसरा हिस्सा ई-बसों से पूरा होगा। सरकार इसे पर्यावरण अनुकूल और कम खर्चीला मॉडल बता रही है।
ग्रीन रायपुर का तर्क
एनआरडीए के सीईओ चंदन कुमार का कहना है कि यह केवल खर्च कम करने की योजना नहीं है। उनके मुताबिक इससे पर्यावरणीय लाभ भी मिलेगा। ग्रीन रायपुर की अवधारणा को आगे बढ़ाने में यह व्यवस्था मददगार साबित हो सकती है। सरकार इसे भविष्य की जरूरतों के अनुरूप परिवहन व्यवस्था मान रही है।
कर्मचारियों ने उठाए बड़े सवाल
योजना का सबसे विवादित हिस्सा घर से स्टेशन तक पहुंचने की जिम्मेदारी है। कर्मचारियों को अपने साधनों से रेलवे स्टेशन पहुंचना होगा। इसके बाद ट्रेन और फिर बस बदलनी होगी। यही बात कर्मचारी संगठनों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। उनका कहना है कि इससे समय और ऊर्जा दोनों की अतिरिक्त खपत होगी।
लिपिक संघ का हमला
छत्तीसगढ़ लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष संजय सिंह ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है
कि सरकार खर्च बचाने के नाम पर कर्मचारियों पर आर्थिक, मानसिक और शारीरिक बोझ बढ़ा रही है। सबसे ज्यादा असर लिपिक वर्ग पर पड़ेगा। यदि यह व्यवस्था लागू हुई तो कर्मचारियों के कामकाज और आउटपुट पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने इसे पूरी तरह अव्यावहारिक बताते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।
चार घंटे सफर में गुजरेंगे?
छत्तीसगढ़ अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा ने भी योजना पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि आधार आधारित उपस्थिति व्यवस्था के तहत सुबह 10 बजे कार्यालय पहुंचना अनिवार्य है।
ऐसी स्थिति में कर्मचारियों को दो घंटे पहले घर से निकलना पड़ सकता है। शाम को भी दो घंटे अतिरिक्त समय सफर में लग सकता है। उन्होंने पूछा है कि क्या इस अतिरिक्त समय और परेशानी के बदले कर्मचारियों को कोई इंसेंटिव दिया जाएगा?
बचत बनाम सुविधा की लड़ाई
सरकार के लिए यह योजना आर्थिक बचत और पर्यावरण संरक्षण का मॉडल है। लेकिन कर्मचारियों के लिए यह अतिरिक्त भागदौड़ और समय की बर्बादी दिखाई दे रहा है।
योजना अभी कागजों पर है। लेकिन इसके खिलाफ आवाजें तेज हो चुकी हैं। अब सवाल यह है कि सरकार 30 करोड़ की बचत को प्राथमिकता देगी या कर्मचारियों की सुविधा को। फिलहाल ट्रेन से मंत्रालय पहुंचाने का यह फॉर्मूला लागू होने से पहले ही विवाद की पटरियों पर दौड़ने लगा है।
FAQ
- ट्रेन-ई‑बस से मंत्रालय आने की योजना क्यों?
सरकार का दावा है इससे सालाना 30 करोड़ रुपए की बचत होगी और पर्यावरण लाभ मिलेगा। - कर्मचारियों को क्या समस्या हो सकती है?
घर‑स्टेशन‑ट्रेन‑बस सफर में अतिरिक्त समय और मेहनत लगेगी। - कर्मचारियों की सुविधा पर कोई विचार है?
कर्मचारी संगठन इसे अव्यवहारिक मान रहे हैं, अभी कोई इंसेंटिव नहीं।
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