वेदांता के उड़ीसा में बाक्साइट खनन प्रोजेक्ट पर बवाल, छत्तीसगढ़ पहुंची विरोध की आग, पेड़ों का कटना नेशनल ईश्यू

Arun Tiwari | Apr 16, 2026, 13:01 IST
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ओडिशा में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर आदिवासी समुदाय का विरोध तेज हो गया है। जंगल कटाई, जमीन और आजीविका पर खतरे को लेकर लोग आंदोलन कर रहे हैं। इस मुद्दे को छत्तीसगढ़ में भी समर्थन मिला है।

छत्तीसगढ़ में वेदांता हादसे का दर्द कम भी नहीं हुआ कि वेदांता के उड़ीसा में बाक्साइट के खनन प्रोजेक्ट पर बवाल मचा हुआ है। उड़ीसा के आदिवासी इस खनन प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई होनी है।



उड़ीसा में वेदांता के विरोध की आग छत्तीसगढ़ तक पहुंच गई है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने उड़ीसा में वेदांता के विरोध का समर्थन किया है। वेदांता के इस प्रोजेक्ट के खिलाफ छत्तीसगढ़ में भी विरोध की आग सुलग रही है।



आंदोलन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ों का कटना, आदिवासियों पर अत्याचार होना और बिना ग्रामसभा के जबरिया खनन प्रोजेक्ट शुरु करना यह नेशनल ईश्यू है। इसलिए छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन इस प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ है।



वेदांता का विरोध :

सबसे पहले आपको बताते हैं कि यह मुद्दा क्या है। विवाद की जड़ उड़ीसा के रायगढ़ा जिले की सिजिमाली पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना (Bauxite mining) और उससे जुड़ी सड़क निर्माण योजना है। यह परियोजना वेदांता लिमिटेड से जुड़ी है।



जिसका स्थानीय आदिवासी लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस परियोजना से उनकी जमीन, जंगल और आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट के लिए सड़क बननी है। प्रस्तावित सड़क करीब 3 किलोमीटर लंबी है जिसके लिए लगभग 5 हेक्टेयर वन भूमि को साफ करना होगा।



यह सड़क खनन क्षेत्र तक पहुंच बनाने के लिए बनाई जा रही है। खनन परियोजना खुद 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है। जिसमें 699 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है। अनुमान है कि यहां 311 मिलियन टन बॉक्साइट का भंडार है और हर साल 9 मिलियन टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है।8



हसदेव की तरह का मामला :

इस परियोजना का विरोध नया नहीं है। साल 2023 में जब राज्य सरकार ने वेदांता को 50 साल की लीज पर खनन का अधिकार दिया था, तभी से स्थानीय आदिवासी समुदाय इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह परियोजना उनके पारंपरिक अधिकारों और पर्यावरण के लिए खतरा है।



सबसे बड़ी बात यह है कि यह मामला भी छत्तीसगढ़ के हसदेव के पेड़ों के कटने जैसा ही है। यहां भी कोयला खदानों के विरोध में लंबे समय से आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं। उड़ीसा में ग्रामसभा की मंजूरी के बिना यह प्रोजेक्ट शुरु हो रहा है। वहीं छत्तीसगढ़ में भी फर्जी ग्रामसभाओं की मंजूरी के आधार पर कोयला खदानों के खनन की मंजूरी दे दी गई।



क्यों आया यह मामला चर्चा में :

उड़ीसा में वेदांता समूह की प्रस्तावित खनन और सड़क परियोजना को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कंतामाल गांव में 7 अप्रैल से शुरू हुई पुलिस और स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच हिंसक झड़प का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है।



अब तक इस टकराव में सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। जबकि इलाके में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने अपनी जांच के बाद गंभीर आरोप लगाए हैं।



टीम के मुताबिक 6 अप्रैल की रात करीब 3 बजे पुलिस गांव में दाखिल हुई। बिजली काट दी गई और घरों में घुसकर दरवाजे तोड़े गए। विरोध कर रहे लोगों को हिरासत में लेने की भी बात कही गई है। कांग्रेस ने इसे राज्य मशीनरी का दुरुपयोग करार दिया है।



छत्तीसगढ़ में विरोध की आग :

उड़ीसा, छत्तीसगढ़ का पड़ोसी राज्य है। यहां की खनन समस्याएं लगभग एक जैसी हैं। हसदेव बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने वेदांता प्रोजेक्ट का विरोध किया है। आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों के विरोध का समर्थन करते हुए कहा है कि वे इस प्रदर्शन में उनके साथ हैं।



छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के सदस्य आलोक शुक्ला का कहना है कि यह विषय उड़ीसा का नहीं बल्कि पूरे देश का है। यह मामला वन संपदा के नष्ट होने, पर्यावरण पर गंभीर असर,मानव अधिकार उल्लंघन और पेड़ों के कटने का है। शुक्ला ने कहा कि यह आदिवासियों के अस्तित्व और आजीविका का सवाल है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन उड़ीसा के आदिवासियों के साथ है।



छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की डिमांड :

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन यानी सीबीए कहता है कि न तो वेदांता की प्रस्तावित खदान और न ही निर्माणाधीन खनन सड़क के लिए प्रभावित ग्राम सभाओं की सहमति प्राप्त की गई है। और न ही ग्रामीणों के वन अधिकारों को मान्यता दी गई है।



इसलिए यह निर्माण गतिविधि और इसके साथ होने वाला वन भूमि का विनाश पेसा अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन है और पूर्णतः अवैध है। स्थानीय समुदायों के विरोध को दबाने के लिए निषेधाज्ञा लागू की गई है।



यह दिखाता है कि ये विकास कार्य गांवों की सहमति के बिना किए जा रहे हैं। प्रशासन, पुलिस और अदालत को खनन के विरोध के बारे में पूरी जानकारी है फिर भी निर्माण कार्य बिना किसी बाधा के जारी है। वहीं दूसरी ओर आदिवासियों और उनके नेताओं को हर दिन केवल इसलिए गिरफ्तारी,मारपीट का सामना करना पड़ रहा है कि वे कानूनों के आधार पर काम करने की मांग कर रहे हैं।



सीबीए ने मांग की है कि जिन आदिवासी नेताओं को गिरफ्तार किया गया है उनकी रिहाई हो। ग्रामसभा की सहमति तक इस प्रोजेक्ट पर रोक लगाई जाए। यदि ये मांग नहीं मानी गईं तो सीबीए आंदोलन और तेज कर देगा।



मानवाधिकार और पर्यावरण पर चिंता :

सीबीए कहता है कि एक स्टडी में भी इस परियोजना को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार इससे आदिवासियों के भूमि और सांस्कृतिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही विस्थापन और आजीविका के नुकसान को कम करके आंका गया है और जल स्रोतों व पर्यावरण पर दीर्घकालिक असर की आशंका जताई गई है।



इस परियोजना को केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से अभी अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। फिलहाल इसे केवल प्रारंभिक स्वीकृति प्राप्त है इसके बाद भी इस प्रोजेक्ट की गतिविधियां शुरु हो गइ हैं।



पूरी घटना ने एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण और आदिवासी अधिकार की बहस को केंद्र में ला दिया है। एक तरफ औद्योगिक विकास की जरूरत बताई जा रही है, तो दूसरी ओर स्थानीय समुदाय अपने अस्तित्व और संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।



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