वेदांता प्लांट हादसे की उच्च स्तरीय जांच शुरू, आप भी दे सकते हैं दुर्घटना से जुड़े साक्ष्य और बयान
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में हुए वेदांता पावर प्लांट हादसे में जांच शुरु हो गई है। जांच के लिए प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। अब सिर्फ सरकारी फाइलों पर भरोसा नहीं होगा, बल्कि आमजन, प्रत्यक्षदर्शी और पीड़ित पक्ष भी अपनी बात सीधे रख सकेंगे। 29 अप्रैल को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक बिलासपुर संभाग आयुक्त कार्यालय में कोई भी व्यक्ति इस हादसे से जुड़े साक्ष्य, दस्तावेज या बयान पेश कर सकता है।
संभाग आयुक्त सुनील जैन ने साफ कहा है कि इस जांच का मकसद सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि हादसे के असली कारणों को उजागर करना, दोषियों की जवाबदेही तय करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है।
मुआवजे का मरहम
हादसे के बाद वेदांता प्रबंधन अब मुआवजे का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहा है। कंपनी का दावा है कि 24 मृत मजदूरों में से 21 के परिजनों को मुआवजा दिया जा चुका है। वहीं 11 घायल मजदूरों को भी सहायता राशि देने की बात कही गई है।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सवाल है कि क्या पैसों से उन परिवारों का दर्द कम हो सकता है, जिन्होंने अपने कमाने वाले सदस्य को खो दिया? और सबसे अहम कृक्या यह हादसा टाला जा सकता था?
कैसे हुआ मौत का ब्लास्ट?
14 अप्रैल को सक्ती जिले के सिंघीतराई स्थित वेदांता पावर प्लांट में बॉयलर पाइप में जोरदार विस्फोट हुआ था। इस धमाके ने देखते ही देखते 35 मजदूरों को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक 24 मजदूरों की मौत हो चुकी है।
घायलों में से 3 की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है, जबकि 6 मजदूर अस्पताल में निगरानी में हैं। दो मजदूरों को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है। यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही की कहानी बयां कर रहे हैं।
मुआवजे और नौकरी का ऐलान
वेदांता प्रबंधन ने मृतकों के परिजनों को 35-35 लाख रुपए और एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया है। घायलों को 15-15 लाख रुपए देने की बात कही गई है। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मृतकों के परिवारों को 5-5 लाख और घायलों को 50 हजार रुपए देने का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री राहत कोष से भी मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख और घायलों को 50-50 हजार रुपए देने की घोषणा की गई है।
सबसे बड़ा सवाल बाकी
अब पूरा मामला जांच के दायरे में है, लेकिन असली सवाल वही है कि क्या यह हादसा तकनीकी खामी था या प्रबंधन की घोर लापरवाही? और अगर लापरवाही थी, तो क्या जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी या फिर हर बार की तरह यह मामला भी मुआवजे में दब जाएगा?
29 अप्रैल को होने वाली सुनवाई अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि सच सामने लाने का मौका है।
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