डिजिटल इंडिया की जमीनी हकीकत : 90 साल की बुजुर्ग सास को पीठ पर लादकर बैंक पहुंची बहू
NEWS IN SHORT
- पेंशन के लिए 90 वर्षीय सास को पीठ पर लादकर चली बहू।
- जंगलपारा के दुर्गम रास्तों पर नहीं चलती कोई भी गाड़ी।
- बैंक मित्र के न आने से रुकी थी वृद्धावस्था पेंशन।
- केवाईसी अपडेट न होने से तीन महीने से भटके परिजन।
- बैंक मैनेजर ने कहा- घर पर ही पेंशन देने की व्यवस्था
NEWS IN DETAIL
डिजिटल इंडिया और घर-पहुंच सेवा के दावों के बीच छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जो प्रशासनिक दावों की पोल खोलती है। मैनपाट ब्लॉक के कुनिया (जंगलपारा) में रहने वाली एक बहू, अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को पीठ पर लादकर, पथरीले रास्तों और नदी-नालों को पार करते हुए 5 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंची। यह पूरी मशक्कत महज 500 रुपए की मासिक वृद्धावस्था पेंशन के लिए थी।
क्यों आई यह नौबत
बुजुर्ग सोनवारी बाई का परिवार बेहद गरीब है। जंगलपारा स्थित उनके घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक बरसाती नाला पड़ता है, जिसके कारण वहां तक कोई भी गाड़ी या साधन नहीं पहुंच पाता। इसके आगे का साढ़े तीन किलोमीटर का रास्ता भी पथरीला और दुर्गम है।
बहू सुखमनिया ने रोते हुए बताया कि पहले 'बैंक मित्र' तपेश घर आकर ही पेंशन की राशि दे जाता था, जिससे उन्हें काफी सहूलियत थी। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसने घर आना बंद कर दिया और पैसे देने से मना कर दिया। ऊपर से केवाईसी (KYC) अपडेट न होने के कारण पिछले कई महीनों से बुजुर्ग महिला की पेंशन रुकी हुई थी। व्यवस्था की इस बेरुखी के कारण बहू को मजबूरी में अपनी सास को पीठ पर उठाकर सेंट्रल बैंक तक लाना पड़ा।
खाते में थे 2000, मिले सिर्फ 1500 रुपए
शुक्रवार को जब यह बेबस बहू अपनी सास को लेकर नर्मदापुर स्थित सेंट्रल बैंक पहुंची, तो वहां का नजारा देखकर हर कोई दंग रह गया। इस संघर्ष का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। बैंक ने महिला की 3 महीने की रुकी हुई पेंशन के 1500 रुपए तो जारी कर दिए, जबकि उनके खाते में चार महीने के कुल 2000 रुपए जमा थे। हैरानी की बात यह भी है कि 90 वर्ष की इस बुजुर्ग महिला को सरकार की महत्वाकांक्षी 'महतारी वंदन योजना' का लाभ भी नहीं मिल रहा है, वे सिर्फ 500 रुपए की वृद्धावस्था पेंशन के भरोसे हैं।
बैंक प्रबंधन की सफाई
इस पूरे संवेदनशील मामले पर नर्मदापुर सेंट्रल बैंक के मैनेजर मिर्जा अल्ताफ बेग का कहना है कि मैनपाट इलाके में बुजुर्गों और असहायों को घर पर ही पेंशन देने की व्यवस्था लागू है। इसके लिए क्षेत्र में 8 बैंक मित्र सक्रिय हैं। मैनेजर के मुताबिक, अगर किसी हितग्राही के परिजन बैंक में आकर सिर्फ सूचना दे दें, तो बैंक मित्र को उनके घर भेज दिया जाता है।
बड़ा सवाल: बैंक प्रबंधन भले ही सूचना देने पर घर पहुंच सेवा का दावा कर रहा हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बेहद गरीब और कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों को इन नियमों की जानकारी होती है? अगर बैंक मित्र ने घर आना बंद किया, तो इसकी निगरानी क्यों नहीं की गई? 500 रुपए के लिए एक बुजुर्ग महिला को इस उम्र में जो शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, उसका जिम्मेदार कौन है?
निष्कर्ष
यह घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है। जहां एक ओर बहू का अपनी सास के प्रति समर्पण अनुकरणीय है, वहीं दूसरी ओर कागजी नियमों और लापरवाह रवैये के कारण एक बुजुर्ग को प्रताड़ित होना पड़ा। डिजिटल युग में ऐसी तस्वीरें व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान हैं।
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