मोहनलाल हरगोविंद दास बीड़ी उद्योग संपत्ति विवाद फ हाईकोर्ट पहुंचा, सुनवाई नवंबर में
जबलपुर के प्रसिद्ध मोहनलाल हरगोविंद दास बीड़ी घराने का संपत्ति विवाद एक बार फिर हाईकोर्ट पहुंच गया है। यह विवाद परिवार की पुरानी साझेदारी फर्म, उसके कारोबार, संपत्तियों और खातों से जुड़ा है। मामले में स्वर्गीय परमानंद भाई पटेल के परिवार के सदस्य अलग-अलग पक्षों में खड़े हैं।
क्या है मोहनलाल हरगोविंद दास संपत्ति विवाद
बड़े बेटे श्रवण कुमार पटेल और बहन डॉ. नीना वी. पटेल एक तरफ हैं। छोटे भाई सिद्धार्थ पटेल और उनसे जुड़ी कंपनी दूसरी तरफ है। विवाद अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच में चल रहा है। ताजा सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिविजन बेंच में हुई। कोर्ट ने सभी चार मामलों को एक साथ सुना और अगली सुनवाई नवंबर के पहले सप्ताह में रखने का आदेश दिया है।
दिल्ली में तीन बैठकें बेनतीजा रही
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बाद अदालत के सामने समझौते का रास्ता भी रखा गया था। पक्षों की ओर से कहा गया कि मध्य प्रदेश से बाहर मध्यस्थता कराई जाए। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट की मध्यस्थता कमेटी के सामने बातचीत शुरू हुई। इस प्रक्रिया में विवाद से जुड़े सभी पक्षों की तीन बैठकें कराई गईं। कोशिश थी कि लंबे समय से चल रहे पारिवारिक और कारोबारी विवाद का कोई रास्ता निकले।
तीन दौर की बातचीत के बाद भी दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट की मध्यस्थता कमेटी ने बताया कि मध्यस्थता का प्रयास सफल नहीं हुआ। समझौते का रास्ता बंद होने के बाद अब विवाद फिर अदालत की सुनवाई पर केंद्रित है।
मामले की सुनवाई नवंबर में
ताजा सुनवाई में हाईकोर्ट के सामने सभी चार मामलों को एक साथ रखा गया। सुनवाई के दौरान बताया गया कि विवाद में कई पक्ष मध्य प्रदेश से बाहर रहते हैं। उनके अधिवक्ताओं को भी जबलपुर पहुंचना होता है। इसी वजह से अदालत से ऐसी तारीख तय करने का आग्रह किया गया।
पक्षों की ओर से करीब 16 अक्टूबर के आसपास तारीख मांगी गई थी। हालांकि कोर्ट ने नवंबर के पहले सप्ताह में मामलों को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया। इससे अलग-अलग पक्षों के वकीलों को सुनवाई की तैयारी का समय मिलेगा। अब अगली सुनवाई में चारों मामलों की स्थिति पर आगे की कार्यवाही होगी।
विवाद की शुरुआत 2012 में हुई थी
इस विवाद की मौजूदा कानूनी लड़ाई की शुरुआत वर्ष 2012 में हुई बताई गई है। बड़े बेटे श्रवण कुमार पटेल ने दावा किया कि उन्हें कारोबार से अलग कर दिया गया। उन्होंने 5 मार्च 2012 को कानूनी नोटिस भेजकर फर्म को खत्म करने की मांग की। साथ ही उन्होंने कारोबार और संपत्तियों के खातों का पूरा हिसाब मांगा।
उनके दावे के अनुसार संपत्ति की कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक थी। इसके बाद मामला जबलपुर की कमर्शियल कोर्ट पहुंचा। वहां फर्म के अस्तित्व और उसके कथित विघटन को लेकर दोनों पक्षों ने अपने तर्क रखे। इसी मुकदमे ने आगे चलकर परिवार के बीच चल रहे पुराने विवाद को हाईकोर्ट तक पहुंचा दिया।
कोर्ट ने फर्म खत्म होने की बात नहीं मानी
10 जनवरी 2026 को जबलपुर की 24वीं अतिरिक्त जिला अदालत ने मामले में फैसला दिया। अदालत ने उस दावे को स्वीकार नहीं किया कि फर्म वर्ष 2000 में खत्म हो गई थी। फैसले में फर्म का अस्तित्व जारी माना गया। इसके बावजूद श्रवण कुमार पटेल का मुकदमा खारिज कर दिया गया।
इसका प्रमुख आधार यह रहा कि श्रवण पटेल ने खुद अदालत में आकर मौखिक गवाही दर्ज नहीं कराई थी। उन्होंने अपने दावे पर शपथ के साथ बयान नहीं दिया और जिरह का सामना भी नहीं किया। इस फैसले से दोनों पक्ष पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। एक पक्ष फर्म के अस्तित्व को आधार बनाकर आगे बढ़ना चाहता था। दूसरा पक्ष 2000 में फर्म खत्म होने की बात पर कायम रहा।
हाईकोर्ट पहुंचीं तीन बड़ी अपीलें
कमर्शियल कोर्ट के फैसले के बाद हाईकोर्ट में तीन प्रमुख प्रथम अपीलें दायर हुईं। श्रवण कुमार पटेल ने First Appeal No. 330/2026 के जरिए मुकदमा खारिज होने को चुनौती दी। उनका तर्क है कि जब फर्म का अस्तित्व माना गया है, तो उसका हिसाब होना चाहिए।
वह अपने हिस्से और फर्म के खातों की जानकारी चाहते हैं। डॉ. नीना वी. पटेल ने First Appeal No. 460/2026 दायर की है। उन्होंने भी फर्म के हिसाब और संपत्तियों से जुड़े अधिकारों की मांग की है। वहीं सिद्धार्थ पटेल ने First Appeal No. 56/2026 दायर की है। वह कमर्शियल कोर्ट के उस निष्कर्ष को चुनौती दे रहे हैं, जिसमें 2000 में फर्म खत्म होने का दावा साबित नहीं माना गया।
चारों पक्षों के बीच कारोबार की पुरानी कड़ी
इस मामले की कहानी केवल संपत्ति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे परिवार की कई दशक पुरानी कारोबारी साझेदारी भी है। श्रवण कुमार पटेल वर्ष 1963 में पार्टनर बने थे। सिद्धार्थ पटेल वर्ष 1965 में पार्टनर बने। परिवार की बहनों में डॉ. नीना वी. पटेल, डॉ. सोनल के. अमीन और रूपा पटेल वर्ष 1976 में पार्टनर बनीं।
स्वर्गीय ज्योत्स्ना देवी पटेल परिवार की वरिष्ठ सदस्य और परमानंद भाई पटेल की पत्नी थीं। मुकदमे के दौरान 11 अप्रैल 2019 को उनका निधन हो गया। विवाद में 1986 में बनी मोहनलाल हरगोविंददास बीड़ी उद्योग प्राइवेट लिमिटेड भी अहम पक्ष है। श्रवण और नीना पक्ष का आरोप है कि इस कंपनी के जरिए मूल फर्म के कारोबार पर नियंत्रण स्थापित किया गया।
7 फरवरी 2000 का पत्र पूरे विवाद की सबसे बड़ी कड़ी
पूरे विवाद में 7 फरवरी 2000 का एक पत्र सबसे अहम दस्तावेज बताया जा रहा है। सिद्धार्थ पटेल पक्ष का कहना है कि इस पत्र के जरिए पिता परमानंद भाई पटेल ने फर्म खत्म करने का फैसला किया था। उनका दावा है कि 1986 की पार्टनरशिप डीड की धारा 10(A) में उन्हें यह अधिकार मिला था।
इसी अधिकार के आधार पर 31 मार्च 2000 से फर्म खत्म की गई। इसके बाद पूरा कारोबार कंपनी को सौंपे जाने का दावा किया गया। दूसरी तरफ श्रवण पटेल और नीना पटेल पक्ष इस पत्र को ही विवादित मानता है। उनका आरोप है कि पत्र फर्जी तरीके से तैयार किया गया था। वे पिता के हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान पर भी सवाल उठा रहे हैं।
बड़े भाई और बहन ने लगाए गंभीर आरोप
श्रवण कुमार पटेल और डॉ. नीना वी. पटेल ने सिद्धार्थ पटेल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि 100 साल पुरानी मूल फर्म का कारोबार और संपत्तियां कंपनी के पक्ष में कर दी गईं। आरोपों में बीड़ी कारोबार, गुडविल और अचल संपत्तियों के हस्तांतरण का भी जिक्र है। श्रवण पक्ष का कहना है कि 1994 में परमानंद भाई पटेल को गंभीर ब्रेन हैमरेज हुआ था।
उनका दावा है कि इसके बाद वह मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम स्थिति में नहीं थे। इसी आधार पर 2000 के पत्र और उसमें किए गए हस्ताक्षरों पर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने अदालत में पेश दस्तावेज की कॉपी को लेकर भी आपत्ति जताई है। हालांकि ये सभी आरोप संबंधित पक्ष के दावे हैं और इन पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
रजिस्ट्रार के पुराने फैसलों को लेकर भी विवाद
इस विवाद में रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स से जुड़े रिकॉर्ड का भी जिक्र हुआ है। श्रवण और नीना पक्ष का दावा है कि फर्म खत्म करने से जुड़े कुछ आवेदन पहले खारिज हुए थे। उनके अनुसार वर्ष 2002, 2009 और 2016 में ऐसे आवेदन सामने आए थे।
उनका आरोप है कि इन फैसलों की जानकारी बाद की कानूनी प्रक्रिया में सही तरीके से सामने नहीं रखी गई। दूसरी तरफ सिद्धार्थ पक्ष अपने 2000 के विघटन के दावे पर कायम है। ऐसे में रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड भी विवाद के महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गए हैं। इन दस्तावेजों का अंतिम कानूनी असर हाईकोर्ट की सुनवाई में स्पष्ट होगा।
दिवंगत मां की पुलिस से शिकायत का मामला उठा
श्रवण पक्ष ने परिवार की दिवंगत सदस्य ज्योत्स्ना देवी पटेल की एक पुलिस शिकायत का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार 14 जुलाई 2008 को मुंबई पुलिस कमिश्नर के सामने शिकायत दी गई थी। इसमें सिद्धार्थ पटेल पर धोखाधड़ी और दस्तखत के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाए गए थे।
संपत्ति से जुड़े आरोपों का भी शिकायत में जिक्र होने का दावा है। इस शिकायत को भी श्रवण पक्ष ने अपने आरोपों के समर्थन में रखा है। हालांकि शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में अदालत द्वारा साबित तथ्य नहीं हैं। इनका कानूनी असर संबंधित रिकॉर्ड और अदालत के निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
पिता को फर्म खत्म करने का अधिकार था
सिद्धार्थ पटेल पक्ष ने श्रवण और नीना पटेल के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है कि 1986 की पार्टनरशिप डीड ने परमानंद भाई पटेल को विशेष अधिकार दिया था। इस अधिकार के तहत वह अपने जीवनकाल में फर्म खत्म कर सकते थे।
सिद्धार्थ पक्ष का दावा है कि इसी अधिकार का इस्तेमाल वर्ष 2000 में किया गया। उनके अनुसार 7 फरवरी 2000 का पत्र इसी फैसले से जुड़ा था। उनका यह भी कहना है कि दूसरे पार्टनरों ने कंपनी में जमा रकम भेजने के लिए सहमति दी थी। उनके अनुसार इससे साफ होता है कि फर्म के बदलाव की जानकारी परिवार के दूसरे सदस्यों को थी।
सिद्धार्थ पक्ष ने 2005 का भी वैकल्पिक तर्क दिया
सिद्धार्थ पटेल पक्ष ने कोर्ट के सामने एक दूसरा कानूनी तर्क भी रखा है। उनका कहना है कि अगर 2000 का विघटन नहीं माना जाता है, तो 2005 में फर्म खत्म हो गई। उनके अनुसार 15 मई 2005 को परमानंद भाई पटेल की मृत्यु हुई थी।
इसी आधार पर उन्होंने पार्टनरशिप डीड की धारा 10(B) का उल्लेख किया। उनका दावा है कि उस समय फर्म का अस्तित्व अपने आप समाप्त हो गया था। इसी आधार पर 2012 में दायर मुकदमे को समय सीमा से बाहर बताया गया है। साथ ही श्रवण पटेल की गवाही नहीं होने को भी अपने पक्ष का आधार बनाया गया है।
अब विवाद सिर्फ संपत्ति नहीं
मोहनलाल हरगोविंद दास का विवाद केवल जमीन और इमारतों के मालिकाना हक तक सीमित नहीं है। इसमें पुराने बीड़ी कारोबार, उसकी गुडविल और फर्म के खातों का सवाल भी शामिल है। एक पक्ष का कहना है कि मूल फर्म अभी भी अस्तित्व में है। इसी आधार पर वह संपत्ति और कारोबार का हिसाब चाहता है। दूसरा पक्ष मानता है कि फर्म पहले ही खत्म हो चुकी थी। इसी वजह से दोनों पक्षों की कानूनी मांगें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। यही अंतर इस मामले को परिवार की सामान्य संपत्ति लड़ाई से बड़ा बनाता है।
तीन बैठकों के बाद कोई समाधान नहीं
परिवार को आपसी समझौते से जोड़ने की कोशिश भी इस विवाद में हो चुकी है। दिल्ली में तीन बैठकों के बाद भी कोई समाधान नहीं निकल सका। मध्यस्थता कमेटी ने भी प्रक्रिया के असफल होने की जानकारी दी। अब मामले का फैसला न्यायिक प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा।
जबलपुर हाईकोर्ट में चारों अपीलों को साथ सुना जा रहा है। अगली सुनवाई नवंबर के पहले सप्ताह में प्रस्तावित है। इस सुनवाई में परिवार के पुराने कारोबारी विवाद से जुड़े कई सवाल सामने रहेंगे। इनमें फर्म के अस्तित्व, 2000 के दस्तावेज और संपत्तियों के हिसाब से जुड़े मुद्दे अहम हैं।
पुराने कारोबारी नाम की विरासत पर टिकी नजर
जबलपुर के पुराने कारोबारी परिवार की यह लड़ाई अब कई स्तरों पर पहुंच चुकी है। एक तरफ परिवार के सदस्य अपने हिस्से और खातों का सवाल उठा रहे हैं। दूसरी तरफ कंपनी के जरिए कारोबार जारी रहने का पक्ष रखा जा रहा है।
विवाद की सबसे अहम कड़ी 2000 में फर्म के कथित विघटन का दस्तावेज है। उसी दस्तावेज की वैधता पर दोनों पक्षों के दावे अलग हैं। दिल्ली में समझौते की कोशिश भी इस विवाद को खत्म नहीं कर सकी। अब परिवार के इस पुराने कारोबारी विवाद का अगला फैसला हाईकोर्ट की सुनवाई से तय होगा।