डिंडौरी में रोज कट रहे 565 पेड़, 1.50 लाख पेड़ों की कटाई का टारगेट, सामने आई बड़ी वजह
डिंडौरी साल बोरर का खतरा
कीट प्रभावित पेड़ों को काटने के लिए जंगल को 113 सेक्टर में बांटा गया है। वन विभाग का दावा है कि 60 सेक्टर में कटाई शुरू हो चुकी है। अब तक चार हजार 516 पेड़ काटे जा चुके हैं। यह काम करीब आठ दिन में हुआ है।
विभाग के मुताबिक दो साल में प्रभावित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है। पिछले साल करीब पांच से छह हजार पेड़ों पर निशान लगाए गए थे। इस बार यह संख्या करीब डेढ़ लाख तक पहुंच गई है।
रोज कितने पेड़ काटने जरूरी
कटाई का लक्ष्य 17 सितंबर से 31 दिसंबर 2026 तक तय किया गया है। यह करीब 110 दिन का समय है। डेढ़ लाख पेड़ काटने के लिए रोज करीब 1364 पेड़ काटने होंगे। लेकिन अभी रोज औसतन 565 पेड़ ही कट रहे हैं। यानी जरूरत की रफ्तार के आधे से भी कम काम हो रहा है।
डीएफओ (District Forest Officer) भारती ठाकरे ने रफ्तार पर जवाब दिया। उनके मुताबिक दो मजदूर डेढ़ से दो घंटे में एक पेड़ काटते हैं। विभाग का एक अनुमान डेढ़ से ढाई घंटे का भी है। बारिश में काम बंद करना पड़ता है। इससे रफ्तार और धीमी हो जाती है। इसी वजह से तय समय में लक्ष्य पूरा करना चुनौती भरा दिख रहा है।
मौके पर कैसे चल रहा काम
विभाग का कहना है कि 60 सेक्टर में करीब 10-10 मजदूर लगाए गए हैं। इस हिसाब से करीब 600 मजदूर कटाई कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर छत्तीसगढ़ सीमा से लगे गांवों से भी मजदूर आएंगे। मजदूर गोपाल नेताम के मुताबिक उस दिन उनके साथ 13 लोग काम कर रहे थे। मोटे पेड़ आरी से और बाकी कुल्हाड़ी से काटे जा रहे थे।
काम सिर्फ पेड़ गिराने तक सीमित नहीं है। मजदूरों को टहनियां काटनी पड़ती हैं। उन्हें पेड़ की छाल भी उतारनी पड़ती है। घने जंगल में जंगली घास और वनस्पति है। मजदूरों के मुताबिक यहां अकसर सांप भी दिखाई देते हैं। इसलिए यह काम जोखिम भरा है।
मजदूरों की सुरक्षा पर सवाल
मजदूर फूल सिंह के मुताबिक उन्हें हेलमेट, दस्ताने और सुरक्षा जूते नहीं मिले। चोट लगने पर मौके पर प्राथमिक इलाज की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है। उन्होंने बताया कि बारिश में काम के दूसरे विकल्प कम होते हैं। इसी वजह से मजदूर यह काम कर रहे हैं।
जंगल में पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है। प्यास लगने पर मजदूर 200 से 250 मीटर दूर झिर तक जाते हैं। बारिश में उस झिर में मटमैला पानी आने की बात भी उन्होंने कही।
डीएफओ ने क्या जवाब दिया
डीएफओ ठाकरे ने कहा कि कीट प्रभावित पेड़ 31 दिसंबर तक काट दिए जाएंगे। कटाई के लिए मजदूरों को कुल्हाड़ी और आरी दी गई है। मशीन की अनुमति के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। उनके मुताबिक कटाई मजदूर ही करेंगे।
फंड को लेकर उन्होंने कहा कि पेड़ कटाई के लिए अलग से फंड नहीं रहता। इसके लिए टेंडर भी नहीं निकाला जाता। कटाई मजदूरी दर पर कराई जा रही है। लकड़ी को डिपो तक ले जाने के लिए टेंडर प्रक्रिया में है।
डीएफओ के मुताबिक प्राथमिक इलाज की किट वनरक्षक के पास रहती है। मजदूरों का संबल योजना में पंजीकरण रहता है। विभाग ने अलग से बीमा नहीं कराया है। स्टाफ से कहा गया है कि सभी का पंजीकरण संबल योजना में हो। पेयजल के सवाल पर डीएफओ ने कोई जवाब नहीं दिया।
फील्ड में पांच डीएफओ की ड्यूटी लगाई गई है। दो ट्रेनी आईएफएस (Indian Forest Service) अधिकारी भी तैनात हैं। इनके साथ दो एसडीओ (Sub Divisional Officer) भी हैं। रेंजर, वनपाल और वनरक्षक की ड्यूटी भी लगी है।
साल के जंगल और पुराना प्रकोप
डिंडौरी जिले में कुल 80 हजार 263 हेक्टेयर क्षेत्र में साल के जंगल हैं। इनमें करीब 76 हजार 230 हेक्टेयर सघन और चार हजार 32 हेक्टेयर विरल वन है।
विशेषज्ञों के अनुसार साल बोरर का प्राकृतिक चक्र करीब 30 साल का होता है। डिंडौरी में 1997-98 में भी इसका बड़ा प्रकोप सामने आया था। तब 1.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 22 लाख 15 हजार पेड़ काटने पड़े थे। उस दौरान एक करोड़ 39 लाख कीट नष्ट किए गए थे।
देश में साल के जंगल करीब एक लाख पांच हजार 790 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हैं। इसमें से 26,041.78 वर्ग किमी हिस्सा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में है। यह देश के साल वन क्षेत्र का करीब 25 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक आजादी से पहले 1905 में बालाघाट में प्रकोप दर्ज हुआ था। 1923 से 1928 के बीच मंडला वन क्षेत्र में 70 लाख पेड़ प्रभावित हुए। 1996 से 2001 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 40 लाख पेड़ प्रभावित हुए। यह असर करीब तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दिखा था।
कीट फैलने की वजह क्या रही
एसएफआरआई (State Forest Research Institute) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सी. मोहन ने वजह बताई। उनके अनुसार पिछले साल ज्यादा बारिश हुई थी। इससे डिंडौरी-अमरकंटक क्षेत्र में नमी बढ़ी। इसी नमी में साल बोरर के फैलने की स्थिति बनी।
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार महामारी उन जंगलों में तेजी से फैली। जहां मानव बस्तियां हैं। पशु चराने और ईंधन के लिए पेड़ काटने से भी हालात बिगड़े। कुल्हाड़ी के घाव से निकलने वाले तरल पदार्थ ने कीट के पनपने में मदद की। ये बातें डॉ. एन. रायचौधुरी की रिपोर्ट में कही गई हैं। वे जबलपुर के उष्ण कटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक हैं। रिपोर्ट के साथ भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद का नाम भी जुड़ा है। मानसून से पहले टूटी टहनियां और खराब पेड़ हटते, तो शुरू में ही काबू मिलता।
एक्सपर्ट की राय क्या है
राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मोहन का कहना है कि फ्रंटलाइन स्टाफ को साल बोरर की पूरी जानकारी चाहिए। उन्हें ट्री ट्रैप ऑपरेशन का प्रशिक्षण भी जरूरी है। इसके लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
रिटायर्ड अपर वनमंडल अधिकारी आरएलएस परस्ते भी इस पर राय रखते हैं। उनके मुताबिक साल बोरर को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक तरीके से इसके प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है। उनका कहना है कि सिर्फ पेड़ काटना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए लंबे समय की माइक्रो प्लानिंग जरूरी होगी।
कटाई के बाद क्या होगा
पेड़ों की कटाई के बाद छोटे पौधों को सुरक्षित रखने की बात कही जा रही है। फिर भी कटे जंगल को दोबारा विकसित होने में 20 से 30 साल लग सकते हैं। विभाग का अनुमान है कि 46 हजार 390 घनमीटर इमारती लकड़ी मिलेगी। साथ ही 43 हजार 940 घनमीटर जलाऊ लकड़ी भी मिलने की उम्मीद है। कटाई और परिवहन पर आठ से 10 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। लकड़ी की नीलामी ई-ऑक्शन (Electronic Auction) के जरिए होगी। अब देखना है कि विभाग बची अवधि में रफ्तार कितनी बढ़ाता है।