19 सितंबर से पहले बड़ा एक्सपेरिमेंट, युवाओं के जरिए बदलेगा कांग्रेस का पूरा फॉर्मेट
ऐसे समझें पूरा मामला...
- 19 सितंबर के लिए नया फॉर्मेट तैयार।
- QR कोड से एंट्री का रास्ता तय।
- युवाओं की स्क्रीनिंग भी होगी।
- सवाल चुनकर सीधा संवाद कराया जाएगा।
- बैकएंड की कमान अलग टीम संभालेगी।
19 सितंबर की तैयारी अब सिर्फ भीड़ जुटाने तक सीमित नहीं है। राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे से पहले कांग्रेस में इसे लेकर तैयारियां तेज हैं और इस बार असली प्रयोग मंच के पीछे चल रहा है।
QR कोड से एंट्री, युवाओं का डेटा, सवालों की छंटाई और मंच संचालन,हर कड़ी को पहले से डिजाइन किया जा रहा है। यानी कार्यक्रम में कौन आएगा, कौन सवाल पूछेगा और मंच पर कौन नजर आएगा, इसका फॉर्मेट पहले ही तय करने की तैयारी है।
मंच पर युवा, कंट्रोल रूम में रणनीति
19 सितंबर के कार्यक्रम को सामान्य राजनीतिक सभा से अलग दिखाने की तैयारी है। यहां सबसे दिलचस्प बदलाव मंच पर नहीं, बल्कि उसके पीछे नजर आएगा।
कार्यक्रम की कमान युवाओं के हाथ में रखने का फॉर्मेट तैयार किया जा रहा है। मंच संचालन भी युवा करेंगे और संवाद का बड़ा हिस्सा भी उन्हीं के सवालों के आसपास रखा जाएगा।
इससे कार्यक्रम में नेताओं के लंबे भाषण और पारंपरिक राजनीतिक संबोधन की गुंजाइश कम होगी। पूरा फोकस सीधे युवा संवाद पर रखने की कोशिश है।
QR कोड सिर्फ रजिस्ट्रेशन नहीं
युवाओं के रजिस्ट्रेशन के लिए QR कोड जारी किया गया है। इसके जरिए नाम, मोबाइल नंबर और शहर जैसी जानकारी ली जाएगी।
यहीं से कार्यक्रम का दूसरा सिस्टम शुरू होता है। रजिस्ट्रेशन केवल एंट्री पास की व्यवस्था नहीं रहेगा, बल्कि कार्यक्रम में आने वाले युवाओं का व्यवस्थित डेटा भी तैयार करेगा।
बताया गया है कि यह जानकारी दिल्ली स्थित कार्यालय में एकत्रित होगी। ऐसे में डेटा का इस्तेमाल कैसे और किस उद्देश्य से होगा, यह हिस्सा भी इस पूरी कवायद का महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है।
हर युवा मंच पर नहीं, चुनिंदा आवाजें
कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी युवाओं को सीधे सवाल पूछने का मौका नहीं मिलेगा। कुछ युवाओं का चयन संवाद के लिए किया जाएगा।
यानी हजारों की भागीदारी के बीच मंच तक पहुंचने वाली आवाजें पहले से चुनी जा सकती हैं। इससे कार्यक्रम का समय भी नियंत्रित रहेगा और बातचीत को एक तय दिशा में रखने में आसानी होगी। यही व्यवस्था इस कार्यक्रम को सामान्य भीड़ वाली सभा से अलग बनाती है।
कंसर्ट के बाद सीधे संवाद का प्लान
कार्यक्रम में लाइव कंसर्ट भी प्रस्तावित है। इसके बाद सीधे मुख्य संवाद की ओर जाने का फॉर्मेट रखा गया है। इसका मकसद साफ दिखाई देता है, लंबे राजनीतिक भाषणों के बजाय युवाओं के लिए ज्यादा आकर्षक माहौल तैयार करना।
कंसर्ट, युवा एंकरिंग और सीधे सवाल-जवाब का कॉम्बिनेशन कार्यक्रम को सोशल मीडिया फ्रेंडली भी बना सकता है। मंच से निकलने वाली छोटी-छोटी क्लिप्स भी इसकी पहुंच बढ़ा सकती हैं।
राजनीतिक संगठन पीछे, नेटवर्क आगे
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि कांग्रेस संगठन के लोगों की भूमिका मंच पर कम और व्यवस्था में ज्यादा रखने की तैयारी है।
कार्यकर्ताओं को रजिस्ट्रेशन बढ़ाने, युवाओं तक पहुंचने और कार्यक्रम की व्यवस्थाएं संभालने की जिम्मेदारी दी जा रही है। यानी सामने युवा दिखाई देंगे और पीछे पूरी मशीनरी काम करेगी। यही मॉडल कार्यक्रम को राजनीतिक सभा की सीधी पहचान से बचाने की कोशिश भी माना जा सकता है।
50 हजार का लक्ष्य, असली चुनौती यहीं
कार्यक्रम के लिए बड़ी संख्या में रजिस्ट्रेशन कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए अलग-अलग लोगों को जिम्मेदारियां बांटी गई हैं।
फायदा यह है कि बड़ी युवा भागीदारी के साथ कार्यक्रम का असर स्थानीय स्तर से बाहर तक बनाया जा सकता है। लेकिन चुनौती भी उतनी ही बड़ी है, अगर रजिस्ट्रेशन और वास्तविक उपस्थिति में बड़ा अंतर रहा तो पूरी रणनीति कमजोर पड़ सकती है।
दूसरी चुनौती डेटा की है। नाम और मोबाइल नंबर जैसी जानकारी जुटने के बाद उसकी सुरक्षा, इस्तेमाल और पारदर्शिता को लेकर स्पष्टता जरूरी होगी।
इसलिए 19 सितंबर की कहानी सिर्फ मंच पर होने वाले संवाद की नहीं होगी। राहुल गांधी के दौरे से पहले कांग्रेस ने जिस तरह इस पूरे फॉर्मेट को तैयार करने की कवायद शुरू की है, उसमें असली नजर इस बात पर रहेगी कि कितने युवा जुड़े, किस तरह चुने गए, कौन से सवाल मंच तक पहुंचे और पूरा फॉर्मेट जमीन पर कितना गैर-पारंपरिक दिखाई दिया।
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