सुप्रीम छूट के बाद भी 2001 से पुराने शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य, HC पहुंचा मामला
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश में पुराने शिक्षकों के TET को लेकर विवाद HC पहुंचा है।
- DPI ने सभी सेवारत शिक्षकों के लिए TET जरूरी किया है।
- याचिका में 3 सितंबर 2001 से पहले नियुक्त शिक्षक अलग बताए गए हैं।
- शिक्षा कर्मियों का दावा है कि उनकी नियुक्ति 1998 में हुई थी।
- हाईकोर्ट ने सरकार और दूसरे पक्षों से चार हफ्ते में जवाब मांगा है।
मामला मध्य प्रदेश के पुराने शिक्षा कर्मियों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता शिक्षा कर्मी उत्थान समिति है। समिति ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका लगाई है। याचिका क्रमांक 34958/2026 है। समिति ने DPI के दो आदेशों को चुनौती दी है। पहला आदेश 2 मार्च 2026 को जारी हुआ था। दूसरा आदेश 17 अगस्त 2026 की परीक्षा नियमपुस्तिका है। इन आदेशों में सेवारत शिक्षकों के लिए TET जरूरी किया गया।
याचिका के अनुसार इसमें नियुक्ति की तारीख नहीं देखी गई। इसका असर 1998 में नियुक्त शिक्षा कर्मियों पर भी पड़ा। समिति का दावा है कि ऐसे शिक्षक TET से मुक्त हैं। इसका आधार सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के फैसले को बनाया गया है। जनहित याचिका में उस फैसले के पैरा 168 का हवाला दिया गया है। समिति के अनुसार इसमें 3 सितंबर 2001 की तारीख अहम है। इसी वजह से पुराने शिक्षा कर्मियों ने हाईकोर्ट का रुख किया है।
एक बार फिर हाईकोर्ट पहुंचा TET का मामल
मामले की सुनवाई डिविजनल एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से विक्रमादित्य सिंह ने पक्ष रखा। अर्जुन सिंह ने भी याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी। कोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य माना है। इसके बाद सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया गया। जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते दिए गए हैं।
DPI ने सभी शिक्षकों के लिए अनिवार्य की TET
याचिका में 2 मार्च 2026 के आदेश को मुख्य चुनौती दी गई है। इस आदेश में सभी सेवारत शिक्षकों के लिए TET को अनिवार्य किया गया। इसमें प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के शिक्षक शामिल हैं। याचिका के अनुसार नियुक्ति की तारीख अलग से नहीं देखी गई। बाद में 17 अगस्त को परीक्षा नियमपुस्तिका जारी हुई। इसमें TET 2026 की परीक्षा से जुड़ी व्यवस्था दी गई।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुराने शिक्षक भी इसमें शामिल कर दिए गए। समिति का कहना है कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मेल नहीं खाता। उसका दावा है कि 2001 से पहले नियुक्त शिक्षक अलग श्रेणी में हैं। इसलिए उन पर TET की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए। याचिका में दोनों आदेशों को रद्द करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 3 सितंबर 2001 है अहम
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले का सहारा लिया गया है। मामला अंजुमन इशअत-ए-तालीम ट्रस्ट से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को फैसला दिया था। यह सिविल अपील 1385/2025 थी। इसमें TET की जरूरत से जुड़े सवालों पर विचार हुआ था। याचिका में फैसले के पैरा 168 को अहम बताया गया है। इसमें 3 सितंबर 2001 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों को TET से छूट मिली थी। इसी व्याख्या को लेकर अब हाईकोर्ट में विवाद पहुंचा है। DPI ने सभी शिक्षकों पर एक जैसी शर्त लगा दी। समिति इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बता रही है।
1998 में नियुक्त हुए शिक्षकों का मामला
याचिका में शिक्षा कर्मियों की नियुक्ति 1998 की बताई गई है। इसके लिए 1997 के भर्ती नियमों का हवाला दिया गया है। याचिका के अनुसार भर्ती प्रक्रिया 1997 में शुरू हुई थी। इसके बाद 1998 में शिक्षा कर्मियों की नियुक्तियां हुईं। शुरुआत में तीन साल की परिवीक्षा रखी गई थी। 21 जून 2001 को नियुक्ति की पुष्टि हुई। बाद में शिक्षा कर्मियों का अलग संवर्ग बनाया गया। वर्ष 2007 में संविलियन की प्रक्रिया शुरू हुई थी। याचिका के अनुसार इससे नई नियुक्ति नहीं बनी। समिति का कहना है कि पुरानी नियुक्ति तारीख बनी रही। इसके बाद 2018 के नियमों में स्थिति फिर बदली। याचिका के अनुसार उन्हें 2018 से नई नियुक्ति जैसा माना गया। समिति ने इसी मुद्दे को अलग याचिका में भी चुनौती दी है।
2018 के नियमों को लेकर पहले से हाईकोर्ट में मामला है
शिक्षा कर्मी उत्थान समिति ने 2018 के नियमों को चुनौती दी है। यह मामला WP 8946/2021 के रूप में लंबित है। याचिका में पुरानी सेवा और वरिष्ठता का मुद्दा उठाया गया है। समिति का दावा है कि शिक्षक 1998 से लगातार काम कर रहे हैं। इसके बावजूद 2018 के नियमों में नई नियुक्ति मानी गई। इसी मुद्दे पर इंदौर पीठ का फैसला भी आया था। फैसला 17 अक्टूबर 2024 को WA 2359/2024 में आया था।
याचिका के अनुसार सेवा 1998 से गिनने की बात कही गई। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामला SLP(C) 2733-2737/2025 में लंबित बताया गया है। याचिका के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक नहीं लगाई। हालांकि अवमानना कार्रवाई पर रोक का उल्लेख किया गया है। इस वजह से दोनों मामलों का आपस में संबंध बताया गया है।
TET पास नहीं करने पर खतरे में नौकरी
TET को नौकरी से जोड़ने पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। समिति ने सेवा समाप्त होने का खतरा बताया है। अनिवार्य सेवानिवृत्ति का भी याचिका में उल्लेख किया गया है। समिति का कहना है कि इससे शिक्षकों की आजीविका प्रभावित होगी। ये शिक्षक लंबे समय से सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। याचिका में उनकी वर्षों की सेवा का हवाला दिया गया है। समिति का दावा है कि नियुक्तियां पहले से वैध थीं। ऐसे में बाद में TET को शर्त बनाना गलत है।
याचिका में संविधान के कई अधिकारों का भी हवाला है। इनमें अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका का मुद्दा उठाया गया है। अनुच्छेद 19 के तहत पेशे से जुड़े अधिकार का दावा है। समिति ने आदेश को भेदभावपूर्ण भी बताया है।
हाईकोर्ट से की गई यह मांग
याचिका में DPI का 2 मार्च का आदेश रद्द करने की मांग की है। 17 अगस्त की परीक्षा नियमपुस्तिका भी रद्द करने की मांग है। समिति ने पुराने शिक्षकों को TET से छूट देने की मांग की। उसने बिना TET सेवा जारी रखने का निर्देश भी मांगा। अंतिम फैसला आने तक दोनों आदेश रोकने की मांग है।
याचिका में TET परीक्षा की तारीख 12 अक्टूबर बताई गई है। समिति ने इसे देखते हुए तत्काल राहत मांगी है। उसका कहना है कि परीक्षा नजदीक होने से नुकसान होगा। फिलहाल कोर्ट ने केवल नोटिस जारी किए हैं। इसलिए किसी अंतिम राहत का आदेश नहीं हुआ है।
अब मामले में सबसे बड़ा सवाल क्या है?
अब हाईकोर्ट के सामने पुराने शिक्षकों की TET स्थिति अहम है। इसमें नियुक्ति की तारीख सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सही व्याख्या भी जरूरी होगी। राज्य सरकार अपने जवाब में इस मुद्दे पर स्थिति साफ करेगी। अदालत पुराने नियमों और मौजूदा आदेशों को भी देखेगी। शिक्षा कर्मियों की नियुक्ति का रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होगा। 1998 की नियुक्ति को लेकर भी पक्ष सामने रखे जाएंगे।
2018 के नियमों से जुड़ा लंबित मामला भी चर्चा में आ सकता है। फिलहाल कोर्ट ने याचिका पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए 2001 से पहले के सभी शिक्षकों को छूट तय नहीं है। यह अभी याचिकाकर्ताओं की प्रमुख मांग और दलील है। अंतिम स्थिति हाईकोर्ट के आगे के आदेश से स्पष्ट होगी।
चार हफ्तों में DPI सहित शिक्षा विभाग देगा जवाब
अब इस मामले में कोर्ट ने नोटिस जारी कर सभी प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। मध्य प्रदेश सरकार सहित DPI, ESB और शिक्षा विभाग को नोटिस जारी हुए। जवाब देने के लिए चार हफ्ते का वक्त दिया गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई के बाद यह तय होगा कि 2001 से पहले ज्वाइन हुए शिक्षकों को TET से राहत मिलती है या नहीं।
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