देश में 6 साल में 54 लाख साइबर ठगी की शिकायतें, केस दर्ज सिर्फ सवा लाख, संसद की रिपोर्ट में खुलासा
समझें क्या है पूरा मामला...
- देश में साइबर क्राइम की शिकायतें छह साल में 78 गुना बढ़ गई हैं।
- इसके बावजूद एफआईआर दर्ज होने की दर बेहद कम है।
- संसदीय समिति की रिपोर्ट में यह बड़ा खुलासा हुआ है।
- रिपोर्ट के मुताबिक एनसीआरबी का डेटा जमा करने का तरीका ही खामियों से भरा है।
- इससे असली अपराधों का बड़ा हिस्सा सरकारी रिकॉर्ड से बाहर रह जाता है।
देश में साइबर अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन इन मामलों में एफआईआर दर्ज होने की रफ्तार बेहद धीमी है। 2019 से 2024 के बीच नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर करीब 53.93 लाख शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से सिर्फ 1.30 लाख यानी 2.4 फीसदी मामलों में ही एफआईआर दर्ज हो पाई।
यह जानकारी राज्यसभा की गृह मामलों से जुड़ी स्थायी समिति की रिपोर्ट में सामने आई है। समिति ने सरकार से इस पर तुरंत कदम उठाने को कहा है।
शिकायतें 78 गुना बढ़ीं
आंकड़े बताते हैं कि 2019 में सिर्फ 26 हजार 49 शिकायतें दर्ज हुई थीं। इनमें से एक हजार 32 मामलों में एफआईआर हुई। 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 20 लाख 33 हजार 316 शिकायतों तक पहुंच गया। यानी शिकायतों में करीब 78 गुना बढ़ोतरी हुई। वहीं एफआईआर सिर्फ 49 हजार 582 मामलों में ही दर्ज हो पाई। इस तरह एफआईआर का अनुपात 2019 के 4% से गिरकर 2024 में सिर्फ 2.4% रह गया।
समिति के 31 सदस्यीय पैनल के अध्यक्ष डॉ. राधामोहन दास आग्रवाल ने इस पर चिंता जताई है। उनके मुताबिक पुलिस प्रणाली की ढिलाई और डेटा जुटाने के गलत तरीकों की वजह से असली अपराध रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो पाते। समिति ने सरकार के उन दावों पर भी सवाल उठाए हैं जो अपराध कम होने का दावा करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साइबर हेल्पलाइन 1930 और cybercrime.gov.in पर शिकायत करने के बाद भी लोगों को फॉलो-अप में देरी झेलनी पड़ती है। अलग-अलग राज्यों में अधिकार क्षेत्र का झगड़ा, तकनीकी जांच की कमी और शिकायत निपटाने की जटिल प्रक्रिया लोगों का भरोसा कमजोर कर रही है। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं और युवाओं पर पड़ रहा है।
क्यों छूट जाते अपराध
समिति ने एनसीआरबी के डेटा जुटाने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। एनसीआरबी प्रिंसिपल ऑफेंस रूल पर काम करता है। इसका मतलब है कि अगर किसी मामले में लूटपाट के साथ वीडियो भी ऑनलाइन लीक हुआ हो, तो एनसीआरबी इसे सिर्फ अपहरण के तहत दर्ज करेगा। साइबर अपराध, महिला उत्पीड़न और लूट जैसी दूसरी घटनाओं का डेटा दर्ज ही नहीं होता। इस तरह कई असली अपराध राष्ट्रीय आंकड़ों से गायब हो जाते हैं।
समिति ने राज्यों की एक और गड़बड़ी की तरफ इशारा किया है। क्राइम रेट कम दिखाने के लिए कई थानों में एफआईआर की जगह नॉन-कॉग्निजेबल यानी गैर-संज्ञेय रिपोर्ट बना दी जाती है। अफसरों के दबाव में यह खेल थानों में आम हो गया है। इससे पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो केंद्र को डेटा भेजने में भी दो साल तक की देरी करते हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, असम और राजस्थान जैसे राज्यों में यह देरी सबसे ज्यादा पाई गई है। इसका नतीजा यह होता है कि संसद में सुरक्षा बजट या पुलिस सुधार पर फैसले पुराने आंकड़ों के आधार पर लिए जाते हैं।
क्या हैं सिफारिशें
समिति ने सरकार को कई सिफारिशें भी दी हैं। एफआईआर दर्ज न करने वाले अफसरों के खिलाफ गृह मंत्रालय सख्त कार्रवाई करे। मानवीय दखल कम करने के लिए ई-एफआईआर व्यवस्था लागू हो। एनसीआरबी अपने सिस्टम में मल्टी-टैगिंग शुरू करे, ताकि एक ही मामले में शामिल सभी अपराध सही तरीके से दर्ज हों।
समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि हर राज्य में शिकायत दर्ज करने और निपटाने की एक जैसी व्यवस्था हो। शिकायत मिलने के बाद तय समय-सीमा में कार्रवाई हो। साथ ही पुलिस भर्ती के शुरुआती स्तर पर ही साइबर सुरक्षा कोर्स अनिवार्य किया जाए।