AIIMS भोपाल की नई पहल : अब बच्चों में ऑटिज्म की पहचान होगी आसान, टीचर्स को मिली स्पेशल ट्रेनिंग
News in Short
- AIIMS भोपाल ने ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता की पहचान के लिए शिक्षक प्रशिक्षण शुरू किया।
- शिक्षकों को बच्चों में लर्निंग डिसएबिलिटी और ऑटिज्म के लक्षण पहचानने की ट्रेनिंग मिली।
- एम्स ने बच्चों को समय पर इलाज देने के लिए स्क्रीनिंग तरीकों की जानकारी दी।
- अभिभावकों को कानूनी अधिकारों और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी गई।
- विशेषज्ञों ने बच्चों में दिखने वाले चेतावनी संकेतों के बारे में माता-पिता से संवाद किया।
News in Detail
BHOPAL. भोपाल के एम्स (AIIMS) अस्पताल ने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए एक बहुत ही शानदार कदम उठाया है। एम्स के शिशु रोग विभाग ने अब सीधे स्कूलों का रुख किया है। उनका मानना है कि बच्चों के विकास में आ रही रुकावटों को पहचानना जरूरी है। ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता और सेरेब्रल पाल्सी जैसी बीमारियों का अब समय पर इलाज होगा। इसके लिए एम्स की टीम ने जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। डॉक्टरों की यह टीम अब बच्चों की शुरुआती दिक्कतों को पहचानने में जुटी है।
शिक्षकों को बनाया गया 'सेहत का सिपाही'
एम्स की टीम बागसेवनिया के एनआरआई ग्लोबल डिस्कवरी स्कूल पहुंची और वहां वर्कशॉप की। इस ट्रेनिंग में शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार को समझना विस्तार से सिखाया गया। क्लासरूम में कौन सा बच्चा सीखने में कठिनाई महसूस कर रहा है, यह बताया गया। स्पेसिफिक लर्निंग डिसएबिलिटी (SLD) वाले बच्चों की पहचान अब टीचर खुद कर पाएंगे। शिक्षकों को स्क्रीनिंग के आधुनिक और एकदम सटीक तरीकों की जानकारी दी गई है। अब टीचर बच्चों को सही समय पर डॉक्टर के पास भेजने में सक्षम होंगे।
पेरेंट्स को दी गई कानूनी अधिकारों की पूरी जानकारी
शिशु रोग ओपीडी में विशेषज्ञों ने पेरेंट्स के साथ एक सीधा संवाद भी किया। विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. शिखा मलिक और डॉ. कीर्ति स्वर्णकर ने अहम बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि अक्सर माता-पिता बच्चों के कुछ संकेतों को सामान्य मान लेते हैं। लेकिन यही संकेत भविष्य में किसी बड़ी मानसिक या शारीरिक समस्या का कारण बनते हैं। सपना मौर्य ने अभिभावकों को दिव्यांगजनों के कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक किया। सरकार द्वारा चलाई जा रही सरकारी योजनाओं की भी विस्तृत जानकारी उन्हें दी गई।
समय पर पहचान क्यों है बच्चों के लिए संजीवनी?
डॉक्टरों का साफ कहना है कि शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ी जीत होती है। अगर न्यूरो-विकास संबंधी विकारों को बचपन में पकड़ लिया जाए तो सुधार संभव है। इससे बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है। सही समय पर थेरेपी मिलने से बच्चा समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकता है। एम्स भोपाल की यह पहल अब प्रदेश भर में एक मिसाल बन रही है। इस अभियान से हजारों मासूम बच्चों के चेहरों पर मुस्कान वापस लौट सकती है।
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