अनिका को बचाने के लिए दो करोड़ और चाहिए, HC में एम्स और शासन ने जवाब ही नहीं दिया

Sanjay Gupta | Jun 22, 2026, 16:50 IST
Photograph: (the sootr)
इंदौर की बेटी अनिका शर्मा करीब साढे़ तीन साल की है। उसे SMA टाइप-2 (स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी) नाम की रेयर डिसीज है। इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सोमवार 22 जून को हाईकोर्ट में एम्स और शासन ने जवाब ही नहीं दिया।

इंदौर कीबेटी अनिका शर्मा करीब साढे़ तीन साल की है। उसे SMA टाइप-2 (स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी) नाम की रेयर डिसीज है। बच्ची को इसके लिए नौ करोड़ के इंजेक्शन Zolgensma की जरूरत है। हालांकि अब इसकी कीमत अब साढ़े नौ करोड़ रुपए हो गई है। मां सरिता और पिता प्रवीण शर्मा ने करीब साढ़े सात करोड़ रुपए जोड़ लिए हैं।



हाईकोर्ट में बताया अब कीमत 9.50 करोड़

इस मामले में 22 जून को हाईकोर्ट में जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की बेंच में सुनवाई हुई। इसमें अनामिका के पिता प्रवीण शर्मा के अधिवक्ता चंचल गुप्ता ने तर्क रखे। उन्होंने बताया कि डालर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने से अब इंजेक्शन की कीमत 9.50 करोड़ हो गई है। इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि आपने कितने जोड़ लिए। अधिवक्ता ने बताया कि साढ़े सात करोड़ जोड़ लिए हैं। इसमें 50 लाख की केंद्र की राशि भी शामिल है।



एम्स और शासन ने जवाब ही नहीं दिया

इस मामले में एम्स नई दिल्ली और मप्र शासन को भी पक्षकार बनाया गया है। लेकिन इसमें जवाब नहीं पेश हुआ। इस पर शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि एम्स ने हमे अधिकृत नहीं किया है।वहीं शासन से भी जवाब नहीं आया। इस पर हाईकोर्ट ने बच्ची की गंभीर समस्या को देखते हुए दोनों को निर्देश दिए कि अगली तारीख 30 जून को जवाब पेश करें।



हाईकोर्ट ने पूछा था कि क्या यह लाड़ली नहीं

हाईकोर्ट में माता-पिता की याचिका पर 5 मई को जस्टिस प्रणय वर्मा ने आदेश दिया था। इसमें कहा था कि केंद्र, राज्य, एम्स आपस में बात करके देखे कि किस तरह से बच्ची की अधिक से अधिक मदद हो सकती है। मानवीय आधार पर इसमें मदद के लिए हाईकोर्ट ने सभी पक्षकरों से कहा था।



फिर 16 जून को जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की बेंच में सुनवाई हुई। इसमें शासन पक्ष ने बताया कि केंद्र की रेयर डिसीज योजना के तहत राशि दे रहे हैं लेकिन इसमें अधिकतम 50 लाख ही दे सकते हैं। इसे अधिक बढ़ाने के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इस पर पालक की ओर से अधिवक्ता चंचल गुप्ता ने कहा कि बच्ची की जान खतरे में है। शासन लाड़ली बहना के लिए हर माह सवा करोड़ हितग्राहियों को 1500-1500 रुपए देता है। हर महिला को केवल एक माह की किस्त में मात्र दो रुपए भी कम दिए जाएं तो ढाई करोड़ रुपए हो जाते हैं और बच्ची का इंजेक्शन आ जाएगा। इस पर जस्टिस ने शासन पक्ष से पूछा- क्यों क्या यह सरकार के लिए लाड़ली नहीं है। इस पर शासन पक्ष जवाब नहीं दे पाया और पॉलिसी की बात कही।



बच्ची को लिक्विड डाइट पर रखा गया है

वहीं समस्या यह है कि जल्द इलाज जरूरी है, क्योंकि इसमें जो इंजेक्शन लगना है वह 13 किलो से अधिक वजन होने पर असर नहीं करता है। बच्ची का वजन नहीं बढ़े इसके लिए माता-पिता उसे लिक्विड डाइट पर रखे हुए हैं। अभी वजन करीब साढ़े ग्यारह किलो पर पहुंच गया है।



हाईकोर्ट में माता-पिता की ओर से अधिवक्ता गुप्ता ने यह भी तर्क रखे कि कम से कम एम्स को डायरेक्शन दिए जाएं कि वह बच्ची का उपचार शुरू करें क्योंकि एक से दो माह ऑब्जर्वेशन में भी रखना जरूरी है।



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