अंकिता-हसनैन शादी से शुरू मामला, अब स्पेशल मैरिज एक्ट कटघरे में
समझें क्या है पूरा मामला...
- अंकिता के पिता और VHP कार्यकर्ता ने स्पेशल मैरिज एक्ट को चुनौती दी है।
- अंकिता 5 अक्टूबर 2024 को इंदौर में घर से चली गई थीं।
- अंकिता और हसनैन ने विशेष विवाह कानून में शादी मांगी थी।
- हाई कोर्ट ने दोनों को शादी और सुरक्षा की राहत दी थी।
- उसी मामले ने विशेष विवाह कानून की धारा 4 पर सवाल उठाया है।
अंकिता-हसनैन की शादी
अंकिता राठौर के पिता ने PIL दायर करते हुए स्पेशल मैरिज एक्ट को चुनौती दी है। अब अंकिता-हसनैन की शादी को लेकर स्पेशल मैरिज एक्ट ही विवादों में घिर गया है।
इस पूरे मामले की शुरुआत 5 अक्टूबर 2024 से हुई थी। इंदौर निवासी अंकिता राठौर घर से चली गई थीं। कुछ दिनों बाद उनका एक वीडियो सामने आया था। वीडियो में उन्होंने अपनी पसंद से शादी की बात कही थी।
अंकिता ने कहा था कि उनके भी अपने अधिकार हैं। उन्होंने कहा था कि उनका अधिकार कोई छीन नहीं सकता। उन्होंने साथ मौजूद युवक के वीडियो वायरल होने की बात कही। अंकिता ने दबाव बनाने पर गंभीर कदम की चेतावनी भी दी थी।
इसके बाद यह मामला तेजी से चर्चा में आ गया था। बाद में सामने आया कि अंकिता और जबलपुर निवासी हसनैन अंसारी शादी करना चाहते हैं। दोनों ने जबलपुर कलेक्टर कार्यालय में शादी का आवेदन दिया था।
प्रशासन ने दोनों की शादी के लिए तारीख भी तय की थी। लेकिन शादी से पहले ही इसका विरोध शुरू हो गया। कई हिंदूवादी संगठनों ने इस शादी पर आपत्ति जताई थी।
प्रशासन ने शादी का आवेदन खारिज किया
विरोध के बीच अपर कलेक्टर कार्यालय ने शादी का आवेदन खारिज कर दिया था। आदेश में हसनैन के पते को लेकर सवाल उठाया गया था। प्रशासन के अनुसार हसनैन आवेदन वाले पते पर दस साल से नहीं रह रहा था।
इसके बाद अंकिता और हसनैन ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों ने अपनी सुरक्षा और शादी की अनुमति मांगी थी। हाई कोर्ट में दायर याचिका में पुलिस सुरक्षा की मांग भी की गई थी।
कोर्ट के सामने दोनों ने खुद को बालिग बताया था। उन्होंने अलग धर्म के कारण विशेष विवाह कानून का रास्ता चुना था। 22 अक्टूबर 2024 के हाई कोर्ट आदेश में यह दर्ज है।
कोर्ट ने कहा था कि विशेष विवाह कानून अलग धर्मों के लोगों को शादी की अनुमति देता है। कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा देकर दोनों को विवाह अधिकारी के सामने पेश करने का निर्देश दिया था।
अब सिर्फ एक शादी तक नहीं रहा मामला
हाई कोर्ट ने उस समय दोनों को सुरक्षा की राहत दी थी। पुलिस को दोनों को विवाह अधिकारी के सामने पेश करने को कहा गया था। विवाह अधिकारी को कानून की सभी शर्तें जांचने की छूट दी गई थी।
कोर्ट ने दोनों की सुरक्षा को लेकर भी निर्देश दिए थे। इस आदेश के बाद अंकिता और हसनैन की शादी का रास्ता खुला था। लेकिन बाद में यही मामला एक बड़े कानूनी सवाल में बदल गया। अब सवाल केवल अंकिता और हसनैन की शादी का नहीं है।
सवाल विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 की कानूनी सीमा का है। 2024 के आदेश में भी इसी धारा की पूरी व्यवस्था पर विचार हुआ था। उस आदेश में कोर्ट ने अलग धर्मों के विवाह को इस कानून के तहत संभव माना था।
विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 क्या है?
बता दें कि विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 शादी की जरूरी शर्तें बताती है। इसमें कहा गया है कि दूसरे कानूनों के बावजूद इस कानून में शादी हो सकती है। इसके लिए तय शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
दोनों में किसी का जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए। दोनों कानूनी रूप से शादी की सहमति देने में सक्षम होने चाहिए। पुरुष की उम्र कम से कम 21 साल होनी चाहिए।
महिला की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। दोनों प्रतिबंधित रिश्तों की तय सीमा में नहीं होने चाहिए। इसी धारा के शुरुआती शब्दों को नॉन-ऑब्स्टैंटे क्लॉज कहा जाता है।
आसान भाषा में इसका मतलब दूसरे कानूनों के बावजूद इस कानून को लागू करना है। याचिका में इसी व्यवस्था को मुस्लिम पर्सनल लॉ से टकराता बताया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की शादी पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि धारा 4 की यह व्यवस्था संवैधानिक सीमाओं से बाहर है।
अंकिता के पिता फिर कोर्ट पहुंचे
यह जनहित याचिका अंकिता के पिता हीरालाल राठौर ने दायर की है। दूसरे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हैं। उन्होंने हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की शादी पर कानूनी सवाल उठाया है।
याचिका में धारा 4 को संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 से जोड़ा गया है। याचिकाकर्ताओं ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियमों का भी हवाला दिया है। उनका दावा है कि दोनों कानूनी व्यवस्थाओं में टकराव है।
इसी आधार पर धारा 4 को चुनौती देने की मांग की गई है। उन्होंने कोर्ट से ऐसे विवाह को कानून के दायरे से बाहर करने की मांग भी की है। अंतरिम राहत में विवाह रजिस्ट्रार को ऐसे विवाह कराने से रोकने की मांग है।
धर्म, बच्चों और परिवार से जुड़े कई सवाल उठाए गए
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख है। इसमें डीएफ मुल्ला की किताब का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने मूर्ति पूजक महिला और मुस्लिम पुरुष के विवाह पर सवाल उठाया है। उन्होंने हिंदू विवाह की धार्मिक परंपराओं को भी अपनी दलील में शामिल किया है।
सप्तपदी जैसी परंपराओं का उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया है। याचिका में बच्चों के धर्म और पहचान का सवाल भी उठाया गया है। बच्चों के धार्मिक संस्कार को लेकर भी आपत्ति जताई गई है।
हिंदू संयुक्त परिवार से अलग होने का मुद्दा भी उठाया गया है। इसके अलावा संपत्ति के अधिकारों पर संभावित असर की बात कही गई है। याचिका में धर्मांतरण और देश की जनसंख्या संरचना का भी जिक्र है। इन सभी बातों को फिलहाल याचिकाकर्ताओं की दलील के रूप में देखा जाएगा।
हाई कोर्ट सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाल
स्पेशल मैरिज एक्ट को चैलेंज करते हुए सुप्रीम कोर्ट सहित हाई कोर्ट के कई आदेशों का हवाला दिया गया। याचिका में डब्ल्यूपी 9589/2024 का भी उल्लेख किया गया है। इसके बाद डब्ल्यूपी 27565/2024 और डब्ल्यूए 2618/2024 का भी जिक्र है।
2024 के एक आदेश में अलग धर्म के जोड़े की सुरक्षा का सवाल उठा था। उस मामले में कोर्ट ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 पर विस्तार से विचार किया था। कोर्ट ने कहा था कि यह कानून अलग धर्मों के लोगों के विवाह की सुविधा देता है।
उसने पर्सनल लॉ के बावजूद इस कानून के लागू होने की बात कही थी। अब यह जनहित याचिका उसी कानूनी व्यवस्था को चुनौती दे रही है।
22 सितंबर को चीफ जस्टिस की बेंच में हुई सुनवाई
मामले की सुनवाई आज 22 सितंबर को हुई। सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिविजनल बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आकाश लालवानी ने पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब देने का वक्त दिया। अब केंद्र सरकार इस चुनौती पर अपना पक्ष रखेगी। इसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल क्या है?
अंकिता और हसनैन की कहानी अब व्यक्तिगत विवाद से आगे निकल गई है। अब इस मामले में विशेष विवाह कानून की सीमा जांची जाएगी। एक तरफ अलग धर्मों के लोगों की शादी का कानूनी रास्ता है।
दूसरी तरफ याचिका में धार्मिक कानून और अधिकारों का सवाल है। तीसरी तरफ धारा 4 के नॉन-ऑब्स्टैंटे क्लॉज की व्याख्या है। केंद्र सरकार का जवाब इस बहस में महत्वपूर्ण रहेगा।
इसके बाद कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगा। फिर अदालत कानून और संविधान के आधार पर फैसला करेगी। इस फैसले से आगे ऐसे मामलों की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि इसका अंतिम असर कोर्ट के आदेश पर ही निर्भर करेगा।
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