अपसौर डे: सोमवार को सूर्य से पृथ्वी सबसे दूर, फिर भी पड़ेगी गर्मी, जानिए क्यों
समझें क्या है पूरा मामला
- 6 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सबसे ज्यादा दूर हो जाएगी।
- इस घटना को अपसौर डे यानी Aphelion Day कहते हैं।
- इस दिन दोनों के बीच दूरी करीब 15.20 करोड़ किमी होगी।
- फिर भी भारत में इसी समय भीषण गर्मी पड़ रही है।
- इसकी वजह पृथ्वी की धुरी का झुकाव है, दूरी नहीं।
भारत सहित पूरी दुनिया में सोमवार को एक खास खगोलीय घटना होगी। इस दिन को अपसौर डे (Aphelion Day) कहा जाता है। इस दिन पृथ्वी सूर्य से सबसे ज्यादा दूर होगी। यह दूरी साल भर में सबसे अधिक रहेगी। नेशनल अवार्ड प्राप्त खगोल विज्ञान प्रसारक सारिका घारू ने इसकी पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय समय के अनुसार सोमवार रात 11 बजे यह घटना होगी।
क्या है अपसौर की घटना
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। यह परिक्रमा पूरी तरह गोल कक्षा में नहीं होती। पृथ्वी की कक्षा अंडाकार आकार की है। इसी वजह से साल में एक बार पृथ्वी सूर्य के सबसे करीब आती है। एक बार वह सूर्य से सबसे दूर भी चली जाती है। सूर्य से सबसे दूर वाले बिंदु को अपसौर कहते हैं। सबसे करीब वाले बिंदु को उपसौर (Perihelion) कहा जाता है। यह दोनों घटनाएं हर साल होती हैं।
कितनी होगी दूरी
सारिका घारू के मुताबिक अपसौर के समय दूरी सबसे ज्यादा रहेगी। इस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी करीब 15.20 करोड़ किलोमीटर होगी। इसकी तुलना जनवरी से की जा सकती है। 3 जनवरी को उपसौर के दौरान यह दूरी करीब 14.70 करोड़ किलोमीटर रही थी। यानी अपसौर पर पृथ्वी करीब 50 लाख किलोमीटर ज्यादा दूर होगी। यह अंतर पृथ्वी की अंडाकार कक्षा के कारण ही होता है।
फिर भी क्यों पड़ती है गर्मी
आम धारणा है कि दूरी बढ़ने पर तापमान कम होना चाहिए। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता। भारत में इसी समय गर्मी पड़ती है। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है। लेकिन इसके पीछे एक साफ वैज्ञानिक कारण है। मौसम का संबंध सूर्य की दूरी से नहीं होता। मौसम असल में पृथ्वी की धुरी के झुकाव से तय होता है।
धुरी का झुकाव है वजह
पृथ्वी की धुरी करीब 23.5 डिग्री झुकी हुई है। यही झुकाव मौसम बदलने का असली कारण है। अभी उत्तरी गोलार्ध सूर्य की तरफ झुका हुआ है। इस वजह से भारत में सूर्य की किरणें सीधी पड़ रही हैं। सीधी किरणों से ज्यादा गर्मी महसूस होती है। इसी समय दक्षिणी गोलार्ध में सर्दी का मौसम रहता है। वहां सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। इसी वजह से वहां ठंड ज्यादा होती है।
सूर्य दिखेगा थोड़ा छोटा
सारिका घारू ने एक और दिलचस्प बात बताई। अपसौर के दौरान सूर्य का आकार थोड़ा छोटा दिखता है। यह सामान्य आकार से करीब 3.4 फीसदी छोटा नजर आता है। हालांकि इसे नंगी आंखों से पहचानना मुश्किल है। यह अंतर सिर्फ वैज्ञानिक उपकरणों से ही मापा जा सकता है। आम लोगों को यह फर्क बिल्कुल महसूस नहीं होता।
सारिका घारू भोपाल और नर्मदापुरम क्षेत्र में विज्ञान प्रसार का काम करती हैं। वे कई सालों से आम लोगों को खगोल विज्ञान समझा रही हैं। उन्होंने बताया कि ऐसी घटनाओं के पीछे साफ वैज्ञानिक तर्क होते हैं। लोगों को इन्हें अंधविश्वास से नहीं, विज्ञान से समझना चाहिए। उनके मुताबिक अपसौर एक सामान्य खगोलीय घटना है। यह हर साल जुलाई के पहले हफ्ते में होती है। इसका सीधा असर मौसम पर नहीं पड़ता।
उपसौर से तुलना
पृथ्वी जनवरी में सूर्य के सबसे पास होती है। उस समय उसे उपसौर कहा जाता है। जुलाई में पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर चली जाती है। इसे अपसौर कहते हैं। दोनों घटनाओं में करीब छह महीने का अंतर होता है। यह अंतर पृथ्वी की अंडाकार कक्षा की वजह से बनता है। हर साल इन दोनों घटनाओं की तारीख थोड़ी बदल सकती है। यह बदलाव चंद्रमा और अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है।
क्यों जानना जरूरी है विज्ञान
ऐसी खगोलीय घटनाएं आम लोगों में जिज्ञासा पैदा करती हैं। कई बार लोग इन्हें अंधविश्वास से जोड़ लेते हैं। सही वैज्ञानिक जानकारी होने से यह भ्रम दूर होता है। स्कूली बच्चों के लिए भी यह जानकारी उपयोगी है। इससे उन्हें सौरमंडल की कार्यप्रणाली समझ आती है। वैज्ञानिक सोच बढ़ाने में ऐसी जानकारी मददगार साबित होती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ हर साल इसे विस्तार से समझाते हैं।
सूर्य रोशनी में हल्का बदलाव
अपसौर के दौरान सूर्य की रोशनी में भी थोड़ा अंतर आता है। दूरी बढ़ने से सूर्य की किरणें थोड़ी फैल जाती हैं। इस वजह से रोशनी की तीव्रता में मामूली कमी आती है। यह कमी करीब सात फीसदी के आसपास मानी जाती है। लेकिन यह अंतर मौसम पर बड़ा असर नहीं डालता। समुद्र और वायुमंडल इस अंतर को संतुलित कर लेते हैं। इसी वजह से आम लोगों को यह फर्क महसूस नहीं होता।
गर्मी का मौसम सबसे लंबा
एक और दिलचस्प बात भी सामने आती है। जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, तब उसकी रफ्तार धीमी होती है। यह नियम खगोलशास्त्री जोहानिस केप्लर ने सदियों पहले बताया था। धीमी रफ्तार की वजह से पृथ्वी इस हिस्से में ज्यादा समय बिताती है। इसी कारण उत्तरी गोलार्ध में गर्मी का मौसम सबसे लंबा होता है। यह सर्दी के मौसम से करीब पांच दिन ज्यादा लंबा रहता है। दक्षिणी गोलार्ध में यह क्रम उल्टा हो जाता है।
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