अयोध्यापुरी की 350 करोड़ की जमीन भूमाफिया संघवी, मद्दा के पास गई, कलेक्टर, एसडीओ ने पक्ष नहीं रखा
सहकारी संस्था को 350 करोड़ का झटका
अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ और देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था को 350 करोड़ का झटका लगा है। अयोध्यापुरी की चार एकड़ जमीन सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस कंपनी के पास चली गई है। जिला कोर्ट ने कंपनी की रजिस्ट्री को वैध बताया है। वहीं अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ और देवी अहिल्या संस्था के दाव को खारिज कर दिया है।
यह है विवाद
देवी अहिल्या संस्था ने साल 1986 में सीलिंग से मुक्त हुई जमीन धारा 20 के तहत खरीदी थी। यह जमीन 15.52 एकड़ थी। इसमें कुल 369 प्लॉट धारक हुए। लेकिन मास्टर प्लान में जमीन का उपयोग स्वास्थ्य घोषित होने से यहां कॉलोनी को अवैध में कर दिया गया और निगम से मंजूरी नहीं मिली।
साल फरवरी 2007 में इस जमीन में से चार एकड़ जमीन संस्था ने सिम्लेक्स इन्वेस्टमेंट कंपनी ( Simplex Investment Mega Finance Company) को बेच दी। इसमें डायरेक्टर प्रतीक संघवी, दीपक मद्दा और मुकेश खत्री थे। सौदा कुल 4 करोड़ रुपए में हुआ इसमें 20 चेक कंपनी ने दिए। लेकिन पूरा भुगतान नहीं हुआ केवल 1.80 करोड़ के चेक भुगतान हुए और 2.20 करोड़ बाकी रहे।
साल 2008 में अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ बना और उन्होंने इस चार एकड़ जमीन पर अपने सदस्यों की रजिस्ट्री होने का दावा करते हुए कंपनी को बेची जमीन को अवैध बताया और हर जगह शिकायत की। वहीं कंपनी अपनी जमीन का दावा करते हुए जिला कोर्ट चली गई। इसमें कंपनी ने एसडीओ इंदौर, कलेक्टर इंदौर, अयोध्यापुरी रहवासी समिति और देवी अहिल्या श्रमिक कामगार को पक्षकार बनाया। इस पर अब फैसला आया है।
जमीन खरीदी के चलते संघवी, मद्दा पर केस
वहीं साल 2020 में जब तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने भूमाफिया के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया। तब संस्था के सदस्यों की जमीन खरीदी करने के चलते इसमें संघवी, मद्दा, खत्री इन सभी पर धोखाधड़ी की विविध धाराओं में केस दर्ज कराया गया था।
जिला कोर्ट में प्रशासन से कोई पक्ष नहीं रखा
इस मामले में कंपनी ने केस दायर किया था, जिसमें प्रतिवादी नंबर एक एसडीओ इंदौर और प्रतिवादी नंबर दो कलेक्टर इंदौर थे। इनकी ओर से कोई जवाब पेश नहीं किए जाने के कारण जिला कोर्ट ने एकपक्षीय कार्रवाई दर्ज की। इस प्रकरण में तीसरा पक्ष अयोध्यापुरी रहवासी समिति और चौथा पक्ष देवी अहिल्या संस्था थी। जबकि जिला प्रशासन ने ही भूमाफियाओं के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत साल 2020 में कंपनी और उसके डायरेक्टर के खिलाफ केस दर्ज कराए थे।
जिला कोर्ट ने अपने फैसले में यह माना
जिला कोर्ट न्यायाधीश डॉ. शुभ्रा सिंह ने 65 पन्नों का आदेश दिया। इसमें कहा गया कि 24 फरवरी 2007 को कंपनी द्वारा खरीदी गई चार एकड़ जमीन का पंजीयन वैध है। इसके लिए संस्था ने ही एजीएम में प्रस्ताव पास कर जमीन बेची। यहां पर यह कहना कि इस जमीन पर ही संस्था के सदस्यों के प्लाट है यह साबित नहीं होता है। क्योंकि इसका कोई नक्शा नहीं है।
संस्था के पास कुल 6.75 लाख वर्गफीट जमीन थी। इसमें 1250-1250 वर्गफीट के प्लॉट काटकर संस्था ने 178 सदस्यों को जमीन दी जो कुल दो लाख 22 हजार 500 वर्गफीट होती है। इसके बाद संस्था के पास 4.53 लाख वर्गफीट जमीन बची थी जिसमें से ही कंपनी ने 1.74 लाख वर्गफीट जमीन (चार एकड़) कंपनी को बेची थी।
इस जमीन पर सदस्यों के प्लाट होने और रजिस्ट्री होने के दस्तावेज नहीं थे। यह अतिरिक्त जमीन थी। ऐसे में रहवासी समिति का यह दावा मान्य नहीं है कि यहां पर सदस्यों के प्लाट आ रहे हैं। दोनों ही अलग जमीन है। वहीं दोनों ही जमीन देवी अहिल्या संस्था द्वारा पंजीयन कराई गई है।