बालाघाट के बैगा गांवों में 6 महीने से राशन बंद, कुपोषण से 19 बच्चों की मौत का दावा
समझें क्या है पूरा मामला
- बालाघाट के बिरसा ब्लॉक के गांवों में कुपोषण से बच्चों की मौत हो रही है।
- सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ 8 मौतें दर्ज हैं।
- यह आंकड़ा 19 तक पहुंच गया है।
- मातला और मछुरदा गांव की 6 मौतें रिकॉर्ड में शामिल ही नहीं हैं।
- कई बच्चे अब भी अस्पताल में भर्ती हैं या गंभीर रूप से बीमार बताए जा रहे हैं।
गांव-गांव एक जैसी तस्वीर
एक मीडिया संस्थान की पड़ताल में बोंदारी, कोंडेकसा, मछुरदा, मातला और कोरका जैसे बैगा-गोंड बहुल गांवों में हालात लगभग एक जैसे मिले। कमजोर और कुपोषित बच्चेनजर आए।
कई को तेज बुखार था। मच्छरों का प्रकोप भी हर जगह देखा गया। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 6 महीने से टेक होम राशन नहीं मिला। पिछले 5 साल में मच्छरदानी भी न के बराबर बंटी।
मातला गांव में एक मां का दर्द
जानकारी के अनुसार मातला गांव में तीन बच्चों की जान गई। इनमें दो बच्चे एक ही परिवार के थे। महा सिंह और सतन बाई के बेटे श्याम कुंवर और बेटी समलू, दोनों की मौत हो गई।
सतन बाई बताती हैं कि मार्च-अप्रैल से पहले ही पोषण आहार मिलना बंद हो गया था। रात में बच्चे को तेज बुखार आया, शरीर और मुंह में दाने निकले। कुछ घंटों में उसकी मौत हो गई। सुबह होते-होते दूसरा बच्चा भी नहीं बचा।
सतन बाई ने बताया कि घर में बचे तीन बच्चे भी बेहद कमजोर हैं। हैरानी की बात यह है कि इनका नाम कुपोषित बच्चों की सूची में दर्ज नहीं है।
परिवार दिन में करील, पिहरी और चिरोटा जैसी जंगली भाजी खाकर गुजारा करता है। रात का खाना सिर्फ चावल होता है। कुछ साल पहले नल-जल योजना की टंकी लगी थी, पर पानी कुछ ही दिन आया। अब परिवार हैंडपंप पर निर्भर है।
इसी गांव में तीसरी मौत संताज सिंह के बेटे सदे सिंह की हुई। संताज के घर एक और बच्ची रेशमा भी तेज बुखार में मिली। खबर मिलते ही मेडिकल टीम गांव पहुंची।
मछुरदा में भी वही हाल
मछुरदा गांव में भी तीन बच्चों की मौत हुई है। सगनू मरकाम के बेटे सूरज की जान चली गई। सगनू के तीन बच्चे अभी अस्पताल में भर्ती हैं। एक बच्चे का वजन 10 से 15 किलो के बीच है, जो उम्र के हिसाब से बहुत कम है।
सगनू कहते हैं कि कई महीनों से पोषण आहार नहीं मिला। उनका मानना है कि समय पर राशन मिलता तो शायद बेटा बच जाता।
इसी गांव में एक साल के खवनलाल की भी मौत हुई, जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। तीसरी मौत मंगल के 7 साल के बेटे कुंवरलाल की हुई।
राशन और पानी दोनों का संकट
ग्रामीणों के मुताबिक कागजों में नल-जल योजना (नल-जल योजना की खुली पोल) चालू दिखती है। हकीकत में कई परिवार हैंडपंप पर निर्भर हैं। हैंडपंप बंद होने पर नदी-नालों का पानी इस्तेमाल होता है।
बीमारी होने पर इलाज के लिए झाड़-फूंक, गुनिया और इंजेक्शन पर भरोसा किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में सूजा-पानी कहा जाता है।
कलेक्टर ने क्या कहा
इस मामले में बालाघाट आईएएस कुमार सत्यमने इस मामले पर सफाई दी है। उनका कहना है कि सभी 19 मौतों को हाल की 8 मौतों से जोड़कर देखना सही नहीं है। उनके मुताबिक इनमें से कुछ मौतें काफी पहले की हैं।
कलेक्टर ने यह भी बताया कि ज्यादातर गांव नक्सल प्रभावित रहे हैं। शुरुआत में मरीजों को दवा खिलाना और अस्पताल ले जाना भी मुश्किल था।
आंकड़े क्या कहते हैं
बालाघाट में 5 साल तक के करीब सवा लाख बच्चे हैं। इनमें से 17% बच्चे कुपोषित या अति गंभीर कुपोषित हैं। जिन इलाकों में मौतें हुई हैं, वहां 36% बच्चों का विकास तय मानकों से कम है। 33% बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के हैं।
मलेरिया में भी बालाघाट सबसे आगे
मलेरिया के मामले में भी बालाघाट प्रदेश में सबसे आगे रहा है। साल 2022 में प्रदेश के कुल मलेरिया मामलों में बालाघाट की हिस्सेदारी 50% थी।
2023 में यह बढ़कर 51.5% और 2024 में 57% हो गई। 2025 में यह घटकर 30% रह गई। इसके बावजूद पिछले 5 साल में मच्छरदानी का वितरण बहुत कम रहा।
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