एमपी इको टूरिज्म मॉडल छाया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, दिल्ली में क्यों हो रही तारीफ
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में स्थित है। यह रिजर्व (एमपी टाइगर रिजर्व) बाघों के घनत्व के लिए देशभर में जाना जाता है। सालों से यहां के आसपास के गांव पर्यटन पर काफी हद तक निर्भर रहे हैं।
पहले पर्यटन का फायदा सीमित लोगों तक ही पहुंच पाता था। अब राजस्व-साझाकरण मॉडल की वजह से यह फायदा पूरे समुदाय तक पहुंच रहा है।
दिल्ली में हुई खास कार्यशाला
नई दिल्ली में दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुई थी। इसका विषय था टाइगर लैंडस्केप, संरक्षण और इकोटूरिज्म। यह कार्यशाला 2 और 3 सितंबर को हुई थी।
इसे इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस, एशियन डेवलपमेंट बैंक और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने मिलकर आयोजित किया।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसमें भारत के अलावा भूटान, बांग्लादेश, कंबोडिया, नेपाल, वियतनाम और मलेशिया के प्रतिनिधि शामिल हुए।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, आईयूसीएन और यूएनडीपी जैसे संगठनों के विशेषज्ञ भी मौजूद रहे।
क्या है बांधवगढ़ मॉडल की खासियत
मध्य प्रदेश के फील्ड डायरेक्टर डॉ. अनुपम सहाय ने बांधवगढ़ का मॉडल पेश किया। उन्होंने बताया कि यह मॉडल सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं है। स्थानीय गाइड और वाहन चालक पर्यटकों को जंगल तक ले जाते हैं। साथ ही वे उन्हें जिम्मेदार पर्यटन के बारे में भी जागरूक करते हैं।
इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत राजस्व-साझाकरण व्यवस्था है। पर्यटन से होने वाली कुल कमाई का एक-तिहाई हिस्सा सीधे स्थानीय समुदायों को दिया जाता है। इससे रिजर्व के आसपास के गांवों में रोजगार के नए मौके बने हैं। साथ ही पर्यटन में स्थानीय भागीदारी भी बढ़ी है।
होमस्टे से लेकर जिप्सी सफारी तक
प्रस्तुति में कई तरह की गतिविधियों का जिक्र हुआ। इनमें समुदाय द्वारा संचालित होमस्टे शामिल हैं। इसके अलावा जिप्सी संचालन और पारंपरिक भोजन के स्टॉल भी इसका हिस्सा हैं। गाइडिंग सेवाएं और आसपास के होटलों व रिसॉर्ट्स में रोजगार भी इस मॉडल में शामिल हैं।
इस तरह स्थानीय लोगों को सीधा फायदा मिल रहा है। वे अब सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि पर्यटन व्यवसाय के भागीदार बन गए हैं।
किस सत्र में हुई चर्चा
इकोटूरिज्म और सामुदायिक भागीदारी नाम से एक खास सत्र आयोजित हुआ। इसमें होमस्टे, गाइडिंग, राजस्व-साझाकरण और आगंतुक प्रबंधन पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता मध्य प्रदेश के पीसीसीएफ एवं वन बल प्रमुख सुभारंजन सेन ने की।
संरक्षण को आर्थिक मॉडल से जोड़ने की कोशिश
कार्यशाला में सिर्फ पर्यटन पर बात नहीं हुई। गैर-इमारती वनोपज और कार्बन क्रेडिट पर भी चर्चा हुई। मकसद यह था कि बाघ परिदृश्यों को आजीविका का स्थायी स्रोत बनाया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं। बांधवगढ़ का उदाहरण इसी सोच को साबित करता है। वर्कशॉप में मौजूद कई देशों में भी बाघ पाए जाते हैं। लेकिन वहां समुदाय आधारित मॉडल अभी उतने विकसित नहीं हैं। बांधवगढ़ का अनुभव उन्हें एक रास्ता दिखा सकता है।
सहाय का न्योता और आखिरी बात
प्रस्तुति के अंत में डॉ. सहाय ने सभी प्रतिनिधियों को मध्य प्रदेश आने का न्योता दिया। उन्होंने अपनी बात एक दिलचस्प वाक्य से खत्म की। उन्होंने कहा कि हम आपसे बस एक दहाड़ की दूरी पर हैं, कभी भी, किसी भी दिन।
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