रसूखदारों ने बदला जंगल का भूगोल, बांधवगढ़ रिजर्व में खतरे में बाघों की जिंदगी
समझें क्या है पूरा मामला...
- बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर एरिया से लगे गांवों में होटल, होम स्टे और रिसॉर्ट्स का निर्माण हो रहा है।
- करीब 500 एकड़ से ज्यादा जमीन पर यह निर्माण हो रहा है। इससे जंगल का भूगोल बदल रहा है।
- रिसॉर्ट्स और सड़कों के बनने से बाघ-हाथी कॉरिडोर पर दबाव बढ़ रहा है।
- रसूखदारों और निवेशकों पर बेनामी सौदे करने के आरोप लग रहे हैं।
- वन विभाग के कर्मचारियों की साठगांठ और कीमती लकड़ियों की चोरी भी सामने आई है।
बांधवगढ़ नेशनल पार्क से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां रहने वाले बाघ और अन्य वन्यजीवों की जिंदगी अब खतरे में पड़ती दिख रही है।
जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ के कोर और बफर जोन से सटे इलाकों में धड़ल्ले से नए-नए होटल, होम स्टे और रिसॉर्ट्स बनाए जा रहे हैं। ताला, मगधी, मझोली और पनपथा रेंज के पास स्थित कई गांवों से हैरान करने वाली बात का पता चला है।
500 एकड़ जमीन पर कंक्रीट का जाल
स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 500 एकड़ से भी ज्यादा की जमीन पर कंस्ट्रक्शन चल रहा है। ये सभी जमीनें बिल्कुल कोर एरिया से लगी हुई हैं।
हद तो यह है कि कुछ रिसॉर्ट्स तो जंगल के अंदर कई किलोमीटर तक घुसकर बनाए जा चुके हैं। बांधवगढ़ में पहले से ही 55 होटल और रिसॉर्ट्स चल रहे हैं।
अब ये 125 नए निर्माण इस खूबसूरत जंगल का पूरा नक्शा ही बदलने पर तुले हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से कई निर्माण एजेंसियां दक्षिण भारत की हैं।
आदिवासियों की जमीन पर कब्जा?
जानकारी के अनुसार जंगल के अंदर और आसपास की बहुत सी जमीनें राजस्व भूमि हैं। इन्हें या तो सीधे खरीदा जा रहा है या फिर लीज पर लिया जा रहा है।
कई मामलों में तो आदिवासियों की जमीनों का इस्तेमाल बड़े-बड़े निवेशक और रसूखदार लोग कर रहे हैं। कुछ समय पहले आयकर विभाग ने भी बफर जोन में हुई आदिवासियों की जमीन के बेनामी सौदों की जांच की थी।
बाघ-हाथी कॉरिडोर पर मंडराता खतरा
बांधवगढ़ का पनपथा और उसके आसपास का इलाका हाथियों और बाघों के आने-जाने का एक मुख्य रूट माना जाता है। पिछले कुछ समय में यहां हाथियों की हलचल ज्यादा बढ़ी है। वहींअब इसी रास्ते पर बड़ी-बड़ी बाउंड्रीवॉल, रिसॉर्ट्स, पक्की सड़कें और निजी इमारतें खड़ी की जा रही हैं।
| प्रभावित क्षेत्र और रूट | मुख्य समस्याएं | वन्यजीवों पर असर |
| पनपथा और आसपास का इलाका | रिसॉर्ट्स, बाउंड्रीवॉल और सड़कों का निर्माण | प्राकृतिक रास्ते बंद होना |
| कोर और बफर से लगे 7+ गांव | 500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में कंक्रीट का ढांचा | मानव-वन्यजीव संघर्ष और मौतें |
| जंगल के अंदरूनी हिस्से | नई सड़कों का जाल और गाड़ियों की आवाजाही | दुर्घटनाओं का खतरा और जल स्रोत खत्म होना |
इस अंधाधुंध निर्माण की वजह से जानवरों के प्राकृतिक रास्ते बंद हो रहे हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि इंसान और जानवरों के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है।
बीट गार्ड और रेंजर की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी उंगलियां उठ रही हैं। वहीं रिसॉर्ट्स में जंगल की कीमती लकड़ियों का इस्तेमाल होते हुए देखा गया।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि रसूखदार निवेशकों और वनकर्मियों की साठगांठ से जंगल की कीमती लकड़ियां चोरी-छिपे काटी जा रही हैं। साथ ही उन्हें रिसॉर्ट्स में लगाया जा रहा है।
इतना ही नहीं इन होटलों को बनाने के लिए जंगल की नदियों से अवैध रूप से रेत (अवैध खनन) भी निकाली जा रही है।
जंगल के सीने पर दौड़ती गाड़ियां
होटल और रिसॉर्ट्स तक पहुंचने के लिए जंगल के अंदर नई-नई सड़कें बनाई जा रही हैं। इससे जंगल के अंदर गाड़ियों की आवाजाही बहुत बढ़ जाएगी। सड़क नेटवर्क बढ़ने से वन्यजीवों की आजादी छिन जाएगी। उनके गाड़ियों की चपेट में आने यानी दुर्घटनाओं का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।
सत्ता, पर्यटन और जमीन का बड़ा खेल
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन सब निर्माणों की अनुमति कौन दे रहा है? इस सवाल के पीछे एक बड़ा गठजोड़ सामने आ रहा है।
बताया जा रहा है कि देश के कई बड़े राजनेताओं और कारोबारी परिवारों ने इस इलाके में महंगी जमीनें खरीदी हैं। पर्यटन प्रोजेक्ट्स में बहुत बड़ा निवेश किया गया है।
स्थानीय स्तर से लेकर बड़े राजनीतिक गलियारों तक इस खेल में कई रसूखदार लोगों के नाम हैं। इनमें विधायक, पूर्व मंत्री, सांसद और यहां तक कि कई राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्रियों के परिवारों की भागीदारी की चर्चाएं गर्म हैं।
नेताओं के साथ-साथ प्रशासन के बड़े-बड़े सीनियर अफसरों ने भी यहां जमीनें खरीदी हैं।
क्या पर्यटन की कोई सीमा नहीं है?
बांधवगढ़ जैव विविधता की एक अनमोल धरोहर है। कोर और बफर जोन में इसी तरह बिना सोचे-समझे और बिना किसी रोक-टोक के निर्माण कार्य चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब बांधवगढ़ से बाघ और हाथी हमेशा के लिए गायब हो जाएंगे।
उमरिया आईएएस राखी सहाय ने कहा कि फिलहाल किसी भी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं दी जा रही है। इसे ईको सेंसिटिव जोन माना गया है। इसके लिए एक कमेटी बनाई जाएगी। इस कमेटी में फील्ड डायरेक्टर, कमिश्नर और अन्य अफसर शामिल होंगे। सिर्फ वही लोग अनुमति देंगे।
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