उजाले अपनी यादों के… बशीर बद्र की जिंदगी की शाम और भोपाल से उनका अनमोल रिश्ता
शायर-ए-बदनाम (जैसा कि वह खुद को कभी-कभी मज़ाक में कहते थे) और उर्दू अदब के चमकते सितारे डॉ. बशीर बद्र का भोपाल से रिश्ता महज़ एक शहर में रहने जैसा नहीं था, बल्कि भोपाल उनके वजूद और उनकी शायरी का एक बेहद खूबसूरत हिस्सा रहा है। आज जब बशीर बद्र इस दुनिया से रूखसत हो गए हैं तो भोपाल की शायरी में एक खालीपन भी छोड़ गए।
भोपाल और बशीर बद्र जी के इस गहरे रिश्ते को हम कुछ मुख्य बिंदुओं के ज़रिए विस्तार से समझते हैं:
भोपाल: ज़िंदगी का आखिरी और सबसे लंबा पड़ाव
बशीर बद्र साहब का जन्म भले ही अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पढ़ाई और मेरठ में नौकरी की, लेकिन 1989 के मेरठ दंगों के बाद जब उनका घर और उनकी ज़िंदगी भर की कमाई (शायरी की डायरियां) जलकर खाक हो गई, तो उन्होंने भोपाल का रुख किया।
भोपाल ने उन्हें उजाड़ से निकालकर फिर से बसाया। उन्होंने भोपाल के 'नेहरू नगर' इलाके में अपना आशियाना बनाया और जीवन के आखिरी तीन-चार दशक इसी शहर को समर्पित कर दिए।
भोपाल की तहज़ीब और बशीर साहब की शायरी
भोपाल अपनी ख़ास गंगा-जमुनी तहज़ीब, नवाबी इतिहास और उर्दू अदब (साहित्य) के लिए जाना जाता है। बशीर बद्र साहब की शायरी में जो ठहराव, सादगी और नज़ाकत देखने को मिलती है, उसे भोपाल की हवाओं ने और निखारा। भोपाल के मुशायरों की वह शान हुआ करते थे। उन्होंने खुद भोपाल के बारे में लिखा था:
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।"
भोपाल की गलियों ने उनकी इस "ज़िन्दगी की शाम" को बेहद संवारा।
मध्य प्रदेश सरकारों ने दिया सम्मान (अकादमी की सदारत)
भोपाल में रहते हुए बशीर बद्र साहब को वह सम्मान मिला जिसके वह हकदार थे। वह लंबे समय तक मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष (सदर) भी रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भोपाल और पूरे मध्य प्रदेश में उर्दू अदब को बढ़ावा देने, नए शायरों को मंच देने और मुशायरों की संस्कृति को जिंदा रखने में बड़ा योगदान दिया।
पद्मश्री का सफर और भोपाल का गौरव
साल 1999 में जब बशीर बद्र साहब को भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया, तब वह भोपाल में ही रह रहे थे। इसके अलावा उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से भी नवाजा गया। इन सम्मानों ने भोपाल के साहित्यिक इतिहास में एक और सुनहरा पन्ना जोड़ दिया। भोपाल के लोग उन्हें अपने शहर का गौरव मानते हैं।
बुढ़ापा, बीमारी और भोपाल का साथ
ज़िंदगी के आखिरी सालों में बशीर साहब 'डिमेंशिया' (भूलने की बीमारी) जैसी गंभीर बीमारी से जूझने लगे। वह अपनी ही लिखी हुई मशहूर गज़लें भूलने लगे थे। ऐसे मुश्किल वक्त में भोपाल की आबो-हवा, उनके परिवार (उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र) और भोपाल के चाहने वालों ने उन्हें बहुत मानसिक सुकून दिया। वह अक्सर भोपाल की सड़कों और झीलों के किनारे सुकून तलाशते देखे जाते थे।
संक्षेप में कहें, तो मेरठ ने अगर बशीर बद्र को दर्द दिया, तो भोपाल ने उस दर्द पर मरहम लगाया। बशीर बद्र जी के बिना भोपाल के साहित्यिक इतिहास की बात अधूरी है और भोपाल के ज़िक्र के बिना बशीर बद्र की जीवनी अधूरी है। उन्होंने भोपाल को अपना घर बनाया और भोपाल ने उन्हें अपने सिर आंखों पर बिठाया।
यह खबरें भी पढ़ें..
बकरीद के दिन उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, लिखा था- यूं कोई बेवफा नहीं होता...
भोपाल के मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन, पढ़ें टॉप 7 शायरी
पढ़ें मशहूर शायर बशीर बद्र के वो शेर जो बॉलीवुड फिल्मों में हुए सुपरहिट
क्या है डिमेंशिया बीमारी, जिससे पीड़ित थे मशहूर शायर बशीर बद्र