जिस देव दत्तात्रेय मंदिर में था प्रवेश वर्जित अब उसी की मुखिया बनी OBC महिला

Neel Tiwari | Jun 08, 2026, 21:54 IST
देव दत्तात्रेय मंदि में था प्रवेश वर्जित
सागर जिले के गौरझामर देव दत्तात्रेय मंदिर को हाईकोर्ट ने सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित किया। कोर्ट ने सरकार के अधिकार को भी मान्यता दी। सरकार गलत तरीके से जारी अधिसूचनाएं किसी भी समय वापस ले सकती है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • सागर के गौरझामर स्थित देव दत्तात्रेय मंदिर को हाईकोर्ट ने पुनः सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित किया।
  • वर्ष 2005 में मंदिर को सार्वजनिक ट्रस्ट से निजी ट्रस्ट में बदला गया था।
  • शासन ने 2007 में उक्त आदेश को निरस्त कर सार्वजनिक ट्रस्ट की स्थिति बहाल की थी।
  • हाईकोर्ट ने शासन के आदेश को सही ठहराते हुए पुजारी पक्ष की याचिका खारिज कर दी।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर के अनुसार ट्रस्टियों ने रजनी कुशवाहा को मंदिर की महत्त्मकार नियुक्त किया है।

21 साल पुराना देव दत्तात्रेय मंदिर विवाद

सागर जिले के गौरझामर देव दत्तात्रेय मंदिर का करीब दो दशक पुराना विवाद समाप्त हुआ। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मंदिर और जुड़ी कृषि भूमि को सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित किया। याचिका जिसमें मंदिर को निजी ट्रस्ट बनाने की मांग थी, खारिज कर दी गई। इस फैसले से मंदिर के प्रबंधन और संचालन की अनिश्चितता खत्म हो गई।



1942 में स्थापित हुआ था सार्वजनिक ट्रस्ट

गौरझामर क्षेत्र के देव दत्तात्रेय मंदिर का निर्माण 1942 में रतन सिंह लोधी की नानी ने कराया। मंदिर के संचालन के लिए लगभग तीन एकड़ भूमि भगवान देव दत्तात्रेय को समर्पित की गई। महत्त्मकार के रूप में विश्वनाथ राव शेंडे को नियुक्त किया गया। इसके साथ ही सार्वजनिक ट्रस्ट का गठन किया गया। शासन के अभिलेखों में भी मंदिर सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में दर्ज है।



दूसरे पक्ष ने किया भूमि को खरीदने का दावा

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनके पूर्वज पंडित विश्वनाथ शिंदे ने 1943 में भूमि खरीदी थी। उनका कहना था कि मंदिर एक निजी पारिवारिक धार्मिक संस्था है। हालांकि 1970 में मंदिर को मध्य प्रदेश पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1951 के तहत सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत कर दिया गया। इससे मंदिर सरकारी निगरानी और कानूनी प्रावधानों के दायरे में आ गया।



कीमती जमीन पर बढ़ी नजर

समय के साथ मंदिर के आसपास बस स्टैंड और नगर की आबादी विकसित हुई। मंदिर से जुड़ी भूमि का बाजार मूल्य काफी बढ़ गया। आरोप है कि पुजारी पक्ष ने 5 जनवरी 2005 को अन्य ट्रस्टियों को बताए बिना मंदिर को निजी ट्रस्ट में बदलवाया। इसके बाद आम श्रद्धालुओं के प्रवेश और धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगने लगे।



ट्रस्टियों ने शासन के सामने उठाया विरोध

अन्य ट्रस्टियों को परिवर्तन की जानकारी मिलने पर उन्होंने धर्मस्व विभाग और मंत्रालय में आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि निजी ट्रस्ट में बदलने की प्रक्रिया नियमों के खिलाफ और अधिकार क्षेत्र से बाहर थी। सुनवाई के बाद मध्य प्रदेश शासन ने 13 सितंबर 2007 को आदेश पारित किया। 5 जनवरी 2005 की कार्रवाई को शून्य घोषित कर मंदिर की सार्वजनिक ट्रस्ट की स्थिति बहाल कर दी गई।



हाईकोर्ट में पहुंचा मामला

शासन के आदेश को चुनौती देते हुए अरुण कुमार शेंडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रस्ट अधिनियम की धारा 36 के तहत शासन पूर्व आदेश बदलने का अधिकार नहीं रखता। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, यशवंत सिंह लोधी और भूमिका केशवानी ने कहा कि 2005 में तथ्य छिपाकर सार्वजनिक ट्रस्ट को निजी ट्रस्ट में बदलना अवैध था।



सरकार को अधिसूचना वापस लेने का अधिकार

विस्तृत सुनवाई के बाद जस्टिस दीपक कुमार खोत की एकलपीठ ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सामान्य पुस्तक परिपत्र और कानूनी प्रावधानों के तहत सरकार आदेश वापस या संशोधित कर सकती है। कोर्ट ने 2007 में शासन के आदेश को वैध ठहराया। याचिका खारिज कर दी गई।



श्रद्धालुओं के लिए खुले मंदिर के द्वार

हाईकोर्ट के फैसले के बाद मंदिर प्रबंधन में बड़ा बदलाव हुआ। ट्रस्टियों ने पूजा और व्यवस्थापन की जिम्मेदारी कुमारी रजनी कुशवाहा को महत्त्मकार के रूप में सौंप दी। उन्हें मासिक वेतन मिलेगा। पुलिस की मौजूदगी में मंदिर आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। इससे क्षेत्र के लोग वर्षों बाद दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकेंगे।



संरक्षण पर नजीर बना फैसला

कानूनी जानकारों का मानना है कि फैसला केवल मंदिर विवाद तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्टों की संपत्तियों के संरक्षण और पारदर्शी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण नजीर है। न्यायालय ने कहा कि किसी सार्वजनिक संपत्ति को गलत जानकारी या नियमों की अनदेखी से बदला गया तो सरकार उसे सुधार सकती है। पूर्व स्थिति बहाल करने की शक्ति भी सरकार के पास है।



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