बंगाल का गौरव एमपी में डालेगा डेरा, स्वाद के साथ ही पैसे कमाकर देगी हिलसा
Gandhi Sagar dam fishing: मछलियों की लजीज किस्मों का जिक्र आते ही सबसे पहले पश्चिम बंगाल का नाम जेहन में आता है, लेकिन अब मध्यप्रदेश भी इस मामले में तेजी से आगे निकल रहा है। पश्चिम बंगाल की लोकप्रिय 'हिलसा' मछली को अब मध्य प्रदेश या इसके आसपास के जलीय इलाकों में नया घर मिलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। पर्यावरणीय परिस्थितियों में आए बदलावों के कारण नर्मदा नदी में हिलसा की मौजूदगी में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसके बाद से विशेषज्ञों ने इसे लेकर नई संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं।
सिर्फ हिलसा ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के मीठे पानी की मछलियों का स्वाद आज दिल्ली से लेकर कोलकाता और सिलीगुड़ी तक के बाजारों में धूम मचा रहा है। मंदसौर स्थित गांधी सागर बांध के मछली पकड़ने के ठेके इस बार 126 करोड़ रुपये में फाइनल हुए हैं, जो इस कारोबार की विशालता को साफ बयां करते हैं।
गांधीसागर बांध में 50 से अधिक प्रजातियों का डेरा
मंदसौर के गांधी सागर डैम में मछली पकड़ने का मुख्य सीजन आधिकारिक रूप से शुरू हो चुका है। सीजन की शुरुआत से पहले पूरी परंपरा के साथ पूजा-पाठ किया जाता है, जिसके बाद नावें नदी में उतरती हैं। इस विशाल बांध में 50 से अधिक प्रजातियों की मछलियां पाई जाती हैं, जिनमें उत्तर और पूर्वी भारत के बाजारों के लिए कई दुर्लभ नस्लें भी शामिल हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, हर दूसरे दिन लगभग 50 टन मछलियां निकालने के लिए 25 मछुआ सहकारी समितियों के 2,800 सदस्य करीब 1,000 नावों के साथ इस अभियान में जुटे हैं। इस भारी-भरकम ठेके से स्थानीय मछुआरों के लिए रोजगार के द्वार भी खुल गए हैं।
क्या मध्य प्रदेश में संभव है हिलसा का उत्पादन?
मछुआरों और जानकारों के बीच इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बंगाल की शान कही जाने वाली 'हिलसा' मछली का उत्पादन मध्य प्रदेश में भी संभव है?
मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय (गुजरात) के असिस्टेंट प्रोफेसर एएम परमार के अनुसार, हिलसा एक 'एनाड्रोमस' (Anadromous) यानी प्रवासी मछली है। इसका मतलब यह है कि यह अपना ज्यादातर जीवन समंदर में बिताती है, लेकिन अंडे देने (प्रजनन के लिए) नदियों के मीठे पानी की ओर रुख करती है। चूंकि नर्मदा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश से होता है और इसका सीधा संगम खारे पानी से गुजरात में जाकर होता है, इसलिए विशेषज्ञ इसे गुजरात के नर्मदा क्षेत्र में नया ठिकाना देने की योजना पर विचार कर रहे हैं।
चंबल और गांधीसागर की मछलियों की बंगाल-दिल्ली में भारी मांग
नर्मदा की तरह ही चंबल नदी के मीठे पानी की मछलियों की तासीर भी कुछ ऐसी है कि बंगाल और दिल्ली के बाजारों में इनकी मांग हमेशा बनी रहती है। मछली पालन के जानकार और समितियों से जुड़े पूरन माटा बताते हैं कि कुछ समय तक ठेका प्रक्रिया न होने के कारण महानगरों तक सप्लाई प्रभावित हुई थी, लेकिन अब हालात सुधर गए हैं।
चंबल और गांधीसागर के मीठे पानी में रोहू, कतला, बाम, सांबल, बाचा, सिंगाड़ और खुरसा जैसी दर्जनों किस्में मिलती हैं। इनमें भी 'महासीर', 'मृगल' और 'डींगल' की डिमांड सबसे अधिक है। खास तौर पर मध्य प्रदेश की राजकीय मछली घोषित 'महासीर' अपने अनोखे स्वाद और वाइट मीट की वजह से देश भर में पसंद की जाती है, जो गांधीसागर डैम के बाद के हिस्सों में प्रचुर मात्रा में मिलती है।
सड़क और रेल मार्ग से होती है मछलियों की एक्सपोर्टिंग
गांधी सागर डैम का कैचमेंट एरिया 22,584 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां से पकड़ी जाने वाली मछलियों को आधुनिक तरीकों से पैक कर सड़क मार्ग के जरिए सिलीगुड़ी और कोलकाता तक पहुंचाया जाता है। इसके अलावा, दिल्ली और पंजाब के तमाम शहरों के लिए भी ट्रेन और ट्रकों के जरिए मछलियों का ट्रांसपोर्टेशन बड़े पैमाने पर होता है।
मछली पालन विभाग के क्षेत्रीय प्रबंधक महेंद्र उईके का कहना है कि इस साल 1 अरब 26 करोड़ रुपये का बड़ा फिशिंग कॉन्ट्रैक्ट होने से इस कारोबार को नई रफ्तार मिली है। मध्य प्रदेश की मीठी जलधाराओं में पलने वाली ये मछलियां अब देश के बड़े मछली बाजारों की रौनक बढ़ा रही हैं, और आने वाले दिनों में प्रवासी मछलियों के उत्पादन को लेकर नए प्रयोग राज्य के मत्स्य उद्योग को एक नई ऊंचाई पर ले जा सकते हैं।
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