बंगाल में विजयवर्गीय की नींव पर भूपेंद्र-सुनील का मास्टरस्ट्रोक, CG के नेताओं का कैमियो भी कमाल
NEW DELHI: देश के पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने सियासत का पूरा नक्शा बदल दिया है। पश्चिम बंगाल, असम और पुदुचेरी में बीजेपी ने जबरदस्त जीत दर्ज कर अपनी ताकत साबित की है, तो केरल में कांग्रेस ने वापसी के संकेत देकर नई ऊर्जा हासिल की है। सबसे बड़ा उलटफेर तमिलनाडु में हुआ, जहां अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने ऐसा इतिहास रचा, जिसने सभी को चौंका दिया। इन नतीजों के पीछे सिर्फ स्थानीय समीकरण ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के दिग्गज नेताओं की रणनीति और मेहनत भी निर्णायक रही है। द सूत्र ने इसी पूरे समीकरण की गहराई से पड़ताल की है… पढ़िए यह खास रिपोर्ट!
पश्चिम बंगाल: कैलाश ने तैयार की थी बंगाल की जमीन
पश्चिम बंगाल की राजनीति का जिक्र हो और मध्यप्रदेश के दिग्गज बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय का नाम सामने न आए तो तस्वीर अधूरी रह जाती है। विजयवर्गीय बीजेपी के उन चुनिंदा नेताओं में हैं, जिन्होंने बंगाल में बीजेपी को जीरो से खड़ा करने में निर्णायक भूमिका निभाई है। मध्यप्रदेश सरकार में मौजूदा नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय वर्ष 2015 से मई 2021 तक पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रभारी रहे और इसी दौरान उन्होंने पार्टी के लिए मजबूत जमीन तैयार की।
2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जो पकड़ नजर आई, उसकी बुनियाद इसी दौर में रखी गई। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पहली बार बंगाल में दहाई का आंकड़ा पार करते हुए 42 में से 18 सीटें जीतीं। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 77 सीटों तक पहुंची, जबकि 2016 में बीजेपी महज 6 सीटों पर सिमट गई थी। साफ है कि बंगाल में बीजेपी के उभार में विजयवर्गीय की रणनीति और संगठन विस्तार का बड़ा योगदान रहा।
बच्चा बेचने का लगा गंभीर आरोप
कैलाश विजयवर्गीय ने खुद भी बंगाल के अपने अनुभवों को बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, वहां उन पर और संघ के प्रचारकों पर गंभीर अत्याचार हुए। उनके खिलाफ दुष्कर्म और विदेश में बच्चा बेचने जैसे गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज किए गए। कुल 38 मुकदमे उन पर लाद दिए गए। यही वजह रही कि इस बार वे चुनाव प्रचार में नहीं गए, क्योंकि पार्टी को आशंका थी कि ममता सरकार की पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है।
बमबाजी की घटनाएं आम थीं
विजयवर्गीय ने बंगाल की कानून-व्यवस्था पर भी तीखा हमला बोला। उनका कहना है कि वहां गुंडों को खुला संरक्षण मिला, चुनाव के दौरान बमबाजी और पत्थरबाजी जैसी घटनाएं आम रहीं। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें घेर लिया गया था और स्थिति बेहद गंभीर हो गई थी। उनके मुताबिक, केंद्रीय मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद तत्कालीन डीजीपी को फोन कर उन्हें सुरक्षा दिलाई गई, जिससे उनकी जान बच सकी। उन्होंने बताया कि उस कठिन माहौल में भी बीजेपी ने संगठन निर्माण पर पूरा जोर लगाया। ब्लॉक स्तर तक पार्टी को खड़ा किया गया, कार्यकर्ताओं को जोड़ा गया और संघ के प्रचारकों ने दिन-रात मेहनत कर मजबूत ढांचा तैयार किया।
फिर भूपेंद्र यादव और सुनील बंसल का कमाल
पश्चिम बंगाल का चुनाव भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे कठिन और हिंसक संघर्षों में से एक माना जाता रहा है, लेकिन इस बार भाजपा ने वहां 200 से अधिक सीटें जीतकर जो ऐतिहासिक करिश्मा किया है, उसके पीछे दो नाम प्रमुख रहे। एक केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और दूसरे सुनील बंसल।
भूपेंद्र यादव अलवर से सांसद और मोदी सरकार में कद्दावर कैबिनेट मंत्री हैं। वे अपनी शांत और गंभीर कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्हें जब बंगाल का चुनाव प्रभारी बनाया गया तो चुनौती हिमालय जैसी थी, लेकिन यादव ने सुनील बंसल (मूल निवासी कोटपूतली, राजस्थान) के साथ मिलकर वह किया, जिसकी कल्पना तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भी नहीं की थी। आपको बता दें कि इन दोनों दिग्गजों ने चुनाव को केवल बड़े मंचों और रैलियों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे 40 हजार बूथों तक पहुंचाया। राजस्थान के 'कोटपूतली' और 'अलवर' की सीमाओं की तरह ही इन दोनों नेताओं की ट्यूनिंग सटीक थी।
पन्ना प्रमुख मॉडल बड़ा फैक्टर
यादव और बंसल ने बंगाल में 'पन्ना प्रमुख' मॉडल लागू किया, जहां हर कार्यकर्ता को कुछ चुनिंदा मतदाताओं की जिम्मेदारी दी गई। हजारों छोटी बैठकों और निरंतर संपर्क अभियानों ने भाजपा के कैडर को बंगाल की गलियों में सक्रिय कर दिया। 30 मई को जब भूपेंद्र यादव संक्षिप्त प्रवास पर अलवर आए थे, तो उनके चेहरे की मुस्कान ने ही परिणामों की भविष्यवाणी कर दी थी। जीत के बाद उन्होंने 'अलवर के नाम अपनी पाती' में लिखा, यह जनादेश भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध जनता की स्पष्ट आवाज है। यह केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि सुशासन पर मुहर है। आपको बता दें कि भूपेंद्र यादव का ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। बिहार, मणिपुर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और अब पश्चिम बंगाल के बाद उन्हें भाजपा का सबसे बड़ा इलेक्शन विनर बनाता है।
छत्तीसगढ़ ने भी किया कमाल
पश्चिम बंगाल चुनाव में छत्तीसगढ़ बीजेपी की रणनीतिक मौजूदगी भी असरदार साबित हुई। छत्तीसगढ़ बीजेपी के संगठन मंत्री पवन साय ने चुनाव से करीब आठ महीने पहले ही बंगाल में डेरा जमा लिया था। उन्हें 58 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिनमें से 56 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की। इन सीटों में आसनसोल के आसपास का इलाका, बिहार और झारखंड की सीमा से जुड़ी सीटें, साथ ही वर्धमान जिले का बड़ा हिस्सा शामिल था।
पवन साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ से पांच सदस्यीय टीम लगातार मैदान में सक्रिय रही। इस टीम में खनिज विकास निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह और हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव जैसे नेता भी शामिल थे, जिन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम किया। जीत के बाद पवन साय ने इसका श्रेय कार्यकर्ताओं और जनता को देते हुए कहा कि यह जनादेश सत्ता विरोधी माहौल, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ है।
जहां कम सीटें मिली थीं, वहां किया फोकस
सौरभ सिंह ने भी व्यापक स्तर पर काम किया। उन्होंने 51 से अधिक सीटों पर सक्रिय भूमिका निभाई, जहां पिछली बार बीजेपी को महज एक सीट मिली थी, लेकिन इस बार 45 सीटों पर जीत हासिल हुई। इसके अलावा उन्होंने 12 विशेष सीटों पर भी काम किया, जिनमें से 10 सीट बीजेपी के खाते में आईं। वे पिछले तीन महीनों से लगातार पश्चिम बंगाल में डटे हुए थे। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव को छह संवेदनशील सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां संगठन और चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने पर खास ध्यान दिया गया।
सीएम ने आदिवासी बहुल इलाकों पर दिया जोर
वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अनुसूचित जनजाति (ST) बहुल क्षेत्रों में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। राज्य की 16 एसटी आरक्षित सीटों पर बीजेपी की जीत ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। आदिवासी इलाकों में पकड़ मजबूत करने के लिए उन्हें पश्चिम बंगाल के ‘जंगल महल’ क्षेत्र में प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी।
विष्णुदेव साय ने झारग्राम जिले की झारग्राम, बिनपुर, नयाग्राम और गोपीबल्लवपुर विधानसभा सीटों पर रैलियां, रोड शो और जनसभाएं कीं और नतीजों में इन सभी सीटों पर बीजेपी को जीत मिली है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जंगल महल लंबे समय से ‘स्विंग जोन’ माना जाता है, जहां आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं और इस बार इस क्षेत्र में बीजेपी की सफलता ने पूरे चुनावी समीकरण को प्रभावित किया।
केरल में पायलट का 'मैजिक'
एक तरफ जहां बंगाल में भगवा लहरा रहा था, वहीं दक्षिण के राज्य केरल में कांग्रेस की 10 साल बाद शानदार वापसी की पटकथा राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट लिख रहे थे। सचिन पायलट को अक्सर उनकी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ के लिए जाना जाता है, लेकिन केरल में उन्होंने खुद को एक कुशल संगठक के रूप में पेश किया। पायलट ने केरल में टिकट वितरण के दौरान संतुलन साधा, जिससे कांग्रेस की पारंपरिक गुटबाजी कम हुई। उन्होंने केरल के 14 में से 10 जिलों का सघन दौरा किया। प्रतिदिन 5-6 रैलियां और रोड शो करके उन्होंने कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया। जिन 55 सीटों पर पायलट ने विशेष ध्यान दिया, वहां कांग्रेस को अप्रत्याशित जीत मिली।
असम का अंधेरा और जितेंद्र सिंह का इस्तीफा
हर चुनाव केवल जीत की कहानियां नहीं लाता। असम में कांग्रेस की करारी हार ने राजस्थान के एक और दिग्गज भंवर जितेंद्र सिंह को गहरे संकट में डाल दिया। अलवर के रहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह असम के प्रभारी थे। उम्मीद थी कि वहां कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाएगी, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहे। इसके बाद उन्होंने महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। जितेंद्र सिंह ने लिखा, असम के चुनाव परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं। मैं इस परिणाम के लिए अपनी भूमिका की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। मेरे हटने से संगठन को नई दिशा मिलेगी।
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