एमपी आबकारी विभाग के अफसरों ने उड़ाई नियमों की धज्जियां, सरेआम जलाए सालों पुराने रिकॉर्ड
News in Short
- मध्यप्रदेश आबकारी विभाग के भोपाल दफ्तर में दशकों पुराने रिकॉर्ड जलाए गए हैं।
- नियम कहता है रिकॉर्ड नष्ट करने के लिए कतरन यानी श्रेडिंग (Shredding) जरूरी है, जलाना नहीं।
- 1983 से 2023 तक के विभागीय केस, पंजियां और सेवा डॉक्यूमेंट राख हुए हैं।
- आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने जांच के आदेश दिए हैं।
- एडिशनल कमिश्नर मुकेश नेमा ने इसे नियम के अनुसार बताया है।
News In Detail
भोपाल दफ्तर में जले रिकॉर्ड
भोपाल स्थित आबकारी विभाग के राज्य स्तरीय दफ्तर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां अधिकारियों और कर्मचारियों ने परिसर में ही दर्जनों फाइलें आग के हवाले कर दीं। जलती फाइलों का धुआं बाहर तक दिखाई दिया, जिससे पूरे मामले पर सवाल उठने लगे हैं।
क्या था नियम?
दरअसल, सरकारी नियमों के अनुसार पुराने रिकॉर्ड को नष्ट करने की एक तय प्रक्रिया है। इसमें दस्तावेजों की कतरन यानी श्रेडिंग (Shredding) होनी चाहिए। सीधे आग लगाना न सिर्फ नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा करता है। यहां बड़ी बात यह है कि फाइलें दफ्तर के परिसर में ही जलाई गईं, न कि किसी अधिकृत स्थान पर।
कौन से रिकॉर्ड जलाए गए?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नष्ट किए गए दस्तावेजों की सूची बेहद लंबी है। विभागीय केसों के रिकॉर्ड साल 1983-84 से लेकर 2022-23 तक के जलाए गए हैं। पी-14 पंजी (P-14 Register) और अन्य अभिलेख 1983-84 से 2014-15 तक के थे।
लाइसेंसी टेंडर फॉर्म, शिकायत पंजी और निस्तारण रिकॉर्ड 2009-10 और 2013-14 के जलाए गए हैं। इसके अलावा स्थापना शाखा के रिकॉर्ड, जिनमें उपस्थिति पंजी, सेवा दस्तावेज और डाक रजिस्टर शामिल थे, वे 1989 से 2013-14 तक के थे। यानी चालीस साल तक का पूरा का पूरा सरकारी इतिहास राख में बदल गया है।
अधिकारी ने क्या कहा?
एडिशनल कमिश्नर मुकेश नेमा ने इसे नियम सम्मत बताया है। उन्होंने कहा कि सहायक जिला आबकारी अधिकारी प्रबंध समिति की सिफारिश पर यह कार्रवाई की जा रही थी।
आयुक्त ने दिए जांच के आदेश
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना का कहना है कि उन्हें इस पूरे मामले की कोई जानकारी नहीं थी। जैसे ही मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने तुरंत जांच के आदेश दे दिए हैं। उनका बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि यह कार्रवाई बिना उनकी जानकारी के अंजाम दी गई है।
यानी एक तरफ एडिशनल कमिश्नर इसे नियम के अनुसार बता रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ आयुक्त खुद इससे अनजान थे।
प्रक्रिया में कहां हुई चूक?
सरकारी रिकॉर्ड नष्ट करने के लिए कई स्तरों पर अनुमति लेनी होती है। पहले सक्षम अधिकारी की लिखित मंजूरी जरूरी है। फिर तय प्रक्रिया के तहत श्रेडिंग की जाती है। इसका पूरा ब्यौरा रखा जाता है। यहां इनमें से कोई भी चरण सही से नहीं अपनाया गया, यही बात सबसे ज्यादा संदेह पैदा करती है।
सवाल जो उठ रहे हैं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन फाइलों में ऐसा क्या था जिसे इतनी जल्दी राख करना पड़ा? 1983 से 2023 तक के रिकॉर्ड में विभागीय प्रकरण, शिकायत पंजियां और सेवा दस्तावेज सब कुछ शामिल थे। किसी जांच, अदालती मामले या सूचना के अधिकार (RTI: Right to Information) के अनुरोध में ये दस्तावेज काम आ सकते थे।
अब जब रिकॉर्ड जल चुके हैं तो उनकी पड़ताल करना मुश्किल होगा। जांच में यह देखना होगा कि किसने फैसला लिया, किसने आग लगाई और आयुक्त को जानकारी क्यों नहीं दी गई।
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