भोपाल कंज्यूमर कोर्ट का फैसला, फ्लैट न देने पर बिल्डर ब्याज सहित लौटाएगा 44 लाख
समझें क्या है पूरा मामला...
- भोपाल के एक बिल्डर ने ग्राहक से पूरी रकम ली, लेकिन फ्लैट का पजेशन नहीं दिया।
- जिला उपभोक्ता आयोग ने इसे सेवा में कमी माना है।
- आयोग ने बिल्डर को 44.72 लाख रुपए ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।
- मानसिक प्रताड़ना और वाद-व्यय के लिए भी अलग राशि तय की गई है।
- यह फैसला फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को लेकर बड़ा संदेश देता है।
क्या था पूरा विवाद
दरअसल सेवानिवृत्त कर्नल विजय कुमार सहगल ने भोपाल में एक फ्लैट बुक किया था। उन्होंने बिल्डर को पूरी कीमत, यानी 44 लाख 72 हजार रुपए चुका दिए थे। इसके बावजूद तय समय पर उन्हें फ्लैट का पजेशन नहीं मिला।
आरोप है कि बिल्डर ने बीच में निर्माण कार्य भी रोक दिया। लंबे इंतजार के बाद भी जब पजेशन नहीं मिला तो कर्नल सहगल ने जिला उपभोक्ता आयोग भोपाल का रुख किया।
कर्नल सहगल ने आयोग में मलय एल्पिक होम्स एलएलपी और अनंतम एल्पिक होम्स एलएलपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का हवाला दिया गया।
आयोग का फैसला क्या रहा
जिला उपभोक्ता आयोग भोपाल ने इस मामले में बिल्डर के खिलाफ सख्त आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि ग्राहक को सालों इंतजार कराना उचित नहीं है।
आयोग के अनुसार बिल्डर ने ग्राहक का पैसा इस्तेमाल तो किया, लेकिन आधिपत्य नहीं सौंपा। आयोग ने इसे सेवा में स्पष्ट कमी बताया।
फैसले में बिल्डर को तीन तरह के भुगतान करने का निर्देश दिया गया है। पहला, 44 लाख 72 हजार रुपए की पूरी राशि 7% वार्षिक ब्याज सहित वापस करना।
दूसरा, मानसिक प्रताड़ना और सेवा में कमी के लिए 5 हजार रुपए। तीसरा, वाद-व्यय के रूप में 3 हजार रुपए अतिरिक्त देना।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता को अपने निवास स्थान के उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। इससे भविष्य में इसी तरह के मामलों में शिकायतकर्ताओं को राहत मिलेगी।
रेरा से जुड़े अधिकार
इस तरह के विवादों में रेरा के नियम खरीदारों की मदद करते हैं। रेरा एक्ट 2016 की धारा-18 के तहत खरीदार को खास सुरक्षा मिलती है।
अगर तय समय पर फ्लैट का पजेशन नहीं मिलता, तो खरीदार पूरी राशि ब्याज सहित वापस मांग सकता है। यह अधिकार कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज है।
रेरा के तहत हर प्रोजेक्ट की 70% राशि अलग बैंक खाते में रखना अनिवार्य है। इसका मकसद यह है कि पैसा किसी दूसरे प्रोजेक्ट में इस्तेमाल न हो।
पजेशन में देरी होने पर खरीदार ब्याज, रिफंड और परिस्थिति के अनुसार मुआवजे का दावा कर सकता है। कानून में बिल्डर और खरीदार, दोनों के लिए ब्याज दर समान रखने का प्रावधान है।
उपभोक्ताओं के लिए सबक
यह मामला उन सभी लोगों के लिए सीख है, जो फ्लैट या घर बुक करने जा रहे हैं। किसी भी प्रोजेक्ट में पैसा देने से पहले रेरा पंजीकरण जरूर जांचें।
पजेशन की तय तारीख और भुगतान की शर्तें एग्रीमेंट में साफ लिखवाएं। देरी होने पर सीधे उपभोक्ता आयोग से संपर्क किया जा सकता है।
यह फैसला दिखाता है कि उपभोक्ता आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) खरीदारों के हक में मजबूती से खड़ा है। बिल्डरों की लापरवाही अब आसानी से नजरअंदाज नहीं होगी।
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