एमपी में साइबर क्राइम यूनिट का बुरा हाल, एक इंस्पेक्टर के भरोसे 104 पेंडिंग केस

Aman Vaishnav | Jul 21, 2026, 09:15 IST
एमपी में साइबर क्राइम
भोपाल में साइबर फ्रॉड के मामलों की जांच धीमी पड़ गई है। 104 पेंडिंग केस के बीच सिर्फ 1 ही इंस्पेक्टर बचा है। नियम के मुताबिक इंस्पेक्टर से नीचे के पुलिस अधिकारी साइबर फ्रॉड के केस की जांच नहीं कर सकते हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • भोपाल में साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।
  • जांच व्यवस्था कमजोर पड़ गई है।
  • सैकड़ों शिकायतें सिर्फ एक इंस्पेक्टर के भरोसे हैं।
  • FIR दर्ज होने में दो साल तक का समय लग रहा है।
  • पीड़ितों का फ्रीज पैसा भी समय पर वापस नहीं मिल रहा है।

राजधानी भोपाल में साइबर ठगी के मामले हर महीने बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर इनकी जांच करने वाला अमला उतनी ही तेजी से घटा है। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि हालात पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो चुके हैं।



2021 में थे 10 इंस्पेक्टर

साल 2021 में भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में 10 निरीक्षक और कार्यवाहक निरीक्षक तैनात थे। उस समय कुल 48 मामले जांच में थे। यानी हर इंस्पेक्टर के पास औसतन 4 से 5 केस ही होते थे।



अब 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। यूनिट में सिर्फ एक इंस्पेक्टर बचा है। लंबित मामलों की संख्या 104 तक पहुंच गई है। यानी पहले के मुकाबले करीब 25 गुना ज्यादा काम एक अफसर के कंधों पर है।



यूनिट का पूरा स्टाफ

साइबर क्राइम यूनिट में फिलहाल 1 इंस्पेक्टर, 7 सब इंस्पेक्टर, 3 सहायक उपनिरीक्षक, 15 प्रधान आरक्षक और 56 आरक्षक मौजूद हैं।



वहीं एक बड़ी दिक्कत यह है कि साइबर फ्रॉड की विवेचना का अधिकार इंस्पेक्टर से नीचे रैंक के अफसर को नहीं है। यानी बाकी पूरा स्टाफ होने के बावजूद काम एक ही अफसर पर टिका है।



इंदौर की तस्वीर भी अलग नहीं

पड़ोसी शहर इंदौर की हालत भी कुछ बेहतर नहीं है। वहां 1 थाना प्रभारी, 2 सब इंस्पेक्टर और 10 स्टाफ सदस्य तैनात हैं। यह दिखाता है कि स्टाफ की कमी सिर्फ भोपाल तक सीमित नहीं है।



जांच में क्यों लग रहा इतना समय

कई मामलों में पहले प्रारंभिक जांच होती है। फिर डिजिटल साक्ष्य जुटाए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ही महीनों निकल जाते हैं। इसके बाद कहीं जाकर FIR दर्ज होती है। कुछ मामलों में तो अपराध दर्ज होने में पूरे दो साल लग गए।



पैसा फ्रीज होने के बाद भी पीड़ितों को राहत जल्दी नहीं मिलती है। इसकी बड़ी वजह मल्टीलेयर ट्रांजेक्शन हैं। ठगी का पैसा कई खातों से होकर गुजरता है। नेटवर्क अक्सर दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैला होता है। साथ ही बैंकिंग प्रक्रिया भी जटिल है।



सिस्टम में ये बड़ी खामियां

जांच में सामने आया है कि किरायानामा के आधार पर बैंक खाते खोले जा रहे हैं। इनका बाद में दुरुपयोग होता है। कई बार दूसरे लोगों के दस्तावेजों से खुले खाते किराए पर लिए जाते हैं।



इसके अलावा बड़ी संख्या में सिम कार्ड जारी हो रहे हैं। इनमें से कई सिम साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल होती हैं। समय पर इन्हें ब्लॉक नहीं किया जाता है।



पुलिस ने दिए ये सुझाव

पुलिस के मुताबिक करंट अकाउंट खोलते समय वैध दस्तावेज ही स्वीकार किए जाने चाहिए। खाता खोलते वक्त फॉर्म में दर्ज मोबाइल नंबर को रजिस्टर्ड नंबर से जोड़ा जाए।



एक व्यक्ति के नाम पर सीमित संख्या में ही सिम जारी हों। साथ ही पुलिस को संदिग्ध सिम कार्ड ब्लॉक करने का अधिकार मिलना चाहिए।



कमिश्नर बोले, जरूरत पड़ी तो स्टाफ बढ़ेगा

भोपाल पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि पहले साइबर क्राइम यूनिट में इंस्पेक्टरों की संख्या ज्यादा थी। अब सिर्फ एक इंस्पेक्टर है। वे इस पर गौर करेंगे कि ऐसा क्यों हुआ। जरूरत पड़ने पर संख्या जरूर बढ़ाई जाएगी।



FAQ

  1. भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में फिलहाल कितने इंस्पेक्टर हैं?
    Q1. भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में फिलहाल कितने इंस्पेक्टर हैं? 2026 में भोपाल साइबर क्राइम यूनिट में सिर्फ एक इंस्पेक्टर तैनात है। 2021 में यह संख्या 10 थी। इस वजह से जांच पर असर पड़ रहा है।

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