भोपाल गैस त्रासदी: मिट्टी-भूजल का जहर खत्म करेगी एमपी सरकार
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश सरकार यूनियन कार्बाइड परिसर की जहरीली मिट्टी साफ करेगी।
- परिसर और आसपास 2 किमी एरिया में भूजल भी दूषित है।
- हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकार ने निजी एजेंसियों से प्रस्ताव मंगाए हैं।
- काम तीन चरणों में होगा, पहले आकलन फिर सफाई की योजना बनेगी।
- 4 जून को एजेंसियों के प्रस्ताव खुलेंगे, इसके बाद प्रक्रिया शुरू होगी।
40 साल बाद भी जिंदा है जहर
दिसंबर 1984 में भोपाल में हुई गैस त्रासदी को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) के कारखाने से रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआइसी) गैस ने हजारों लोगों की जान ली थी।
वहीं, इस त्रासदी का दर्द सिर्फ उस रात तक नहीं रुका। कारखाने की जमीन और आसपास के इलाके का भूजल दशकों से जहरीला बना हुआ है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने इस आखिरी जख्म को भरने की कोशिश शुरू की है।
यूका का इतिहास और जहर की जड़ें
यूसीआइएल की शुरुआत 1969 में भोपाल में कीटनाशक बनाने के लिए हुई थी। 1979 में यहां एमआइसी (Methyl Isocyanate) के निर्माण के लिए एक अलग इकाई लगाई गई थी। वहीं, 1984 में त्रासदी के बाद सरकार ने संयंत्र को अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद परिसर में कोई खास काम नहीं हुआ है।
त्रासदी के बाद जो जहरीला कचरा बचा था, उसे बोरों में भरकर तलघर में रख दिया गया था। यह कचरा वहां सालों तक पड़ा रहा। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने इस कचरे को पीथमपुर में नष्ट कराया गया। वहीं, जमीन और पानी में घुला जहर अभी भी बाकी है।
हाईकोर्ट के निर्देश पर उठाया गया कदम
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के निर्देशों पर अमल करते हुए सरकार ने अब परिसर की मिट्टी और भूजल की सफाई के साथ-साथ जंग लगे यूका प्लांट के ढांचे को हटाने और जहर के विसंक्रमण यानी डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification) का आकलन शुरू कर दिया है।
भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग ने इसके लिए एजेंसियों और संस्थानों से प्रस्ताव मंगाए हैं। ये प्रस्ताव आज यानी 4 जून को खोले जाने है। चुनी गई एजेंसियां रेमेडिएशन (Remediation) और डिटॉक्सिफिकेशन का पूरा काम करेंगी।
तीन चरणों में होगा पूरा काम
पहले चरण में साइट का शुरुआती आकलन होगा। विशेषज्ञों की टीम यूका परिसर के नक्शे और पुराने दस्तावेज देखेगी। नीरी (NEERI - National Environmental Engineering Research Institute) और सीएसआइआर (CSIR - Council of Scientific and Industrial Research) की पुरानी रिपोर्टें भी खंगाली जाएंगी। परिसर की जियोलॉजी, भूजल की स्थिति और आसपास के एक्विफर का आकलन किया जाएगा।
दूसरे चरण में गहन जांच होगी। परिसर और आसपास के दो किमी इलाके से मिट्टी के 50 और भूजल के 15 सैंपल लिए जाएंगे। इन सैंपलों को 189 पैरामीटर पर जांचा जाएगा। साथ ही तालाबों और डंप एरिया से भी सैंपल लिए जाएंगे। प्रदूषण कितनी दूर तक फैल चुका है, यह भी आंका जाएगा। एक रेमेडियल एंड रिहेबिलिटेशन एक्शन प्लान भी तैयार किया जाएगा।
तीसरे चरण में ईआइए (EIA - Environment Impact Assessment) यानी पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन होगा। इसमें मिट्टी, भूजल, सतही जल, स्वास्थ्य पर असर और कचरे के परिवहन एवं निस्तारण के खतरों का आकलन होगा। इलाके का सामाजिक और आर्थिक सर्वे भी इसी में शामिल है।
सुरक्षा का भी रखा जाएगा ध्यान
पूरी प्रक्रिया के दौरान एक हेल्थ और सेफ्टी प्लान भी बनाया जाएगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सफाई के काम के दौरान कोई भी मजदूर, स्थानीय निवासी या अधिकारी किसी नुकसान का शिकार न हो। संक्रमित कचरे के निपटान की पूरी व्यवस्था पर्यावरण के नियमों के तहत होगी।
जमीन और पानी की सफाई के बाद ही इस पूरे इलाके के लिए आगे की योजना तय की जाएगी।
FAQ
- भोपाल गैस त्रासदी क्या है?
1984 की 2‑3 दिसंबर की रात भोपाल में एक भयानक हादसा हुआ। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के कीटनाशक फैक्ट्री से एक बहुत खतरनाक गैस, जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट कहते हैं, रिस गई। ये गैस इतनी जहरीली थी कि उसने सीधे शहर में हाहाकार मचा दिया। हजारों लोग तुरंत मर गए और लाखों आज भी इसके असर झेल रहे हैं। ये घटना आज भी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदाओं में गिनी जाती है।
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