एमपी में 10.99 करोड़ की खरीद में बड़ा घोटाला,GeM टेंडर फर्जीवाड़े में चार पर FIR

Sanjay Dhiman | Sept 02, 2026, 18:50 IST
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भोपाल में EOW ने GeM पोर्टल टेंडर फर्जीवाड़े में चार आरोपियों पर FIR दर्ज की। एक ही आदमी ने चार फर्जी कंपनियां बनाकर सामाजिक न्याय विभाग का 10.99 करोड़ का टेंडर हथियाया। पुराना सामान नया बताकर बेचा, ऊंचे दाम वसूले।

भोपाल में एक बड़ा टेंडर घोटाला सामने आया है। एक ही व्यक्ति ने चार अलग-अलग कंपनियां बनाईं। इन कंपनियों ने GeM पोर्टल पर फर्जी मुकाबला दिखाया। सामाजिक न्याय विभाग का 10.99 करोड़ का टेंडर हथिया लिया गया। भोपाल EOW ने चार आरोपियों पर FIR दर्ज कर ली है।



भोपाल की आर्थिक अपराध शाखा ने एक बड़ा टेंडर घोटाला पकड़ा है। सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ने 2024 में कंप्यूटर, प्रिंटर और यूपीएस खरीदे थे। यह खरीद GeM पोर्टल के जरिए हुई थी। जांच में पता चला कि पूरा टेंडर फर्जी तरीके से हथियाया गया।



शिकायत के बाद जांच शुरू हुई। शिवम यादव और विनय रायकवार ने शिकायत की थी। जांच में गड़बड़ी के कई सबूत मिले।



फर्जी कंपनियों का जाल

जांच में पता चला कि चार कंपनियां असल में एक ही आदमी की थीं। इन कंपनियों ने आपस में मुकाबला करने का नाटक किया। असल में कोई असली प्रतिस्पर्धा थी ही नहीं।



आरोपियों में रणधीर कुमार पटेल, हेमलता पटेल, अशोक कुमार सिंह और देवेंद्र सिंह शामिल हैं। इनकी कंपनियों के नाम मेसर्स साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, मेसर्स शांति ट्रेडर्स, मेसर्स एच.टी.एम. इंडिया और मेसर्स सूरज इंटरप्राइजेज हैं।



एक ही पता, एक नंबर

जांच में एक अहम सबूत मिला। मेसर्स शांति ट्रेडर्स का मोबाइल नंबर मेसर्स साईबाबा से मेल खाता है। एचटीएम. इंडिया की ईमेल आईडी भी साईबाबा के नाम की निकली।



एचटीएम. इंडिया का जीएसटी (GST – Goods and Services Tax) पता भी साईबाबा वाला ही निकला। दोनों कंपनियां भोपाल के एक ही पते से चल रही थीं। मोबाइल नंबर रणधीर कुमार पटेल के नाम पर दर्ज मिला।



मिलीभगत के सबूत

ये चारों कंपनियां सिर्फ इसी टेंडर में नहीं, बल्कि कई और टेंडरों में भी साथ बोली लगाती रहीं। हर बार इनके रेट एक-दूसरे के काफी करीब रहते थे। ठेका बारी-बारी से इनमें से किसी एक को मिलता गया।



मेसर्स शांति ट्रेडर्स ने खुद विभाग को एक पत्र भी दिया था। यह पत्र भी साबित करता है कि एक ही आदमी की दूसरी कंपनी ने अलग बोलीदाता बनने का नाटक किया।



सामान बनाने वाली कंपनियों ने भी यही बात मानी। मेसर्स बेस्ट पावर इक्विपमेंट्स ने चारों कंपनियों को एक ही सामान के लिए अलग-अलग अधिकार पत्र (MAF – Manufacturer Authorization Form) दिए थे। एसर इंडिया ने भी तीन कंपनियों को यही अधिकार दिया।



फर्जी अधिकार पत्र भी बने

मेसर्स सूरज इंटरप्राइजेज ने खुद को एसर के एक खास मॉडल का अधिकृत विक्रेता बताया। लेकिन एसर इंडिया के रिकॉर्ड में ऐसा कोई अधिकार दर्ज नहीं मिला। यह दावा फर्जी कागज के दम पर किया गया था। इसी कंपनी ने टेंडर की जमा राशि के लिए जो चेक दिया, उस पर खाता नंबर तक नहीं लिखा था।



पुराना सामान नया बताया

जांच में एक और बड़ी गड़बड़ी सामने आई। विभाग को दिए गए कंप्यूटरों की वारंटी जुलाई 2024 से शुरू हो चुकी थी। जबकि विभाग ने टेंडर सितंबर 2024 में जारी किया था।



यानी पहले से पड़ा पुराना माल नया बताकर विभाग को दे दिया गया। विभाग की अपनी कमेटी ने भी कंप्यूटर खोलकर जांचे। तय शर्तों से अलग रैम (RAM – Random Access Memory) मिली और एसर की जगह लोकल कंपनी की एसएसडी (SSD – Solid State Drive) लगी मिली। कमेटी ने साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश भी की थी।



यूपीएस की सबसे बड़ी गड़बड़ी

सबसे बड़ी गड़बड़ी यूपीएस (UPS – Uninterruptible Power Supply) की खरीद में मिली। डिब्बे पर छपी कीमत 6,086 रुपए थी। वही सामान GeM (GeM – Government e-Marketplace) पोर्टल पर 3,754 रुपए में मिल रहा था।



इसके बावजूद विभाग ने एक यूपीएस के लिए 11,247 रुपए चुकाए। बनाने वाली कंपनी साइबर पावर ने बताया कि जो मॉडल कागजों में लिखा है, वह इस टेंडर में दिया ही नहीं गया था। असल में दूसरा मॉडल दिया गया था। यानी जानबूझकर गलत मॉडल नंबर लिखकर ऊंचे दाम का बहाना बनाया गया।



अब आगे क्या

इन तमाम सबूतों के आधार पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW – Economic Offences Wing), भोपाल ने चारों आरोपियों और अन्य के खिलाफ FIR (FIR – First Information Report) दर्ज कर ली है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS – Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 61(2), 318(4), 336(3) और 340(2) के तहत दर्ज हुआ है। इसे अपराध क्रमांक 93/2026 दिया गया है।



यह FIR 1 सितंबर 2026 को दर्ज हुई। फिलहाल मामले की विवेचना जारी है। आगे और भी खुलासे हो सकते हैं।



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