तमिलनाडु में थलपति विजय की जीत के पीछे भोपाल का यह नौजवान, जानें कौन है कपिल साहू
तमिलनाडु में विजय थलपति की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम की जीत के बाद भोपाल के कपिल साहू चर्चा में आ गए हैं। पूरे चुनाव के दौरान कैमरे से दूर रहने वाले कपिल ही थे जिन्होंने विजय की जीत की पूरी रणनीति तैयार की थी।
कैसे हुई विजय की जीत
कपिल पिछले साल विजय की टीम से जुड़े थे और सबसे पहले उन्होंने संगठन पर ध्यान दिया था। उन्होंने विजय के फैन क्लब को एक राजनीतिक टीम में बदल दिया।
पहले ये फैन क्लब सिर्फ विजय को सपोर्ट करते थे, लेकिन कपिल ने इन्हें अब बूथ स्तर पर जिम्मेदारी दे दी। हर सीट का डेटा ध्यान से देखा गया और रणनीति बनाई गई। जमीनी फीडबैक के आधार पर लगातार बदलाव किए गए। इसके बाद विजय की जीत संभव हो पाई।
12 लोगों की टीम बनाकर काम शुरु किया
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कपिल भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट से पढ़े हैं। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने डेटा और ग्राउंड मैनेजमेंट को अपना करियर बना लिया था।
शुरुआत उन्होंने प्रशांत किशोर की संस्था आई-पैक से की थी। फिर उन्होंने 12 लोगों की एक टीम बनाई और काम शुरू किया।
चेहरे से नहीं भरोसे पर चलता है कैंपेन
कपिल ने बताया कि तमिलनाडु में 50 साल से दो ही पार्टियां सत्ता में थीं। लोगों में थकान और एंटी-इनकंबेंसी (पुरानी सरकार के खिलाफ भावना) साफ दिख रही थी। हमें बस उस भावना को मातरम यानी बदलाव की दिशा में बदलना था।
कपिल ने कहा किकोई भी कैंपेन सिर्फ चेहरे से नहीं चलता, वह भरोसे पर चलता है। विजय के पास 25-30 साल की मेहनत से जो भरोसा बना था, वही हमारी सबसे बड़ी ताकत थी।
तमिलनाडु की परंपरा से जोड़ा कैंपेन
कपिल ने बताया कि हमने अपना कैंपेन लोकल कल्चर से जोड़ा। विसिल (सीटी) हमारा चिन्ह था और कोलम (रंगोली) तमिलनाडु की रोज की परंपरा है।
विजय ने अपील की थी कि लोग घर के बाहर कोलम बनाकर समर्थन दिखाएं। यह आइडिया खासकर महिलाओं के बीच बहुत जल्दी फैल गया।
विजय के फैन क्लब पहले से थे, लेकिन वे सिर्फ समर्थन दिखाते थे। हमने उन्हें बूथ स्तर पर जिम्मेदारी दी और उन्हें एक संगठित कैडर में बदल दिया।
समस्याओं के हिसाब से रणनीति बनाई
कपिल ने आगे बताया कि मुझे यूपी, बिहार, दिल्ली, पंजाब जैसे 10 राज्यों में 10-11 साल का अनुभव है। हर राज्य (5 राज्यों में विधानसभा चुनाव) की राजनीति अलग होती है। तमिलनाडु में हम पहले जमीनी हकीकत समझने के लिए लोगों की समस्याएं सुनीं फिर उन्हीं के हिसाब से रणनीति बनाई।
रूलिंग पार्टी द्रमुक ने हम पर कई पाबंदियां लगाई थीं। रोड शो और रैलियां सीमित रही। अप्रैल में हमें खुलकर कैंपेन करने का मौका मिलता तो हम 150-170 सीटों तक जा सकते थे।
कपिल ने कहा कि करूर में चुनावी रैली के दौरान भगदड़ (जिसमें कई मौतें हुई) के बाद भी माहौल पूरी तरह नहीं बदला। जनता जानती थी कि ये सब दूसरी पार्टी की साजिश है। जनता के गुस्से के चलते जिम्मेदार नेता को करूर सीट छोड़कर कोयंबटूर जाना पड़ा।
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