पेड़ों को जहर देकर मारने का आरोप, भोपाल में नगर निगम और भोज वेटलैंड पर NGT सख्त
भोपाल की लोअर लेक किनारे पेड़ों को जहरीले रसायन डालकर सुखाया जा रहा था। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस मामले में सख्त आदेश दिया है। जांच में सात में से पांच पेड़ सूखे मिले, सभी में ड्रिल किए छेद थे। झील में अनुपचारित सीवेज भी बहाया जा रहा है। NGT ने नगर निगम और वेटलैंड अथॉरिटी से जवाब मांगा है, अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।
भोपाल में पर्यावरण से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT – National Green Tribunal) की सेंट्रल जोन बेंच ने 11 अगस्त 2026 को इस पर बड़ा आदेश पारित किया। यह मामला राशिद नूर खान बनाम कलेक्टर भोपाल का है। आवेदक की तरफ से वकील हरशवर्धन तिवारी ने पक्ष रखा।
सुनवाई जस्टिस शेओ कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की बेंच ने की।
पेड़ों में जहर का आरोप
शिकायत थी कि लोअर लेक के फुल टैंक लेवल (FTL – Full Tank Level) से 50 मीटर के दायरे में हरे पेड़ों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। पेड़ों के तनों में छेद कर उनमें जहरीले रसायन डाले जा रहे थे। इससे पेड़ धीरे-धीरे सूख रहे थे।
NGT ने राज्य प्रदूषण बोर्ड, वेटलैंड अथॉरिटी और केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड की संयुक्त समिति बनाई थी। जांच सिविल लाइंस, प्रोफेसर्स कॉलोनी के एक निजी प्लॉट पर हुई। यहां कुल सात बड़े पेड़ मिले। सभी सातों के तनों में ड्रिल छेद पाए गए। इनमें दो पेड़ स्वस्थ थे, जबकि पांच पूरी तरह सूखे मिले। समिति को छेदों के अलावा ऐसे निशान भी मिले, जो रसायन इंजेक्ट किए जाने का संकेत देते हैं।
इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए NGT ने नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड को जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि जिम्मेदार व्यक्ति या प्लॉट मालिक पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) तय की जाए।
झील में बह रहा गंदा पानी
मामले का दूसरा पहलू सीवेज से जुड़ा है। जांच में सामने आया कि बानगंगा नाले से लोअर लेक में काफी पानी आ रहा है। करिश्मा पार्क और कुशाभाऊ ठाकरे भवन के सामने के नाले मौसमी बताए गए। बानगंगा नाले के संगम स्थल पर कचरा जमा मिला। नगर निगम ने कचरा रोकने के लिए स्क्रीनिंग व्यवस्था लगाई है।
झील किनारे कुछ जगह पेड़ लगाए गए हैं। नगर निगम के अनुसार नालों को अमृत योजना 2.0 (AMRUT Scheme 2.0) के तहत मोड़ने की योजना है। झील की सुरक्षा दीवार यानी स्टोन पिचिंग का पुराना काम खराब हो गया था, इसलिए नई पिचिंग की गई।
रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र से रोजाना करीब 8 से 10 MLD (Million Litres per Day) गंदा पानी निकलता है। इसके लिए 10 MLD क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP – Sewage Treatment Plant) बन रहा है, जो दिसंबर 2027 तक तैयार होने की उम्मीद है। तब तक अनुपचारित पानी सीधे झील में जा रहा है।
NGT ने इसे जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 का उल्लंघन माना। ट्रिब्यूनल ने राज्य प्रदूषण बोर्ड को नगर निगम के खिलाफ पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की गणना करने का आदेश दिया है। यह क्षतिपूर्ति उल्लंघन की तारीख से लेकर STP बनने तक की अवधि के लिए तय होगी।
वेटलैंड नियमों का उल्लंघन
आवेदक ने यह भी आरोप लगाया कि झील क्षेत्र में नए निर्माण हो रहे हैं, जो वेटलैंड नियम 2017 (Wetland Rules, 2017) का उल्लंघन हैं। आवेदक ने तस्वीरें भी पेश कीं। लेकिन दूसरे पक्ष ने कहा कि उन्हें तस्वीरों की कॉपी नहीं मिली। NGT ने सभी दस्तावेज साझा करने का आदेश दिया।
ट्रिब्यूनल ने राज्य वेटलैंड अथॉरिटी की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। बार-बार निर्देश के बावजूद अथॉरिटी ने कोई रिपोर्ट नहीं दी। अब अथॉरिटी के सदस्य सचिव को हलफनामा दाखिल करना होगा। साथ ही वेटलैंड अथॉरिटी, पर्यावरण विभाग और प्रदूषण बोर्ड के प्रतिनिधि मिलकर 30 दिन में जांच रिपोर्ट देंगे।
नगर निगम से मांगी जानकारी
NGT ने भोपाल नगर निगम से पानी और सीवेज प्रबंधन को लेकर दस अहम जानकारियां मांगी हैं। इनमें कुल आबादी, पानी की जरूरत और आपूर्ति, कुल गंदे पानी की मात्रा, मौजूदा ट्रीटमेंट क्षमता, दोनों तालाबों में गिरने वाले नालों की संख्या, नए STP बनाने की समय-सीमा और तुरंत उठाए जाने वाले कदम शामिल हैं।
सभी पक्षों को तीन हफ्ते में जवाब देना है। नगर निगम की तकनीकी दिक्कत के चलते जवाब अपलोड नहीं हो पाया था, जिसे अब दोबारा दाखिल करने की छूट दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को होगी।
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