फाइबर मसाज पर बवाल, 35 साल पुराने मर्डर केस में भोपाल पुलिस कमिश्नर हाईकोर्ट तलब
समझें क्या है पूरा मामला
- 35 साल पुराने हत्या के मामले में आरोपी 1992 में दोषी ठहराया गया था,1996 से Hc में अपील लंबित है।
- 28 साल बाद 2024 में पहली प्रभावी सुनवाई हुई तो आरोपी गायब मिला।
- पुलिस कई बार वारंट तामील करने में नाकाम रही, आखिरकार गैर-जमानती वारंट जारी हुआ।
- पुलिस की रिपोर्ट में आरोपी और उसके कथित भाई के पिता के नाम अलग-अलग लिखे गए।
- रिपोर्ट में "फाइबर मसाज" शब्द मिलने पर हाई कोर्ट ने भोपाल पुलिस कमिश्नर को तलब कर लिया।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 35 साल पुराने हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान भोपाल पुलिस की कार्रवाई रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठे। रिपोर्ट में विरोधाभासी तथ्यों और "फाइबर मसाज" जैसे रहस्यमय शब्द के उल्लेख से नाराज कोर्ट ने भोपाल पुलिस कमिश्नर को 1 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के आदेश दिए हैं।
35 साल पुराना मामला, लेकिन आरोपी आज तक गायब
जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। भोपाल के नवाब सेंटिंगवाला के खिलाफ करीब 35 वर्ष पहले हत्या का मामला दर्ज हुआ था। वर्ष 1991 में ट्रायल चला और 1992 में जिला अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
इसके बाद आरोपी ने जमानत हासिल कर ली और वर्ष 1996 में हाई कोर्ट में क्रिमिनल अपील (CRA No. 201 of 1996) दायर कर दी। इसके बाद आरोपी ऐसा गायब हुआ कि करीब तीन दशक तक उसे अदालत के सामने पेश ही नहीं किया जा सका।
28 साल बाद खुली फाइल, वारंट और मोहलतों का सिलसिला
वर्ष 2024 में जब जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिन्द्र कुमार सिंह की खंडपीठ के समक्ष यह अपील सुनवाई में आई तो पता चला कि आरोपी का कोई पता नहीं है। 6 अगस्त 2024 को अदालत ने दो हजार रुपए का जमानती वारंट जारी किया और पुलिस को आरोपी की तलाश का निर्देश दिया।
इसके बाद 5 सितंबर 2024 को पुलिस ने और समय मांगा। अगस्त 2025 तक भी कोई सफलता नहीं मिली तो अदालत ने इसे अंतिम अवसर बताया। इसके बाद भी आरोपी नहीं मिला तो भोपाल के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए गए।
हलफनामे से असंतुष्ट कोर्ट, गैर-जमानती वारंट तक पहुंचा मामला
12 जनवरी 2026 को पुलिस अधीक्षक का हलफनामा अदालत में पेश हुआ, लेकिन कोर्ट ने उसे पूरी तरह असंतोषजनक बताया। अदालत ने पूछा कि आखिर आरोपी को पकड़ने के लिए वास्तविक प्रयास क्या किए गए। इसके बाद 29 जनवरी 2026 को जमानती वारंट रद्द कर आरोपी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया गया।
2 अप्रैल 2026 को भोपाल पुलिस कमिश्नर ने चार सदस्यीय विशेष टीम गठित करने की जानकारी दी और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आश्वासन दिया, लेकिन तय समय पर वह रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई।
30 जून की सुनवाई में पुलिस रिपोर्ट ने खुद ही खोल दी पोल
30 जून 2026 को आखिरकार जहांगीराबाद एसीपी बिट्टू शर्मा भातेले की ओर से कार्रवाई रिपोर्ट पेश की गई। अदालत ने जैसे ही रिपोर्ट का परीक्षण किया, उसमें कई ऐसी गंभीर त्रुटियां सामने आईं जिन्होंने पुलिस की तैयारी पर ही सवाल खड़े कर दिए।
अदालत ने पाया कि रिपोर्ट बिना पर्याप्त जांच और गंभीरता के तैयार की गई है तथा आरोपी की संपत्ति, रिश्तेदारों और संभावित ठिकानों जैसी महत्वपूर्ण जानकारी तक उसमें शामिल नहीं की गई।
भाई बताए, लेकिन दोनों के पिता अलग-अलग लिख दिए
रिपोर्ट के एक हिस्से में थाना प्रभारी बजरिया ने लिखा कि आरोपी नवाब सेंटिंगवाला (पिता सैयद साजिद अली) अपने भाई महफूज़ (पिता मोहम्मद इकराम) के साथ रहता था। अदालत ने तुरंत इस विरोधाभास को पकड़ लिया। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब दोनों को सगा भाई बताया जा रहा है तो उनके पिता के नाम अलग-अलग कैसे हो सकते हैं। अदालत ने माना कि यह रिपोर्ट बिना जांच-पड़ताल और आधे-अधूरे मन से तैयार की गई है, जिससे साफ है कि पुलिस ने आरोपी की तलाश के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए।
हत्या प्रकरण में 'फाइबर मसाज' पढ़ जज भी रह गए हैरान
मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया जब एसीपी के हलफनामे के पैरा-9 में अचानक "फाइबर मसाज" शब्द का उल्लेख मिला। हत्या के एक गंभीर मुकदमे में फरार आरोपी की तलाश संबंधी रिपोर्ट में इस तरह का शब्द देखकर अदालत भी आश्चर्यचकित रह गई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसी गंभीर कार्रवाई रिपोर्ट में इस शब्द का क्या औचित्य है और यह आखिर कैसे शामिल हो गया।
अब भोपाल पुलिस कमिश्नर देंगे व्यक्तिगत जवाब
लगातार लापरवाही, अधूरी जांच, विरोधाभासी तथ्यों और हास्यास्पद रिपोर्ट को देखते हुए हाई कोर्ट ने पूरे मामले को बेहद गंभीर माना है। अदालत ने आदेश दिया है कि भोपाल के पुलिस कमिश्नर 1 जुलाई 2026 को स्वयं जबलपुर स्थित हाई कोर्ट में उपस्थित होकर यह स्पष्ट करें कि उनके अधीनस्थ अधिकारियों ने इतनी गंभीर न्यायिक कार्यवाही में इस स्तर की रिपोर्ट कैसे प्रस्तुत कर दी। अब इस मामले पर सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां पुलिस कमिश्नर को स्वयं अदालत के सवालों का सामना करना होगा।
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