बिना रेरा मंजूरी और रजिस्ट्री के भोपाल में बनी देश की पहली अवैध स्मार्ट सिटी
समझें क्या है पूरा मामला...
- भोपाल स्मार्ट सिटी की 342 एकड़ जमीन का विवाद गहराया है।
- जमीन की न रजिस्ट्री हुई, न विकास अनुमति ली गई।
- रेरा ने प्रोजेक्ट पर 2022 में रोक लगा दी थी।
- हाईकोर्ट ने कंपनी को पूरे प्रोजेक्ट का प्रमोटर माना है।
- सरकार 4 साल से समाधान का रास्ता तलाश रही है।
भोपाल स्मार्ट सिटी को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। यह प्रोजेक्ट देशभर में एक अनोखी मिसाल बन गया है। दस साल पहले टीटी नगर की 342 एकड़ जमीन इसके लिए चुनी गई थी। इसके लिए करीब 3000 मकान खाली कराए गए थे। वहीं, अब यही जमीन कानूनी उलझन में फंस गई है।
क्या है पूरा विवाद
भोपाल स्मार्ट सिटी की हालत किसी अवैध कॉलोनी जैसी हो गई है। न तो इस जमीन की रजिस्ट्री हुई है, न विकास अनुमति ली गई। इसके अलावा रेरा (Real Estate Regulatory Authority) की मंजूरी भी नहीं ली गई थी। यह पूरा मामला सरकार की अपनी लापरवाही से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि इसे देश की पहली अवैध स्मार्ट सिटी कहा जा रहा है।
टीटी नगर की यह 342 एकड़ जमीन प्राइम नजूल भूमि है। इसे एरिया बेस्ड डेवलपमेंट यानी एबीडी (Area Based Development) के लिए चुना गया था। वहीं, स्मार्ट सिटी कंपनी ने इस जमीन का मालिकाना हक अपने नाम नहीं लिया। न ही उप-पंजीयक कार्यालय में इसका रजिस्ट्रेशन कराया गया। इसके बावजूद प्लॉट्स की बिक्री शुरू कर दी गई। यहीं से पूरी गड़बड़ी की शुरुआत हुई।
कैसे शुरू हुई गड़बड़ी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कानूनी पेंच से बचने के लिए कागजी हेरफेर भी किया गया। स्मार्ट सिटी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने प्रोजेक्ट को बिना रेरा में रजिस्टर कराए 42 कमर्शियल और मिक्स्ड-यूज प्लॉट बेचने की तैयारी कर ली। जब आपत्ति उठी तो पूरा प्रोजेक्ट रजिस्टर कराने की बजाय सिर्फ चार प्लॉट ही रजिस्टर कराए गए। यह तरीका ठीक वैसा ही था, जैसे प्राइवेट बिल्डर गली निकालते हैं। लेकिन रेरा ने इसे पकड़ लिया।
रेरा ने क्यों लगाई रोक
रेरा ने 24 मई 2022 को पूरे मॉनेटाइजेशन मॉडल पर रोक लगा दी। इसके साथ ही पहले से हुआ पंजीयन भी निरस्त कर दिया गया। इसके बाद से पूरा प्रोजेक्ट अटका हुआ है। सरकार पिछले चार साल से इस गतिरोध को दूर करने का रास्ता तलाश रही है। वहीं, अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। फिलहाल सिर्फ वही निर्माण हो रहे हैं जिनके लिए रेरा अनुमति जरूरी नहीं है।
फंडिंग पर पड़ा असर
इस पूरे विवाद का सीधा असर फंडिंग पर भी पड़ा है। केंद्र और राज्य सरकार से मिलने वाली स्मार्ट सिटी फंडिंग बंद हो चुकी है। जमीन नहीं बिक पाने से करीब 1778 करोड़ रुपए जुटाने की योजना अटक गई है। इसी पैसे से एबीडी एरिया और भोपाल के इंफ्रास्ट्रक्चर का काम होना था। अब यह सारा काम पूरी तरह ठप पड़ा है।
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
07 अगस्त 2025 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने पूरे 342 एकड़ क्षेत्र को एक सिंगल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट माना। साथ ही स्मार्ट सिटी कंपनी को इसका प्रमोटर करार दिया गया। इस फैसले ने पूरे मामले की कानूनी स्थिति और साफ कर दी। अब कंपनी को प्रोजेक्ट प्रमोटर की सभी जिम्मेदारियां निभानी होंगी।
एक्सपर्ट के 4 समाधान
इस मुद्दे पर रेरा के पूर्व उपसचिव वीके चतुर्वेदी ने अपनी राय रखी है। उनके मुताबिक सरकार के पास अब भी समाधान के चार रास्ते मौजूद हैं। पहला रास्ता है कि सरकार नया कैबिनेट आदेश जारी करे। इससे स्मार्ट सिटी के नाम जमीन की विधिवत रजिस्ट्री हो सकेगी।
दूसरा सुझाव है कि सभी प्लॉटों का अलग-अलग रिकॉर्ड बनाया जाए। इसमें 98 लैंड पार्सल में से 42 बिक्री वाले प्लॉट और यूटिलिटी प्लॉट को अलग खसरा नंबर देने होंगे। तीसरा समाधान पूरे 342 एकड़ का एक साथ रेरा पंजीयन कराना है।
पूर्व उपसचिव चतुर्वेदी के मुताबिक 4-4 प्लॉट अलग से पंजीकृत कराने के बजाय पूरे एबीडी क्षेत्र का एक साथ रेरा पंजीयन जरूरी है। चौथा सुझाव पुराने विवादों के एकमुश्त निपटारे का है। प्लॉट नंबर 81-82 जैसे पुराने खरीदारों को रिफंड, ब्याज या भुगतान के लिए अतिरिक्त समय देना होगा। इससे अदालती विवाद भी खत्म हो सकेंगे।
इंदौर से तुलना
देश में इस तरह का मॉडल सिर्फ दो शहरों में अपनाया गया है, भोपाल और इंदौर। वहीं, दोनों शहरों की स्थिति बिल्कुल अलग है। इंदौर की एमओजी लाइन्स में करीब 55 एकड़ जमीन पर यह मॉडल अपनाया गया। वहां नीलामी से पहले ही जमीन फ्रीहोल्ड कराई गई। साथ ही टी एंड सीपी और रेरा की पूरी प्रक्रिया भी समय पर पूरी की गई।
यही वजह है कि इंदौर में जमीन का मॉनेटाइजेशन चरणबद्ध तरीके से सफलतापूर्वक चल रहा है। वहीं भोपाल में मालिकाना हक, टी एंड सीपी मंजूरी और सब-डिवीजन के बिना ही नीलामी शुरू कर दी गई थी।
इसी जल्दबाजी का नतीजा है कि आज पूरा प्रोजेक्ट कानूनी विवादों में उलझा हुआ है। रेरा की रोक से इंफ्रास्ट्रक्चर का काम भी पूरी तरह रुका हुआ है। इंदौर मॉडल से तुलना करने पर भोपाल की खामियां साफ नजर आती हैं।
सरकार का पक्ष
भोपाल स्मार्ट सिटी की सीईओ अंजू अरुण कुमार ने भी इस मामले पर अपनी बात रखी है। उनके मुताबिक इस मामले का निपटारा शासन स्तर पर होगा। उन्होंने बताया कि कैबिनेट अप्रूवल की प्रक्रिया पहले से जारी है। यानी सरकार भी इस समस्या को गंभीरता से ले रही है।
आगे क्या होगा
फिलहाल पूरा मामला मध्य प्रदेश सरकार के अगले कदम पर टिका हुआ है। कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद ही जमीन की सही रजिस्ट्री हो सकेगी। इसके बाद ही रेरा से पूरे प्रोजेक्ट का दोबारा पंजीयन हो पाएगा। तब तक हजारों खरीदारों और निवेशकों को इंतजार करना होगा। यह मामला आने वाले समय में और सुर्खियों में रह सकता है।
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