भोपाल नगरीय प्रशासन में अफसरों से ज्यादा कंसल्टेंट, हर महीने खर्च हो रहे करोड़ों
समझें क्या है पूरा मामला...
- नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय में अफसरों से ज्यादा कंसल्टेंट काम कर रहे हैं।
- स्टेट कैडर के अफसर एक हजार हैं, जबकि कंसल्टेंट 1100 से ज्यादा हैं।
- विभाग हर महीने इन पर 8 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है।
- अमृत 2.0, स्मार्ट सिटी और पीएम आवास योजना में सैकड़ों कंसल्टेंट तैनात हैं।
- कुछ फर्मों के साथ करार आठ साल से भी ज्यादा समय से चल रहा है।
मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन भोपाल एवं विकास संचालनालय का हाल गजब है। यहां स्टेट कैडर के अफसरों से ज्यादा कंसल्टेंट काम कर रहे हैं।
बता दें कि सरकारी अफसरों की संख्या को एक हजार है। वहीं कंसल्टेंट की संख्या 1100 से भी ज्यादा है। इन कंसल्टेंट पर विभाग हर महीने 8 करोड़ रुपए खर्च करता है।
इतना ही नहीं। नगरीय निकायों में भी अलग से कंसल्टेंट नियुक्त हैं। केंद्र सरकार की मदद से प्रदेश में अमृत 2.0, हाउसिंग फॉर ऑल, स्वच्छ भारत मिशन और स्मार्ट सिटी जैसी योजनाएं चल रही हैं।
राज्य की भी कई योजनाओं में बड़ी संख्या में कंसल्टेंट लगाए गए हैं। यानी पूरा विभाग कंसल्टेंट के भरोसे चल रहा है।
अफसरों की सफाई
नगरीय विकास विभाग के एसीएस संजय दुबे का कहना है कि एक साल में 300 कंसल्टेंट बाहर किए गए हैं। जिनका काम ठीक नहीं है, उन्हें हटाया जा रहा है।
संजय दुबे के मुताबिक प्रदेश में 413 निकाय हैं। विभाग में योजनाएं और कार्यक्रम ज्यादा हैं। इसलिए कंसल्टेंट की जरूरत पड़ती है।
अमृत में हर साल 72 करोड़ खर्च
जानकारी के अनुसार अमृत 2.0 योजना में सबसे ज्यादा कंसल्टेंट लगे हैं। दिसंबर 2025 तक 1383 कंसल्टेंट काम कर रहे थे। अभी यह संख्या 1139 है।
निकायों में पेयजल, सीवेज और ग्रीन एरिया डेवलपमेंट के लिए अकेले अमृत 2.0 में 900 से ज्यादा कंसल्टेंट रखे गए हैं।
- इसमें केपीएमजी एडवाइजरी सर्विसेज के 42
- एजिस इंडिया कंसल्टिंग इंजीनियर्स के 179
- शाह टेक्निकल कंसलटेंट के 277
- टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के 222
- आरवी इंजीनियरिंग कंसलटेंट के 179
इन सभी को हर महीने पांच करोड़ 92 लाख रुपए दिए जा रहे हैं। इस योजना का करार 2028 तक है। अनुबंध फरवरी से अप्रैल 2028 के बीच खत्म होंगे। यानी तब तक हर साल 72 करोड़ रुपए का भुगतान होता रहेगा।
साढ़े आठ साल एक ही फर्म
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के लिए एजिस इंडिया कंसल्टिंग इंजीनियर्स को कंसल्टेंट नियुक्त किया गया था। फर्म से करार मार्च 2017 में हुआ था। उस समय कंपनी के 218 कंसल्टेंट काम कर रहे थे।
इन्हें हर महीने एक करोड़ 27 लाख रुपए दिए जाते थे। यह करार 31 दिसंबर 2025 तक के लिए था। यानी साढ़े आठ साल तक एक ही फर्म पीएम आवास योजना का काम संभालती रही।
दूसरी योजनाओं में भी कंसल्टेंट राज
वहीं स्वच्छ भारत मिशन में केपीएमजी एडवाइजरी सर्विसेज के 43 कंसल्टेंट काम कर रहे हैं। फर्म को हर महीने 64 लाख रुपए मिलते हैं। यह करार 2 अक्टूबर 2026 तक है।
जर्मन बैंक KFW से मदद वाली योजनाओं में जीटेक के 27 सलाहकार काम कर रहे हैं। उन्हें हर महीने 85 हजार यूरो का भुगतान होता है। यह अनुबंध अगले महीने खत्म हो रहा है।
एशियाई विकास बैंक से जुड़ी योजनाओं में एसएमईसी इंटरनेशनल और एसएमईसी इंडिया का संयुक्त उपक्रम काम कर रहा है। इसके 126 सलाहकारों को हर महीने 1.34 करोड़ रुपए दिए जाते हैं।
इसके अलावा शाह टेक्निकल कंसलटेंट और लेक्सस के संयुक्त उपक्रम के 6 सलाहकारों को हर महीने 5 लाख रुपए मिलते हैं।
नमामि गंगे योजना में एनजेएस इंजीनियरिंग के 33 कंसल्टेंट काम कर रहे हैं। यह करार अप्रैल 2027 तक चलेगा। सिंहस्थ के लिए ग्रांट थोरंटन भारत एलएलपी के 13 कंसल्टेंट को हर महीने 24 लाख रुपए दिए जा रहे हैं।
आईटी और फायर सेल में भी सलाहकार
आईटी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के लिए अर्नस्ट एंड यंग एलएलपी के 12 सलाहकार काम कर रहे हैं। फायर सेल के लिए इसी फर्म के 4 कंसल्टेंट का करार 21 अक्टूबर 2025 तक था। उन्हें हर महीने 14.05 लाख रुपए दिए जाते थे।
स्मार्ट सिटी के लिए अर्नस्ट एंड यंग एलएलपी का करार 31 मार्च 2025 तक था। फर्म को 7 कंसल्टेंट के लिए हर महीने 27 लाख 84 हजार रुपए दिए गए।
वहीं एडीबी से चल रही योजनाओं के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर रिसर्च ग्रुप के जेवी को कंसल्टेंट बनाया गया है। इसके 8 सलाहकारों को हर महीने पांच लाख 53 हजार रुपए मिलते हैं। यह करार 15 मार्च 2026 तक है।
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग में अफसरों से कहीं ज्यादा कंसल्टेंट काम कर रहे हैं। हर महीने करोड़ों रुपए इन पर खर्च हो रहे हैं।
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