माउंट एवरेस्ट का एमपी कनेक्शन, जिस केंद्र ने नापी ऊंचाई, वह भूरी टोरी अब बनी खंडहर

Manya Jain | May 11, 2026, 14:59 IST
Vidisha Sironj Bhuri Tori Observatory Mount Everest
मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में स्थित भूरी टोरी वेधशाला से ब्रिटिश सर्वेयरों ने माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई मापने का आधार तैयार किया था। आज यह ऐतिहासिक धरोहर खंडहर में बदल चुकी है।

5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला

  • विदिशा के सिरोंज के पास कल्याणपुर में भूरी टोरी वेधशाला है।
  • यहीं से GTS के तहत माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नापी गई थी।
  • 1840 में कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट ने इसे सर्वे का केंद्र बनाया।
  • आज दीवारें टूटी हैं, पत्थर चोरी हो चुके हैं, पेंडुलम गायब हैं।
  • नगर पालिका और ग्राम पंचायत के बीच जिम्मेदारी का कोई नहीं।

एक पहाड़ी, जिसने दुनिया नापी

मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में सिरोंज के पास कल्याणपुर गांव है। यहां एक हवा-पीटी पहाड़ी पर खड़ी है भूरी टोरी वेधशाला। यह जगह अब सूनी पड़ी है। लेकिन कभी यहां से दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ की ऊंचाई का हिसाब निकाला गया था।



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करीब 200 साल पहले अंग्रेज सर्वेयर यहां डेरा जमाते थे। तारे देखते थे। कोण नापते थे। और एक-एक गणना से पूरे सबकॉन्टिनेंट का नक्शा खींचते थे। माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई का जो रिकॉर्ड आज दुनिया जानती है, उसकी जड़ें इसी पहाड़ी में हैं। आज वही पहाड़ी उपेक्षा की दर्दनाक कहानी कह रही है।



भूरी टोरी नाम कैसे पड़ा?

"भूरी" यानी गोरे रंग वाले विदेशी। "टोरी" यानी हलचल और भागदौड़। जब अंग्रेज सर्वेयर यहां काम करने आए तो उनकी गोरी चमड़ी और लगातार गतिविधि देखकर स्थानीय लोगों ने यह नाम रख दिया।



डेटा बताते हैं कि इस पहाड़ी पर करीब 700 मजदूर लगभग दो साल तक डटे रहे। उनके साथ चार हाथी, 42 ऊंट और 30 घोड़े भी थे। काली पत्थर की वेधशाला यहीं खड़ी हुई। इतने बड़े काम के लिए यही जगह क्यों चुनी गई, इसका जवाब भूगोल में छिपा है।



Unseen, the historic brown Tori is turning into ruins... | अनदेखी में ऐतिहासिक भूरी टोरी खंडर में ह


स्थानीय इतिहास प्रेमी शाऊब गाजी बताते हैं कि यह जगह ग्रेट आर्क माप और प्राइम मेरिडियन की गणनाओं के बीच एक सटीक मिडपॉइन्ट थी। उनके शब्दों में, "यह जगह ग्रेट आर्क और प्राइम मेरिडियन के लोंगिट्यूड अंतर को ठीक बीच से बांटने के लिए एकदम सही थी। यानी यह महज इत्तेफाक नहीं था। यह सोची-समझी वैज्ञानिक जरूरत थी।



जब गणित ने एवरेस्ट की ऊंचाई खोजी

जीटीएस (GTS) 19वीं सदी का सबसे बड़ा वैज्ञानिक अभियान था। विलियम लैम्बटन ने इसे 1800 के दशक में शुरू किया। जॉर्ज एवरेस्ट और जेम्स वॉकर ने इसे आगे बढ़ाया। कल्याणपुर का स्टेशन इस पूरे सर्वे का मुख्य केंद्र था।



Mount-Everest


इसे गणना का उद्गम स्थल घोषित किया गया था। यहां से ली गई माप ही पूरी गणना का आधार थी। उस समय न जीपीएस था और न सैटेलाइट। सर्वेयर त्रिभुजों की मदद से दूरियाँ मापते थे। त्रिकोणमिति के इस्तेमाल से हजारों किलोमीटर की दूरी मापी गई।



वेधशाला की बनावट में छिपा विज्ञान

काली पत्थर की दीवारों से बनी यह वेधशाला अपनी बनावट में ही अपना उद्देश्य बताती है। उत्तर-दक्षिण दीवारों में खांचे बने हैं, जो तारों की स्थिति देखने के लिए थे। छत नहीं थी। खुला आसमान ही प्रयोगशाला की छत का काम करता था।



पास के सुरांटल गांव में खंभों पर टेलीस्कोपिक सिस्टम लगाए जाते थे। भूरी टोरी से गैस लालटेनें जलाकर उनकी ओर संकेत भेजे जाते थे। यह ट्रिगोनोमेट्रिक जांच की प्रक्रिया थी। बाद में पास में दो पेंडुलम स्ट्रक्चर भी बनाई गईं।



1917 में प्रकाशित पुस्तक "Triangulation in India and Adjacent Countries" में भूरी टोरी का उल्लेख दक्षिण एशिया के व्यापक भूगणितीय यानी geodetic ढांचे के अहम हिस्से के रूप में किया गया है। यहां से तय किए गए निर्देशांक दशकों तक नक्शों, आर्मी चार्ट और प्रशासनिक सीमाओं की बुनियाद बनते रहे।



आज बस खंडहर और खामोशी

अब वहां क्या बचा है? टूटी दीवारें। गायब पत्थर। खोखली पेंडुलम संरचनाएं। मौसम पत्थरों को धीरे-धीरे काट रहा है। धरोहर प्रेमियों का कहना है कि बर्बरता और चोरी ने उतनी तेजी से नुकसान पहुंचाया है जितना अधिकारी स्वीकार करने को तैयार नहीं।



सिरोंज भोपाल से सड़क मार्ग पर करीब दो घंटे की दूरी पर है। फिर भी भूरी टोरी न पर्यटन के नक्शे पर है, न संरक्षण की किसी योजना में। सिरोंज के मुख्य नगर पालिका अधिकारी रामप्रकाश ने कहा कि यह जगह ग्राम पंचायत की सीमा में है इसलिए शहरी निकाय का अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।



शाऊब गाजी कहते हैं, "यह हमारा छिपा हुआ नायक है, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।" वे सोशल मीडिया के जरिए इस जगह को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब तक सरकारी मशीनरी नहीं हिलती, तब तक इस धरोहर का कितना हिस्सा बचेगा।



यह खबर क्यों जरूरी है

भूरी टोरी सिर्फ एक पुरानी और टूटी इमारत नहीं है। यह हमारे गौरवशाली वैज्ञानिक इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है। इसी वेधशाला की मदद से माउंट एवरेस्ट की सटीक ऊंचाई मापी गई। हमारे संविधान का अनुच्छेद 49 धरोहरों की रक्षा करने की सीख देता है। ऐ



तिहासिक और वैज्ञानिक स्मारकों को बचाना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है। इस इमारत की अनदेखी करना हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी का अपमान है। सामाजिक नैतिकता कहती है कि हमें अपने गौरव को बचाना चाहिए।



ऐसी जगहों को शिक्षा और पर्यटन का केंद्र बनाना बहुत जरूरी है। प्रशासन को "अधिकार क्षेत्र" की लड़ाई छोड़कर अब काम करना होगा। धरोहरों को बर्बाद होने से बचाने के लिए अब हमें जागना होगा।



FAQ

  1. भूरी टोरी वेधशाला का माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से क्या संबंध है?
    भूरी टोरी विदिशा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक वेधशाला है, जहां से माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई की गणना की गई थी। कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट ने इसे GTS Geological Survey का "गणना का उद्गम" बनाया।
  2. GTS यानी ग्रेट ट्राइगोनोमेट्रिकल सर्वे क्या था?
    GTS 19वीं सदी का एक वैज्ञानिक मानचित्रण अभियान था, जिसके जरिए भारतीय उपमहाद्वीप का सटीक नक्शा तैयार किया गया। यह GPS से पहले का सबसे बड़ा मानचित्रण था।
  3. भूरी टोरी के संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी है और अभी स्थिति क्या है?
    भूरी टोरी की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है, लेकिन इसे संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। मौसम और चोरी ने इसे नुकसान पहुंचाया है, और अब भी इसे पर्यटन नक्शे पर स्थान नहीं मिला है।

Geological Survey of India



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