BJP में ‘घर का घमासान’: पूर्व मंत्री सैयाम बनाम मंत्री उइके, मंच से ही तानाशाही के आरोप–‘झूठ बोल रहे हैं’ का पलटवार
मध्य प्रदेश के मंडला में भाजपा का अंदरूनी संघर्ष अब खुलकर सड़क पर आ गया है। नैनपुर के सामूहिक विवाह मंच से ही पूर्व मंत्री देवी सिंह सैयाम ने द सूत्र से बातचीत में अपनी ही सरकार की मंत्री संपतिया उइके पर “तानाशाही” के गंभीर आरोप जड़ दिए। जवाब में मंत्री उइके ने भी बिना देर किए आरोपों को “झूठ और फालतू राजनीति” करार दे दिया। यानी, पार्टी के भीतर सीधा आमना-सामना।
‘तानाशाही’ का आरोप: सैयाम का सीधा हमला
पूर्व मंत्री देवी सिंह सैयाम ने मंच से कहा कि मंत्री उइके की कार्यशैली तानाशाही जैसी है। उनका आरोप है कि इसी कारण क्षेत्र के डेढ़ करोड़ रुपए के विकास कार्य वापस हो गए। सैयाम ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों की अनदेखी अब आम बात हो गई है।
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मंच से ‘बेइज्जती’ का आरोप
सैयाम ने एक साल पुराना मामला उठाते हुए दावा किया कि मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के कार्यक्रम में उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई और उन्हें “बेइज्जत होकर लौटना पड़ा।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंत्री के रवैये के चलते जनपद सदस्य तक कार्यक्रम से दूर रहे।
गरीबों के हक पर सवाल
पूर्व मंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने आरोप लगाया कि कन्यादान योजना की राशि गरीब कन्याओं तक सही तरीके से नहीं पहुंची और चेक वितरण में भी गड़बड़ी हुई। यानी मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े किए गए।
उइके का पलटवार: “झूठ की राजनीति कर रहे सैयाम”
मंत्री संपतिया उइके ने द सूत्र चर्चा में इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सैयाम के आरोप बेबुनियाद हैं और सिर्फ सुर्खियां बटोरने की कोशिश है।
उइके ने तीखे लहजे में कहा—“राजनीति में इस तरह के आरोप नई बात नहीं हैं, लेकिन इनमें कोई सच्चाई नहीं है।”
भाजपा के भीतर दरार? खुलकर सामने आया अंदरूनी संघर्ष
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की अंदरूनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ पूर्व मंत्री खुलकर मौजूदा मंत्री पर हमला बोल रहे हैं, तो दूसरी तरफ जवाब भी उतना ही आक्रामक आ रहा है। यह सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर खींचतान का खुला संकेत माना जा रहा है।
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सबसे बड़ा सवाल: नेतृत्व कितना मजबूत?
अब नजर इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व इस टकराव को कैसे संभालता है। क्या यह विवाद यहीं थमेगा या आने वाले समय में और बड़े सियासी संकट में बदलेगा?
भाजपा में यह मामला सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं दिख रहा। एक तरफ “तानाशाही” के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ “झूठ की राजनीति” का जवाब। साफ है—यह लड़ाई अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पार्टी की छवि और संगठनात्मक मजबूती पर भी असर डाल सकती है। आगे क्या होगा, यही असली कहानी है।