डिलीवरी के नाम पर डर का धंधा: सिजेरियन डिलीवरी बनी 54 हजार करोड़ का व्यापार, भोपाल अव्वल

Sanjay Dhiman | Apr 27, 2026, 12:38 IST
Photograph: (the sootr)
भारत में सिजेरियन डिलीवरी का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। निजी अस्पताल डर का माहौल बनाकर नॉर्मल डिलीवरी को 54 हजार करोड़ के बड़े बिजनेस में बदल रहे हैं।

मां बनना दुनिया का सबसे सुखद अहसास है। लेकिन आज के दौर में डॉक्टरों ने इसे व्यापार का जरिया बना लिया है। भोपाल हो या इंदौर, हर बड़े शहर में प्रसूता को मरीज की तरह ट्रीट किया जा रहा है। सामान्य प्रसव यानी नॉर्मल डिलीवरी को अब एक पुरानी बात मान लिया गया है।



भोपाल के निजी अस्पतालों में तो हर दूसरा बच्चा सिजेरियन से हो रहा है। सरकारी अस्पतालों का हाल भी अब कुछ बहुत ज्यादा अलग नहीं रह गया है। यहां भी हर तीसरी महिला को ऑपरेशन से डिलीवरी करवाई जा रही है। ये सारा खेल 'हाई रिस्क' का डर दिखाकर हो रहा है।



मानसिक दबाव और डर का खेल

निजी अस्पतालों में जब महिला भर्ती होती है, तो उसे सिजेरियन के लिए राजी करने का एक दबाव शुरू हो जाता है। डाक्टर इसे 'सुरक्षित' और 'आरामदायल' बताते हैं, ताकि कोई भी खतरा न हो। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज डाक्टर के कहने पर सिजेरियन ऑपरेशन करवाने के लिए राजी हो जाते हैं। जबकि वास्तविकता में स्थिति उतनी गंभीर नहीं होती।



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भोपाल में 45% से ज्यादा सिजेरियन

नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भोपाल के प्राइवेट अस्पतालों में 45% से ज्यादा डिलीवरी सिजेरियन हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों में ये आंकड़ा लगभग 34% के करीब पहुंच चुका है। यह आंकड़ा बहुत अधिक लगता है, लेकिन यह सरकारी और निजी अस्पतालों में एक आम स्थिति बन चुकी है। एक नॉर्मल केस में जहां कुछ हजार लगते हैं, वहीं सिजेरियन का बिल सीधे 80 हजार से एक लाख तक पहुंच जाता है।



वर्षकुल प्रसवसिजेरियन
2020-2120,386,2804,098,969
2021-2220,410,7304,533,190
2022-2320,963,5984,993,291
2023-2420,351,2615,143,156
2024-2519,789,4065,434,735

इस टेबल में राष्ट्रीय औसत के अनुसार कुल प्रसव और सिजेरियन डिलीवरी के मामलों का डेटा है, जो लगातार बढ़ते जा रहे हैं।



केस स्टडी: जब मजबूरी को बनाया गया मुनाफा

भोपाल की एक महिला ने बताया कि उन्हें कोई दर्द नहीं था, सब कुछ ठीक था। लेकिन डॉक्टर ने कहा कि नॉर्मल में घंटों लगेंगे और सिजेरियन ज्यादा सुरक्षित रहेगा। डर के कारण परिवार ने हां कर दी और बिल आया पूरे 85 हजार रुपए। एक और 26 साल की महिला को डराया गया कि दर्द बढ़ने पर बच्चे को खतरा हो सकता है। बच्चा फंस सकता है।



परिवार को सिजेरियन की सलाह दी गई। जिसका बिल बना एक लाख। ये कहानियां हर दूसरे घर की हैं, जहां डॉक्टरों के "सेफ ऑप्शन" वाले सुझाव के पीछे मुनाफे का मोटा गणित छिपा होता है।



सिजेरियन के साइड इफेक्ट्स

डॉक्टरों की मानें तो सिजेरियन से जन्मे बच्चों में आगे चलकर कई परेशानियां हो सकती हैं। इन बच्चों में मोटापा, एलर्जी और इम्युनिटी की कमी होने का खतरा ज्यादा रहता है। वहीं मां के लिए भी ये उम्र भर का दर्द बन जाता है। अगली प्रेगनेंसी में कॉम्प्लिकेशंस बढ़ जाते हैं और ब्लीडिंग का खतरा बना रहता है। लेकिन इन सब बातों को साइड में रखकर, केवल पैसे के लिए ऑपरेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह पूरी प्रक्रिया अब 54 हजार करोड़ के एक बड़े उद्योग में तब्दील हो चुकी है।



सिजेरियन का बढ़ता ट्रेंड-

साल दर साल सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में वृद्धि हो रही है। उदाहरण के लिए, 2020-21 में भोपाल में सरकारी अस्पतालों में 7108 और निजी अस्पतालों में 7133 सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। वहीं, 2024-25 तक यह संख्या बढ़कर 11083 सरकारी और 8090 निजी हो गई है।



वर्षसरकारी (सामान्य/सिजेरियन)निजी (सामान्य/सिजेरियन)
2020-2121992 / 710815314 / 7133
2021-2221995 / 743914897 / 4579
2022-2324844 / 803311380 / 7139
2023-2423010 / 1029417191 / 6645
2024-2521398 / 1108310420 / 8090

इस टेबल में सरकारी और निजी अस्पतालों में सामान्य और सिजेरियन डिलीवरी के मामलों का डेटा है, जो हर साल बढ़ते जा रहे हैं।



क्यों बढ़ रहे हैं सिजेरियन डिलीवरी के मामले?

महिलाएं प्रसव पीड़ा से डरती हैं

एम्स भोपाल के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय हलदर के अनुसार, महिलाएं अब प्रसव पीड़ा सहन नहीं करना चाहतीं। डॉक्टर्स भी नॉर्मल डिलीवरी का जोखिम नहीं लेना चाहते, इसलिए सिजेरियन डिलीवरी को प्राथमिकता दी जाती है। इसके अलावा, जटिल प्रेगनेंसी, ज्यादा उम्र में शादी और बीमारी की वजह से भी सिजेरियन डिलीवरी बढ़ी है।



शहरी जीवनशैली और डर

शहरी जीवनशैली में महिलाएं प्रसव से जुड़े डर और दर्द की आशंका से जूझती हैं। परिवार के दबाव और सही जानकारी की कमी की वजह से महिलाएं यह फैसला जल्दबाजी में लेती हैं। मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का मानना है कि गर्भवती महिलाओं को सही जानकारी और भावनात्मक समर्थन मिलना चाहिए, ताकि उनका निर्णय समझदारी और संतुलित हो।



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