राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में सरकारी रवैए पर कोर्ट सख्त, राजस्थान-MP के अफसर तलब
समझें क्या है पूरा मामला
- चंबल अभयारण्य में अवैध बालू खनन बड़ी समस्या बन चुकी है।
- सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान और MP के वरिष्ठ अफसरों को तलब किया है।
- कोर्ट ने राजस्थान सरकार के रवैये को लापरवाह और उदासीन बताया है।
- पुल की नींव के नीचे तक खनन हो रहा है, NHAI को भी नोटिस मिला है।
- 20 मई को अफसरों को हलफनामे के साथ कोर्ट में हाजिर होना होगा।
चंबल में अवैध खनन और SC की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई में राजस्थान और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाहों को तलब किया है। मामला राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में बेरोक-टोक चल रहे अवैध बालू खनन का है। यह अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तीनों राज्यों में फैला है। यह देश का पहला और इकलौता त्रि-राज्यीय नदी संरक्षित क्षेत्र है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने यह सुनवाई की है। कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सरकार ने पहले दिए गए निर्देशों का पालन करने में पूरी तरह लापरवाह, उदासीन और सुस्त रवैया दिखाया है।
राजस्थान को कड़ी फटकार
कोर्ट की भाषा बेहद सख्त थी। बेंच ने कहा कि इतने गंभीर पर्यावरणीय नुकसान के बावजूद राज्य सरकार की निष्क्रियता चिंताजनक है। इससे साफ होता है कि पर्यावरण और कानून के शासन के प्रति राज्य की मशीनरी में गंभीरता का अभाव है।
कोर्ट ने राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को 20 मई को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का निर्देश दिया है। खनन और भूविज्ञान, वित्त, वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, तथा परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभागों के प्रमुख सचिवों को भी बुलाया गया है।
हर अधिकारी को अपना अलग हलफनामा दाखिल करना होगा। इसमें पहले के निर्देशों पर हुई कार्रवाई का ब्यौरा देना होगा।
MP की स्थिति भी संतोषजनक नहीं
मध्य प्रदेश के बारे में कोर्ट ने कहा कि वहां काम शुरू तो हुआ है, लेकिन यह अभी शुरुआती दौर में ही है। जमीनी स्तर पर अभी भी कई जरूरी कदम उठाए जाने बाकी हैं।
इसलिए MP के परिवहन और सड़क सुरक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को भी 20 मई को हाजिर होने का आदेश दिया गया है। उन्हें भी विस्तृत हलफनामा देना होगा।
यह पूरी सुनवाई एक स्वतः संज्ञान मामले में हो रही है। इसकी शुरुआत उन मीडिया रिपोर्टों के बाद हुई थी जिनमें चंबल में अवैध खनन माफिया की करतूतों का खुलासा किया गया था।
अफसर मारे गए, माफिया बेखौफ
इस मामले का एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। कोर्ट ने कहा कि कई अधिकारी खनन माफिया को रोकने की कोशिश में अपनी जान गंवा चुके हैं। कुछ गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर है। कोर्ट ने इसे कानून के शासन का गंभीर क्षरण करार दिया।
एक और बड़ी समस्या यह है कि अवैध खनन के मामलों में दर्ज FIR में सिर्फ वाहन चालकों को आरोपी बनाया जा रहा है। माफिया के असली सरगनाओं तक कार्रवाई नहीं पहुंच रही है। कोर्ट ने इसे जानबूझकर की गई लापरवाही और संभावित मिलीभगत का संकेत बताया है।
पुल की नींव खोद रहा माफिया
सुनवाई में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। न्यायालय के मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने बेंच को बताया कि खनन माफिया चंबल नदी पर बने एक पुल की नींव के नीचे भी खुदाई कर रहे हैं। यह पुल मध्य प्रदेश और राजस्थान को जोड़ता है।
कोर्ट ने इसे बेहद चौंकाने वाला बताया है। इसे राज्य की मशीनरी की पूर्ण विफलता करार दिया गया है। इसके बाद कोर्ट ने NHAI (National Highways Authority of India) को इस मामले में पक्षकार बनाया गया है। NHAI को पुल की संरचनात्मक सुरक्षा पर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।
NHAI पर भी जिम्मेदारी
कोर्ट ने NHAI को निर्देश दिया कि वह पुल की सुरक्षा के लिए उठाए गए या उठाए जाने वाले कदमों का विवरण दे। साथ ही पुल पर और उसके आसपास CCTV और निगरानी प्रणाली लगाने की संभावना भी तलाशने को कहा गया है। इससे खनन गतिविधियों और वाहनों की रियल-टाइम निगरानी हो सकेगी।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अफसरों के हलफनामों में यह जानकारी जरूर होनी चाहिए कि, बिना पंजीकरण वाले और अज्ञात वाहनों की पहचान और रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
20 मई को होगा फैसले का सामना
20 मई की सुनवाई अहम होगी। कोर्ट ने दोषी अधिकारियों और उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा मांगा है। यह भी बताना होगा कि पहले दिए गए सभी निर्देशों को लागू करने की निश्चित समयसीमा क्या है। यह सुनवाई साफ संकेत देती है कि सुप्रीम कोर्ट अब और देरी बर्दाश्त नहीं करेगा।
यह खबर क्यों जरूरी है
चंबल अभयारण्य भारत की जैव विविधता का एक अनमोल खजाना है। यहां घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। अवैध बालू खनन न सिर्फ इस पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है, बल्कि सार्वजनिक अवसंरचना जैसे पुलों को भी खतरे में डाल रहा है।
यह खबर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के स्वस्थ पर्यावरण में जीने के मौलिक अधिकार से जुड़ी है।
जब अधिकारी माफिया के हाथों मारे जाते हैं और FIR में सिर्फ ड्राइवरों को फंसाया जाता है, तो यह कानून के शासन पर सीधा हमला है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप न्यायिक जवाबदेही का जरूरी उदाहरण है।
FAQ
- राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्या है और यह क्यों खास है?
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य भारत का पहला और एकमात्र त्रि-राज्यीय नदी संरक्षित क्षेत्र है। यह राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तीनों राज्यों में फैला हुआ है। यहां गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल, गंगा नदी डॉल्फिन और रेड-क्राउन्ड रूफ टर्टल जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। चंबल नदी देश की सबसे कम प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है। इसीलिए यहां अवैध खनन से होने वाला नुकसान अपूरणीय माना जा रहा है।
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