केन-बेतवा लिंक परियोजना: मुआवजे की मांग को लेकर चिता आंदोलन उग्र होने की चेतावनी
समझें क्या है पूरा मामला...
- छतरपुर और पन्ना में केन बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित परिवारों का आंदोलन चल रहा है।
- इसे चिता आंदोलन नाम दिया गया है।
- दसवें दिन भी जय किसान संगठन के बैनर तले संघर्ष जारी है।
- आंदोलन में कई तरह के सत्याग्रह एक साथ चल रहे हैं।
- नेता अमित भटनागर का आमरण अनशन सातवें दिन में पहुंच गया है।
छतरपुर और पन्ना जिले में विस्थापित परिवारों का संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है। केन बेतवा लिंक परियोजना और इससे जुड़ी अन्य परियोजनाओं की वजह से कई गांव प्रभावित हुए हैं। मझगांय, रूंझ, नेगुवा और एनटीपीसी (National Thermal Power Corporation) की परियोजनाओं से लोग विस्थापित हो रहे हैं।
इन्हीं परिवारों ने जय किसान संगठन के बैनर तले आंदोलन शुरू किया है। इसे चिता आंदोलन नाम दिया गया है। यह आंदोलन आज, रविवार को दसवें दिन भी पूरी तीव्रता के साथ जारी है। विपरीत मौसम के बावजूद आंदोलनकारियों का हौसला कम नहीं हुआ है।
अनशन का दायरा लगातार बढ़ रहा है
आंदोलन में कई तरह के सत्याग्रह एक साथ चल रहे हैं। मिट्टी सत्याग्रह अपने छठवें दिन में पहुंच गया है। जल सत्याग्रह पांचवें दिन भी जारी है। फांसी सत्याग्रह भी तीसरे दिन में प्रवेश कर चुका है।
इन सभी तरीकों से आंदोलनकारी अपनी मांगें प्रशासन तक पहुंचा रहे हैं। संगठन का कहना है कि यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक न्याय नहीं मिलता।
अमित भटनागर की तबीयत बिगड़ी
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर का आमरण अनशन सातवें दिन में पहुंच गया है। लगातार भूखे रहने से उनकी सेहत बिगड़ने लगी है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि छह दिन बीतने के बाद भी प्रशासन ने कोई स्वास्थ्य परीक्षण नहीं कराया।
उन्होंने इसे प्रशासन की गंभीर लापरवाही बताया है। आंदोलनकारियों ने कहा कि वे अपनी मर्जी से यहां नहीं बैठे हैं। उनका कहना है कि हालात ने उन्हें यह रास्ता चुनने पर मजबूर किया है।
कानून का हवाला देकर उठाए सवाल
अमित भटनागर ने भू अर्जन कानून 2013 की धारा 38(1) और 38(2) का हवाला दिया है। उन्होंने साफ कहा कि पूरा मुआवजा मिले बिना जमीन अधिग्रहण गैरकानूनी है। उनके मुताबिक बिना नोटिस और बिना उचित मुआवजा दिए मकान तोड़ना कानून का उल्लंघन है।
उन्होंने प्रशासन से सीधा सवाल पूछा। उनका कहना था कि अगर सरकार खुद अपने कानून तोड़ेगी, तो जनता न्याय के लिए कहां जाएगी। यह बयान आंदोलन की मुख्य मांग को साफ तौर पर सामने रखता है।
आदिवासी महिलाओं ने सुनाई अपनी पीड़ा
आंदोलन में कई आदिवासी महिलाएं क्रमिक अनशन पर बैठी हैं। छतरपुर की पुनयने भी इनमें शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन का रवैया तानाशाही और भ्रष्ट रहा है।
उनके मुताबिक बिना सहमति उनका घर, जंगल और जमीन छीन ली गई। दिया जा रहा मुआवजा भी बहुत कम बताया गया है। पुनयने ने कहा कि उनकी विधवा बहू पूजा आदिवासी का घर बिना कोई मुआवजा दिए तोड़ दिया गया।
एक अन्य महिला पूना आदिवासी ने भी अपनी पीड़ा साझा की। उनका कहना है कि उनकी बेटी और जमीन का मुआवजा नहीं दिया गया। इसके बावजूद प्रशासन ने उनका घर जबरन गिरा दिया।
बिना नोटिस तोड़े गए कई मकान
पन्ना जिले के कोनी, बिलहटा, गहदरा और महरा गांव की महिलाओं ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बिना मुआवजा और बिना नोटिस दिए उनके मकान गिरा दिए गए।
कई महिलाओं ने बताया कि जमीन भी जबरन अधिग्रहीत कर ली गई। कुछ महिलाओं का यह भी कहना है कि उन्हें घर का सामान तक नहीं निकालने दिया गया। इस वजह से आंदोलनकारियों में गहरा आक्रोश है।
आंदोलन को मिल रहा व्यापक समर्थन
यह संघर्ष अब चारों तरफ से समर्थन हासिल कर रहा है। बड़वानी से जाग्रत दलित आदिवासी संगठन के नितिन भाई आंदोलन स्थल पहुंचे हैं। गांधी आश्रम की संस्थापक दमयंती बहिन ने भी एकजुटता जताई है।
हरियाणा से वरिष्ठ साहित्यकार अविनाश कुमार भी आंदोलन में शामिल हुए हैं। इनके अलावा कई समाजसेवी लगातार आंदोलन स्थल पर पहुंच रहे हैं। इस समर्थन ने आंदोलनकारियों का हौसला और बढ़ा दिया है।
कई लोग क्रमिक अनशन पर बैठे
अमित भटनागर के आमरण अनशन के साथ कई महिला और पुरुष क्रमिक अनशन कर रहे हैं। इनमें सोमरनी आदिवासी, रामकली आदिवासी और हरवाई आदिवासी शामिल हैं। पानबाई आदिवासी, कलावती आदिवासी और चम्पा आदिवासी भी इस सूची में हैं।
मझली बहू आदिवासी, अंगी बाई आदिवासी और अगना बाई आदिवासी भी अनशन कर रही हैं। आशा आदिवासी, रानी आदिवासी और चंदा आदिवासी भी शामिल हैं। ग्याप्रसाद कोंदर, लक्ष्मण कोंदर, बाबूलाल आदिवासी, हरि आदिवासी और तोरण सिंह आदिवासी भी हर दिन आवाज उठा रहे हैं।
आंदोलनकारियों की स्पष्ट मांग
आंदोलनकारियों ने अपनी मांग साफ कर दी है। उनका कहना है कि सभी विस्थापित परिवारों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए। साथ ही कथित भ्रष्टाचार के मामलों की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
यदि यह मांगें पूरी नहीं होतीं, तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है। संगठन ने साफ कर दिया है कि पीछे हटने का कोई इरादा नहीं है। आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा और तेज हो सकती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर विस्थापित आदिवासी परिवारों के अधिकारों से जुड़ी है। यह मामला भू अर्जन कानून के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाता है। संविधान हर नागरिक को न्याय पाने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार देता है।
यह खबर उसी अधिकार के इस्तेमाल को सामने लाती है। साथ ही यह अनशनकारी की सेहत और मानवीय गरिमा से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी उठाती है। ऐसी खबरें प्रशासन की जिम्मेदारी और पारदर्शिता की जरूरत को उजागर करती हैं। यह जानकारी लोगों को उनके अधिकार और कानूनी प्रावधान समझने में मदद करती है।
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