पत्नी की गुप्त रिकॉर्डिंग पर हाईकोर्ट का फैसला, निजता के आधार पर नहीं होगी खारिज
समझें क्या है पूरा मामला...
- छतरपुर की महिला ने पति से भरण पोषण मांगा था।
- पति ने पत्नी पर एडल्ट्री के गंभीर आरोप लगाए थे।
- पति ने दूसरे पुरुषों से बातचीत की रिकॉर्डिंग पेश की।
- फैमिली कोर्ट ने निजता के आधार पर रिकॉर्डिंग रोक दी।
- हाईकोर्ट ने रिकॉर्डिंग की जांच का रास्ता साफ किया।
एडल्ट्री आरोपों से शुरू हुआ पूरा विवाद
दरअसल जबलपुर हाईकोर्ट में छतरपुर का वैवाहिक विवाद पहुंचा। मामला पत्नी के भरण पोषण से जुड़ा था। पति ने पत्नी पर एडल्ट्री के आरोप लगाए थे। उसका दावा था कि पत्नी कई पुरुषों के संपर्क में थी। पति ने इन आरोपों को साबित करने की कोशिश की।
पति ने पत्नी की कई बातचीत रिकॉर्ड की थी। ये रिकॉर्डिंग पत्नी की जानकारी के बिना की गई थी। पति ने रिकॉर्डिंग वाली सीडी कोर्ट में पेश की। साथ में बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट भी पेश किया गया। पति का दावा था कि रिकॉर्डिंग से आरोप साबित होंगे।
पति ने किया भरण पोषण का विरोध
पति ने भरण पोषण रोकने की मांग की थी। उसने सीआरपीसी की धारा 125(4) का सहारा लिया। इस प्रावधान में कुछ स्थितियों का जिक्र है। पति का दावा था कि पत्नी ऐसी स्थिति में है। इसलिए उसे भरण पोषण नहीं मिलना चाहिए।
पति ने कोर्ट से डिजिटल सबूत स्वीकार करने की मांग की। उसका कहना था कि रिकॉर्डिंग मामले की सच्चाई सामने ला सकती है। रिकॉर्डिंग में पत्नी की कई पुरुषों से बातचीत बताई गई। इसी आधार पर एडल्ट्री के आरोप लगाए गए।
2018 में फैमिली कोर्ट ने छह हजार रुपए तय किए थे
बता दें कि यह विवाद छतरपुर की फैमिली कोर्ट से शुरू हुआ था। वर्ष 2018 में पत्नी ने भरण पोषण मांगा था। फैमिली कोर्ट ने उसे छह हजार रुपए देने का आदेश दिया था। यह आदेश सीआरपीसी की धारा 125 के तहत हुआ था।
पति दिल्ली में आरपीएफ कांस्टेबल बताया गया है। उसने बाद में पत्नी के कथित संबंधों का मुद्दा उठाया। पति ने कहा कि पत्नी एडल्ट्री में रह रही है। इसी वजह से उसने भरण पोषण का विरोध किया।
गुप्त कॉल रिकॉर्डिंग पर फैमिली कोर्ट ने लगाई रोक
पति ने अदालत में सीडी और ट्रांसक्रिप्ट पेश किए थे। फैमिली कोर्ट ने पहले इन्हें पेश करने की अनुमति दी। बाद में कोर्ट ने निजता का सवाल उठाया। पत्नी की सहमति के बिना रिकॉर्डिंग की गई थी। इसी आधार पर कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।
फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्डिंग पर विचार नहीं करने का फैसला लिया। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद मामला जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा। यहां निजता और डिजिटल सबूत का सवाल उठा।
गुप्त रिकॉर्डिंग से सबूत खत्म नहीं होता
जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की पीठ ने मामले की सुनवाई की। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए। कोर्ट ने डिजिटल सबूतों की जांच जरूरी बताई। केवल गुप्त रिकॉर्डिंग होने से सबूत खारिज नहीं होगा।
कोर्ट ने निजता को पूर्ण अधिकार मानने से इनकार किया। वैवाहिक मुकदमे में प्रासंगिक सबूत देखे जा सकते हैं। कोर्ट को मामले की सच्चाई तक पहुंचना जरूरी है। इसके लिए जरूरी डिजिटल सामग्री की जांच हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने कई सुप्रीम कोर्ट फैसलों का उल्लेख किया। इनमें विभोर गर्ग बनाम नेहा मामला शामिल है। हिमांशु चौरसिया मामले का भी उल्लेख हुआ। इन फैसलों में गुप्त रिकॉर्डिंग पर चर्चा हुई है।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्डिंग छिपकर हुई है। यह अकेला कारण उसे खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पहले उसकी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता देखनी होगी। इसके बाद ही उसके असर पर फैसला होगा।
एडल्ट्री का आरोप लगा, लेकिन साबित नहीं माना गया
इस फैसले का एक पहलू समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने पत्नी को एडल्ट्री का दोषी नहीं माना। पत्नी पर यह आरोप पति ने लगाया है। रिकॉर्डिंग भी उसी आरोप के समर्थन में पेश हुई। अब उसकी जांच फैमिली कोर्ट करेगा।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि एडल्ट्री साबित हो गई। हाईकोर्ट ने केवल सबूत की जांच का रास्ता खोला है। आरोप सही हैं या नहीं, यह बाद में तय होगा। अंतिम फैसला फैमिली कोर्ट की सुनवाई के बाद आएगा।
सीडी और बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट की होगी जांच
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का संबंधित आदेश रद्द कर दिया। अब सीडी और ट्रांसक्रिप्ट को जांचना होगा। फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों की दलील भी सुनेगा। रिकॉर्डिंग की सच्चाई भी जांच का विषय होगी।
कोर्ट यह भी देखेगा कि बातचीत मामले से जुड़ी है। रिकॉर्डिंग आरोपों को कितना साबित करती है। इसकी विश्वसनीयता कितनी है, यह भी देखा जाएगा। इसके बाद भरण पोषण पर आगे फैसला होगा।
छह हजार रुपए का भुगतान फिलहाल बंद नहीं होगा
बता दें कि हाईकोर्ट ने पुराने भरण पोषण आदेश को खत्म नहीं किया है। पति को छह हजार रुपए हर महीने देने होंगे। यह भुगतान नए फैसले तक जारी रहेगा। फैमिली कोर्ट को मामले पर फिर सुनवाई करनी होगी।
दोनों पक्षों को 16 सितंबर 2026 को पेश होना है। इसी दिन आगे की कार्रवाई की जाएगी। सीडी और ट्रांसक्रिप्ट पर भी सुनवाई आगे बढ़ेगी।
इस फैसले से वैवाहिक मामलों में क्या बदलेगा
यह मामला डिजिटल सबूतों की बढ़ती भूमिका दिखाता है। वैवाहिक विवादों में मोबाइल रिकॉर्डिंग सामने आ सकती है। इनके साथ निजता का सवाल भी जुड़ा रहता है। अदालतों को दोनों पहलुओं पर ध्यान देना होगा।
इस फैसले से एक बात साफ होती है। गुप्त रिकॉर्डिंग को सिर्फ इसी आधार पर हटाया नहीं जा सकता। लेकिन हर रिकॉर्डिंग सही सबूत भी नहीं मानी जाएगी। उसकी जांच और विश्वसनीयता तय करना जरूरी होगा।
एडल्ट्री आरोपों वाले मामलों में यह बात अहम है
एडल्ट्री के आरोप वैवाहिक विवाद को गंभीर बना सकते हैं। ऐसे आरोप भरण पोषण के मामलों में भी उठ सकते हैं। इस मामले में पति ने यही दलील दी थी। उसने रिकॉर्डिंग को अपने आरोपों का आधार बनाया।
वहीं आरोप और साबित तथ्य अलग चीजें हैं। कोर्ट ने अभी एडल्ट्री पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। सिर्फ रिकॉर्डिंग की जांच का आदेश दिया गया है। इसलिए अंतिम नतीजे का इंतजार करना जरूरी है।
निजता और न्याय के बीच हाईकोर्ट ने बनाया संतुलन
मामले में सबसे बड़ा सवाल निजता का था। पत्नी की जानकारी के बिना बातचीत रिकॉर्ड की गई थी। फैमिली कोर्ट ने इसे निजता से जोड़ा था। हाईकोर्ट ने सबूतों की जांच जरूरी मानी।
इस फैसले में डिजिटल दौर की नई चुनौती दिखती है। मोबाइल बातचीत अब अदालतों में सबूत बन सकती है लेकिन उसके इस्तेमाल पर कानूनी जांच जरूरी रहेगी।
अब फैमिली कोर्ट के फैसले पर रहेगी नजर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामला फिर फैमिली कोर्ट जाएगा। वहां सीडी और ट्रांसक्रिप्ट की जांच होगी। दोनों पक्ष अपनी बात रखने का मौका पाएंगे। इसके बाद नया फैसला सामने आएगा।
फिलहाल पति को छह हजार रुपए देना जारी रखना होगा। पत्नी पर लगे एडल्ट्री आरोप अभी अंतिम रूप से साबित नहीं हैं। मामले का अगला अहम पड़ाव 16 सितंबर है। उसी दिन फैमिली कोर्ट में दोनों पक्ष उपस्थित होंगे।
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