चीनी सैनिक की भारतीय संतानें अब पहचान के लिए परेशान, नहीं बन रहा जाति प्रमाणपत्र
चीनी सैनिक वांग ची 1962 के युद्ध में भटककर भारत आ गए थे। उन्हें युद्धबंदी बनाकर सात साल जेल में रखा गया। रिहाई के बाद वे मध्य प्रदेश के तिरोड़ी गांव में बस गए। उन्होंने स्थानीय महिला सुशीला से शादी की और परिवार बसाया। अब उनके पोते-पोती को जाति प्रमाण पत्र न मिलने से परेशानी हो रही है।
युद्ध में फंसे वांग ची
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वांग ची रास्ता भटक गए थे। वे भटकते हुए भारतीय सीमा में दाखिल हो गए। रेडक्रॉस की टीम ने उन्हें अरुणाचल प्रदेश के तवांग में पकड़ लिया।
इसके बाद उन्हें युद्धबंदी घोषित कर दिया गया। सात साल तक वे चंडीगढ़, भोपाल और बालाघाट की जेलों में रहे। 1969 में कोर्ट ने शर्त के साथ रिहाई दी। शर्त थी कि उन्हें चीन वापस नहीं भेजा जाएगा।
तिरोड़ी में नई जिंदगी
रिहाई के बाद सरकार ने वांग ची को तिरोड़ी में रहने की अनुमति दी। यह बालाघाट से करीब 80 किलोमीटर दूर है। यहां सेठ इंदरचंद जैन ने उन्हें अपनी आटा चक्की में नौकरी दी।
वांग ची हिंदी नहीं जानते थे। लेकिन उनके व्यवहार ने गांव वालों का दिल जीत लिया। गांव वालों ने ही उनकी शादी सुशीला से करा दी। सुशीला ओबीसी (OBC – Other Backward Class) समाज से थीं।
शुरुआती वर्षों में उन्हें स्थानीय पुलिस ने खूब परेशान किया। कई बार उनके साथ मारपीट भी हुई। पुलिस उन्हें चीन का जासूस बताती थी। वांग बताते हैं कि पैसे न देने पर पिटाई होती थी।
वांग ची और सुशीला के चार बच्चे हुए। सभी के सरनेम में वांग जोड़ा गया। सेठ जैन ने उन्हें नया नाम भी दिया, राज बहादुर।
तीसरी पीढ़ी की मुश्किल
वांग ची के बेटे विष्णु साइंस ग्रेजुएट हैं। उनके सभी दस्तावेज मां की जाति पर बने थे। लेकिन अब उनके बच्चों का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहा।
नियम कहता है कि जाति पिता के दस्तावेजों से तय होगी। विष्णु का सवाल है कि उनका जन्म भी भारत में हुआ। फिर उनके बच्चों के दस्तावेज क्यों अटके हैं।
बेटी कनक नौवीं कक्षा में है। उसे सांदीपनि विद्यालय में प्रवेश के लिए जाति प्रमाण पत्र चाहिए। परिवार ने सीएम (CM – Chief Minister) हेल्पलाइन पर शिकायत भी दर्ज कराई है।
बेटा प्रणीत दूसरी कक्षा में पढ़ता है। उसे अभी समस्या की गंभीरता समझ नहीं आती। लेकिन कनक को अपने भविष्य की चिंता सता रही है।
पीएम को लिखे पत्र
वांग ची पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई को पत्र लिख चुके हैं। 1984 में उन्होंने राष्ट्रपति को भी पत्र भेजा था। पत्र में उन्होंने वोट देने की बात लिखी थी।
उन्होंने लिखा था कि उन्हें अब तक नागरिकता नहीं मिली। उन्होंने मानवीय आधार पर मदद की गुहार लगाई थी। वर्षों तक उन्हें 100 रुपए महीने पेंशन भी मिलती रही। शादी के बाद यह पेंशन बंद हो गई।
वांग की जिंदगी में दुख भी कम नहीं रहे। 2017 में सही इलाज न मिलने से पत्नी सुशीला का निधन हुआ। मिरगी से पीड़ित छोटे बेटे श्याम की भी मौत हो गई। वांग कहते हैं कि आज भी दोनों की याद सताती है।
चीन की यादगार यात्रा
2017 में वांग ची को पहली बार चीन जाने की अनुमति मिली। 55 साल बाद वे अपने वतन पहुंचे थे। पूरा परिवार करीब दो महीने वहां रहा।
चीन में उनका स्वागत किसी सेलिब्रिटी जैसा हुआ। एयरपोर्ट से गांव तक मीडिया उनके साथ रही। लेकिन वहां पता चला कि उनकी मां का निधन हो चुका है। समाधि पर वे दो घंटे तक रोते रहे।
उसी दौरान भारत में पत्नी सुशीला की तबीयत बिगड़ गई। परिवार तुरंत भारत लौटा। इलाज के बावजूद सुशीला को बचाया नहीं जा सका। इस सदमे ने वांग ची को भीतर तक तोड़ दिया।
परिवार की दो बेटियां अनिता और आशा शादीशुदा हैं। दोनों अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रही हैं।
प्रशासन का जवाब
बालाघाट के अपर कलेक्टर जीएस धुर्वे ने मामले पर प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जाति का निर्धारण पिता के दस्तावेजों से होता है। लेकिन यह मामला युद्धबंदी से जुड़ा है, इसलिए शासन से परामर्श लिया जाएगा।
अब परिवार को उम्मीद है कि जल्द समाधान निकलेगा। कनक का एडमिशन और प्रणीत का भविष्य इसी फैसले पर टिका है।
यह खबरें भी पढ़ें...
Gen-Z को IAS-IPS-IFS अफसर देंगे सफलता का मंत्र, सरकार ने की पहल
ब्रिटिश सरकार सीहोर के सेठ को लौटाएगी कर्ज, नोटिस के बाद मांगे डॉक्यूमेंट
कच्चा दूध और अधपका मांस खाने से फैल रहा ब्रुसेला, केकड़ी में बच्चे हुए संक्रमित
क्या सच में कुबेरेश्वर धाम की पावन माटी में छिपा है बीमारियों का इलाज? जानें रहस्य