सीएम स्वेच्छानुदान में फर्जीवाड़ा, गरीबों के इलाज का पैसा डकार गए अस्पताल
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में सीएम स्वेच्छानुदान योजना में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है।
- भोपाल-सीहोर के कई अस्पतालों पर फर्जीवाड़े का शक है।
- जांच में 18 मोबाइल नंबर मिले, जिनसे कई बार अलग-अलग नाम से आवेदन हुए।
- साल 2023 से अब तक इस योजना से 741 करोड़ रुपए बांटे जा चुके हैं।
- सरकार अब सभी पोर्टल जोड़कर फर्जी आवेदन रोकने की तैयारी में है।
बता दें कि गरीब मरीजों के इलाज के लिए हर साल 300 करोड़ रुपए का बजट रखा जाता है। यह पैसा सीएम स्वेच्छानुदान के नाम से जाना जाता है। इसी योजना में अब बड़ी सेंध लगने का शक है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भोपाल और सीहोर के 10 से ज्यादा अस्पतालों की भूमिका जांच के दायरे में है। इन अस्पतालों पर बिना बीमारी के ही मरीजों के फर्जी केस बनाने का शक है। इसके जरिए स्वेच्छानुदान की राशि निकलवाई गई।
मोबाइल नंबर से गड़बड़ी का खुलासा
बताया जा रहा है कि जांच में 18 ऐसे मोबाइल नंबर मिले हैं, जिनका इस्तेमाल अलग-अलग नाम के मरीजों के आवेदन में हुआ। कुछ नंबरों से तो 17 से 18 बार अलग-अलग मरीजों के नाम पर आवेदन किया गया। इससे साफ है कि एक ही व्यक्ति या गिरोह कई फर्जी केस बना रहा था।
अब संदिग्ध अस्पतालों की अलग से जांच शुरू हो चुकी है। जरूरत पड़ने पर इन्हें ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है। साथ ही सभी संदिग्ध मोबाइल नंबरों को ट्रेस किया जा रहा है।
741 करोड़ की मदद, कहां कितनी गड़बड़ी
यह गड़बड़ी तब सामने आई, जब स्वेच्छानुदान का बजट 200 करोड़ से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपए किया गया। इसके साथ ही मंजूरी की प्रक्रिया को आयुष्मान भारत, समग्र आईडी और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम – National Health Mission) के पोर्टल से जोड़ा गया।
वहीं डेटा मिलान के दौरान एक ही नंबर से बार-बार आवेदन आने की बात सामने आई। इसी के बाद पूरी जांच शुरू हुई। सीएम सचिवालय ने अभी अस्पतालों और मोबाइल नंबरों के नाम उजागर नहीं किए हैं ताकि जांच प्रभावित न हो।
बता दें कि 2023-24 से लेकर अब तक इस योजना में कुल दो लाख 6 हजार 511 आवेदन आए। इनमें से एक लाख 22 हजार 106 आवेदन मंजूर हुए।
अब तक कुल 741.14 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक संदिग्ध भुगतान की रकम भी करोड़ों में हो सकती है।
नए नियम, फिर भी चुनौती बरकरार
गड़बड़ी रोकने के लिए सरकार ने नए नियम लागू किए हैं। अब मेडिकल एस्टिमेट, मेडिकल रिकॉर्ड, आधार और समग्र आईडी के बिना कोई आवेदन मंजूर नहीं होगा।
साथ ही मंत्री, विधायक या सांसद का अनुशंसा पत्र भी अनिवार्य कर दिया गया है। आवेदन निरस्त होने पर मरीज, अस्पताल और जनप्रतिनिधि को एसएमएस और ईमेल से सूचना दी जाएगी।
इतने नियमों के बावजूद जांच टीम के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। रोजाना करीब 200 मामलों का फोन पर सत्यापन करना पड़ रहा है।
हर केस की जांच में औसतन 5 से 10 मिनट लग रहे हैं। सामान्य बीमारी के मामलों में भी फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड और भ्रामक जानकारी मिल रही है।
कई मामलों में ऑपरेशन दिखाकर मरीज को बिना ऑपरेशन ही डिस्चार्ज करने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं।
मकसूदनगढ़ के मामले ने खोली पोल
जांच के दौरान मकसूदनगढ़ के एक सिटी अस्पताल का मामला सामने आया। अस्पताल ने एक मरीज को भर्ती दिखाकर आवेदन कर दिया, जबकि वह भर्ती था ही नहीं।
इसके अलावा एक अन्य मामले में नर्सिंग होम ने मरीज को सिर्फ कैनुला लगाकर बेड पर लिटाया और फोटो भेज दी। सीएम कार्यालय की पूछताछ में यह फर्जीवाड़ा पकड़ में आया।
अब आगे क्या, समाधान की तैयारी
सरकार अब स्वेच्छानुदान पोर्टल को आयुष्मान कार्ड, समग्र आईडी और एनएचएम से पूरी तरह जोड़ने जा रही है। जो मरीज पहले से आयुष्मान योजना में कवर हैं, उन्हें स्वेच्छानुदान नहीं दिया जाएगा। एक ही मोबाइल नंबर या व्यक्ति के बार-बार आवेदन अब आसानी से पकड़े जा सकेंगे।
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