कलेक्ट्रेट पर ताला लगने का डर, फिर भी 15 कार्य दिवस की होशियारी! एक अपर कलेक्टर, दो SDM मनुहार में जुटे, ऐसे सुलझा मामला

Neel Tiwari | Nov 04, 2026, 21:16 IST
जबलपुर कलेक्ट्रेट पर कुर्की का संकट, ताला लगने की नौबत
Attachment crisis at Jabalpur Collectorate, threat of lockout
जबलपुर कलेक्ट्रेट में बुधवार को सिर्फ कुर्की की कार्रवाई नहीं चल रही थी। यहां भुगतान की समयसीमा को लेकर भी खूब दांव-पेच चल रहे थे। एक तरफ अधिवक्ता और कोर्ट के नाजिर आदेश का पालन कराने पर अड़े थे। दूसरी तरफ प्रशासनिक अधिकारी किसी तरह मामला टालने की कोशिश कर रहे थे। हालात ऐसे बने कि एक अपर कलेक्टर और दो एसडीएम अधिवक्ताओं को मनाते रहे।

कभी बातचीत हुई, कभी आश्वासन दिए गए तो कभी कागजों में संशोधन की कवायद चली। लेकिन अधिवक्ता इस बार केवल मौखिक भरोसे पर लौटने को तैयार नहीं थे।



मौखिक वादा 15 दिन का, कागज पर बन गए 15 कार्य दिवस

इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन की सबसे दिलचस्प होशियारी लिखित आश्वासन देते समय सामने आई। अधिकारियों ने पहले कहा कि 15 दिन के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा। अधिवक्ताओं ने इस आश्वासन को लिखित में देने की मांग की। लेकिन आदेश तैयार होकर आया तो उसमें 15 दिन की जगह 15 कार्य दिवस लिखे थे। यानी मौखिक आश्वासन और सरकारी कागज की भाषा में अंतर था।



दीपावली की छुट्टियों का कैलेंडर देखते ही अधिवक्ताओं को शब्दों का खेल समझ आ गया। छुट्टियां जोड़ने पर 15 कार्य दिवस की अवधि करीब 30 दिन या अधिक हो रही थी। यानी प्रशासन को भुगतान के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता। अधिवक्ताओं ने इस बदलाव को पकड़ लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें 15 दिन का वादा चाहिए, 15 कार्य दिवस का नहीं।



समय बढ़ाने की कोशिश पर वकीलों ने फेरा पानी

प्रशासन की कोशिश थी कि लिखित आश्वासन भी मिले और भुगतान के लिए अतिरिक्त समय भी। लेकिन अधिवक्ताओं ने इस बार सरकारी कागज की भाषा को ही मुद्दा बना दिया। उनका सवाल था कि भुगतान 15 दिन में करना है तो कार्य दिवस क्यों जोड़े गए? आखिर छुट्टियों का फायदा उठाकर भुगतान की समयसीमा बढ़ाने का क्या मतलब है? इस मुद्दे पर काफी देर तक बातचीत चलती रही। एक अपर कलेक्टर और दो एसडीएम लगातार अधिवक्ताओं की मनुहार करते रहे। लेकिन अधिवक्ताओं ने आदेश में बदलाव किए बिना कुर्की की कार्रवाई रोकने से इनकार कर दिया।



ताला नहीं लगा तो कोर्ट को बताऊंगा दबाव में रोकी कार्रवाई

इस बीच कोर्ट से आए नाजिर ने भी प्रशासन के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। उन्होंने कहा कि अधिकारियों के दबाव में कुर्की नहीं हुई तो अदालत को जानकारी देंगे। यानी कार्रवाई नहीं होने पर कोर्ट में प्रशासनिक दबाव की रिपोर्ट पेश की जाती। इससे अधिकारियों की मुश्किलें और बढ़ गईं। अब उनके सामने दो ही रास्ते बचे थे। या तो कुर्की की कार्रवाई होने दें या अदालत में जवाब देने की तैयारी करें।



दफ्तर के सामान तक पहुंची तैयारी

अधिवक्ताओं ने कुर्की की कार्रवाई के लिए पूरी तैयारी कर रखी थी। कलेक्टर को आवंटित सरकारी गाड़ी की चाबी लेने तक की बात सामने आ गई थी। कलेक्टर न्यायालय के सामान की सूची बनाने की भी तैयारी थी। कार्यालय और कलेक्टर न्यायालय में ताला लगाने की नौबत बन रही थी। जिस कलेक्ट्रेट से रोज सरकारी आदेश जारी होते हैं, उसी पर ताला लग सकता था। वह भी अदालत के आदेश का पालन कराने के लिए। इस स्थिति ने प्रशासन को समझा दिया कि अब केवल बातचीत से काम नहीं चलेगा। लिखित आश्वासन में बदलाव करना ही होगा।



आखिरकार बदला आदेश, 15 दिन में भुगतान का लिखित वादा

लंबी खींचतान और अधिकारियों की मनुहार के बाद प्रशासन को आखिरकार पीछे हटना पड़ा। प्रशासन ने लिखित आश्वासन से 15 कार्य दिवस वाली शर्त हटा दी। इसकी जगह 15 दिनों के भीतर भुगतान करने की बात दर्ज की गई। इसके बाद अधिवक्ताओं ने कुर्की की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई। कलेक्टर कार्यालय पर ताला लगाने की नौबत भी टल गई। इस तरह पूरा मामला 15 दिन के लिखित भुगतान आश्वासन पर सुलझ गया। हालांकि, अब प्रशासन के सामने अपना वादा निभाने की चुनौती है। क्योंकि इस बार मामला केवल मौखिक भरोसे का नहीं है। अदालत के आदेश का पालन भी सुनिश्चित करना है।



आखिर क्यों पहुंची थी कलेक्ट्रेट की कुर्की की नौबत?

दरअसल, यह मामला 7 अक्टूबर 2019 को कुंडम में हुए सड़क हादसे से जुड़ा है। एसडीएम कार्यालय की बोलेरो की टक्कर से नवाब खान की मौत हो गई थी। उनकी पत्नी नूरजहां, बेटे शब्बीर और बेटी मुस्कान ने अदालत में मुआवजे का दावा किया। तीसवें अपर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 25 फरवरी 2025 को फैसला सुनाया। इसमें परिवार को 12 लाख 93 हजार रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया गया। साथ ही आवेदन की तारीख से सात प्रतिशत सालाना ब्याज देने के निर्देश दिए गए। समय पर भुगतान नहीं होने से ब्याज और खर्च की राशि बढ़ती गई। इसके बाद कुल बकाया राशि 18 लाख 3 हजार 262 रुपए हो गई। अदालत ने कलेक्टर कार्यालय की चल-अचल संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया। इसी आदेश का पालन कराने अधिवक्ता सीपी सिंह, प्रमोद विश्वकर्मा और आत्माराम लखेरा पहुंचे थे। उनके साथ कोर्ट के नाजिर भी कलेक्ट्रेट पहुंचे थे।



अब अधारताल के एक और 18 लाख के मामले की चर्चा

कलेक्ट्रेट में कुर्की की कार्रवाई टलने के बाद एक अन्य मामला चर्चा में आ गया है। यह मामला अधारताल से जुड़ा बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, नामदेव उपनाम वाले एक व्यक्ति का करीब 18 लाख रुपए का भुगतान अटका है। यह भुगतान लंबे समय से लंबित बताया जा रहा है। चर्चा है कि वित्त विभाग और रेडक्रॉस के बीच भुगतान की फाइल अटकी हुई है। फाइल आगे बढ़ाने में अड़चन आने की बात भी सामने आ रही है। समय रहते निराकरण नहीं हुआ तो कलेक्ट्रेट में फिर ऐसी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, इस मामले की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।



अब 15 दिन का वादा पूरा करना प्रशासन की असली परीक्षा

बुधवार को कलेक्ट्रेट पर ताला नहीं लगा। अधिकारी भी राहत की सांस लेकर अपने कार्यालयों में लौट गए। लेकिन पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए। आखिर पीड़ित परिवार को भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा? इसके बाद कुर्की वारंट लेकर कलेक्ट्रेट तक क्यों पहुंचना पड़ा? भुगतान के लिए छुट्टियों और कार्य दिवसों का गणित क्यों लगाया गया? अब प्रशासन ने 15 दिन के भीतर भुगतान करने का लिखित आश्वासन दिया है। देखना होगा कि इस बार भुगतान की फाइल वास्तव में आगे बढ़ती है या नहीं। या फिर वकील दोबारा कलेक्ट्रेट पर ताला लगाने की तैयारी के साथ पहुंचेंगे।

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