एमपी, सीजी और राजस्थान की सरकारी योजनाओं पर साइबर अटैक, विदेश में बिक रहा डेटा
देश के सरकारी पोर्टल्स पर बड़ा साइबर खतरा मंडरा रहा है। हैकर्स सरकारी योजनाओं का डेटा चुराकर डार्क-वेब पर बेच रहे हैं। इसमें आम नागरिकों और लाभार्थियों की निजी जानकारी शामिल है।
एक मीडिया संस्थान की पड़ताल में यह खुलासा हुआ है। इसमें सामने आया कि भारतीय नागरिकों का डेटा रूस के साइबर बाजारों में खुलेआम बिक रहा है। यह कारोबार डार्क-वेब के जरिए चल रहा है।
सिर्फ 930 रुपए में डेटा
जानकारी के अनुसार सरकारी पोर्टल्स के लॉगिन आईडी और पासवर्ड की कीमत बेहद कम रखी गई है। एक अकाउंट सिर्फ 10 डॉलर, यानी लगभग 930 रुपए में बिक रहा है। डार्क-वेब पर बिग ब्रदर नाम के एक पेज पर यह डेटा उपलब्ध बताया जा रहा है।
इस पेज पर देश के 17 अहम सरकारी विभागों का डेटा बिक्री के लिए रखा गया है। इनमें छत्तीसगढ़, केरल और बिहार के विभाग शामिल हैं। महाराष्ट्र वन विभाग, कोल इंडिया और राष्ट्रीय आयुष मिशन का डेटा भी इसमें है।
पड़ताल में एक और बड़ी बात सामने आई है। देश में हो रहे म्यूल अकाउंट और फर्जी पहचान के मामलों के पीछे यही चोरी का डेटा है। अपराधी इसी डेटा से फर्जी बैंक खाते खोल रहे हैं।
डार्क-वेब पर कैसे बिकता है डेटा
हैकर चोरी किए गए यूजर अकाउंट और पासवर्ड डार्क-वेब के बाजार में डाल देते हैं। इसके लिए वे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग चैनल और साइबर अपराध से जुड़े मंचों का इस्तेमाल करते हैं।
पैसा देकर डेटा खरीदने वाले हैकर इन लॉगिन जानकारियों से पोर्टल में घुसने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वे संवेदनशील जानकारी देख सकते हैं। वे रिकॉर्ड बदल सकते हैं या वित्तीय धोखाधड़ी कर सकते हैं।
अगर चोरी किया गया अकाउंट एडमिन का है, तो खतरा और बढ़ जाता है। हैकर नए फर्जी यूजर बना सकते हैं। वे सुरक्षा व्यवस्था कमजोर कर सकते हैं और बड़ी मात्रा में डेटा डाउनलोड कर सकते हैं।
तीन राज्य सुरक्षा में पिछड़े
केंद्र सरकार के दिशानिर्देश साफ हैंजिन विभागों में आधार-आधारित योजनाएं चलती हैं, वहां फ्रॉड प्रोटेक्शन और फ्रॉड एनालिटिक्स तंत्र लगाना जरूरी है। डेटाबेस एक्टिविटी मॉनिटरिंग टूल भी लगाना अनिवार्य है, ताकि चोरी होते ही अलर्ट मिल सके।
हकीकत इससे अलग है। रिजर्व बैंक (RBI – Reserve Bank of India) के निर्देश पर बैंकों ने डार्कवेब मॉनिटरिंग सिस्टम लगा लिया है। लेकिन राजस्थान को छोड़कर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार ने अब तक अपने डेटा सेंटर्स में यह सुरक्षा तंत्र नहीं लगाया है।
साइबर अटैक कैसे होता है
पूरी प्रक्रिया पांच चरणों में होती है। सबसे पहले हैकर उन कर्मचारियों को चुनते हैं, जिनके पास एडमिन या सुपर-यूजर अधिकार होते हैं। इनमें सिंगल साइन-ऑन एक्सेस रखने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं।
इसके बाद कर्मचारियों को फर्जी संदेश भेजे जाते हैं। ये विभागीय आदेश, सैलरी स्लिप या टेंडर के नाम पर भेजे जाते हैं। इनमें जुड़ी पीडीएफ या वर्ड फाइल में वायरस छिपा होता है।
फाइल खुलते ही वायरस सक्रिय हो जाता है। यह ब्राउजर में सेव पासवर्ड, सेशन कुकीज और स्क्रीनशॉट्स जुटा लेता है। इसके बाद हैकर्स असली यूजर बनकर पोर्टल में लॉगिन कर लेते हैं।
अंतिम चरण में यह पूरा डेटा एन्क्रिप्टेड माध्यम से डार्क-वेब के सर्वर पर भेजा जाता है। वहीं से इसकी खरीद-बिक्री शुरू होती है।
मध्य प्रदेश- पोर्टल साइबर खतरे की चपेट में
बताया जा रहा है कि मध्यप्रदेश राजस्व विभाग का सारा (saara.mp.gov.in) पोर्टल बड़े साइबर खतरे की चपेट में आ गया है।
दावा किया जा रहा है कि पोर्टल में गंभीर सुरक्षा खामियां मिली हैं। विभाग के 936 अहम अकाउंट और 14 लाख से ज्यादा रिकॉर्ड हैकर्स के हाथ लग गए हैं, जिन्हें साल 2025 से बेचा जा रहा है।
इतना ही नहीं, पब्लिक Git पर 16 API Keys और 50 सिक्योरिटी टोकन भी खुले में मिले हैं। इनका इस्तेमाल करके कोई भी बाहरी व्यक्ति सिस्टम में अस्थायी या स्थायी तौर पर घुसपैठ कर सकता है।
छत्तीसगढ़- महतारी वंदन योजना का डेटा लीक
छत्तीसगढ़ की महतारी वंदन योजना में भी बड़ा डेटा लीक सामने आया है। महिलाओं को आर्थिक मदद देने वाली इस योजना की वेबसाइट से अप्रैल-मई तक का लाभार्थियों का डेटा चोरी होने का दावा किया जा रहा है। यह डेटा रूस से जुड़े डार्क वेब मार्केट में बेचा जा रहा है।
शुरुआती जांच में 372 महिलाओं का डेटा डार्क वेब के अलग-अलग ग्रुप्स में 10 डॉलर प्रति रिकॉर्ड की कीमत पर बिकता मिला है। मामले के सामने आने के बाद डेटा सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
राजस्थान- खतरे में जन आधार पोर्टल
राजस्थान सरकार के SSO और जन आधार पोर्टल से जुड़ी बड़ी साइबर सुरक्षा चिंता सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि करीब 1.74 लाख एक लाख 74 हजा 491 लाभार्थियों के खातों का डेटा डार्क वेब पर बेचा जा रहा है।
बताया जा रहा है कि जून 2026 में इन पोर्टलों के तीन एडमिन अकाउंट भी डार्क वेब फोरम पर सामने आए थे।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर SSO ID से समझौता हो जाता है, तो उसी एक आईडी के जरिए कई सरकारी सेवाओं और योजनाओं से जुड़ी जानकारी तक पहुंच बनाई जा सकती है। यानी एक ही लॉगिन से जुड़े कई खातों और सेवाओं का डेटा जोखिम में पड़ सकता है।
फर्जी आईडी और वित्तीय धोखाधड़ी
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि अपराधी इसी चोरी के डेटा से फर्जी आईडी बनाते हैं। इसका इस्तेमाल म्यूल अकाउंट खोलने और वित्तीय धोखाधड़ी में किया जाता है।
अगर हैकर्स के हाथ एडमिन अकाउंट लग जाए, तो नुकसान और बड़ा हो सकता है। वे सीधे लाभार्थियों की सरकारी सहायता किसी और फर्जी खाते में भेज सकते हैं।
नवंबर 2027 से सख्त कानून
नवंबर 2027 से देश में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट लागू होगा। इसके बाद सरकारी विभाग से डेटा लीक होने पर संबंधित विभाग पर एक करोड़ रुपए तक जुर्माना लग सकेगा। यह कानून विभागों की जवाबदेही तय करने में मददगार साबित हो सकता है।
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