दतिया उपचुनाव में उम्मीदवार नहीं, सत्ता-संगठन और भीतरघात की असली परीक्षा कल!
समझें क्या है पूरा मामला
- गुरुवार को दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए मतदान।
- चुनाव को भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रतिष्ठा का सवाल बनाया।
- सत्ता की ताकत बनाम सत्ता विरोधी माहौल की सीधी राजनीतिक लड़ाई।
- टिकट वितरण के बाद दोनों दलों में असंतोष की चर्चाएं।
- भीतरघात की आशंकाओं पर पूरे चुनाव में बनी रही नजर।
उपचुनाव अब अंतिम मोड़ पर
दतिया विधानसभा उपचुनाव अब अंतिम मोड़ पर पहुंच चुका है। गुरुवार को मतदान होगा। लेकिन सियासी गलियारों में असली चर्चा वोटिंग से ज्यादा उस अदृश्य लड़ाई की है, जो पिछले कई दिनों से पर्दे के पीछे चल रही है। इस चुनाव में मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं है। सत्ता का प्रभाव, स्थानीय नाराजगी, संगठन की ताकत और भीतरघात की आशंकाएं भी अहम भूमिका निभा रही हैं।
सरकार और संगठन की साख का चुनाव
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार मुकाबले को केवल उम्मीदवारों के नाम से नहीं समझा जा सकता। भाजपा के लिए यह अपनी सरकार और संगठन की साख बचाने का चुनाव है, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता के खिलाफ जनमत में बदलने की कोशिश कर रही है। इसी वजह से दतिया का उपचुनाव प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल हो गया है।
क्या यह सिर्फ उम्मीदवारों का चुनाव है?
चुनावी चर्चा का बड़ा हिस्सा इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमता रहा कि क्या मुकाबला वास्तव में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी और कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह। के बीच है, या फिर यह भाजपा के संगठन, पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक पकड़ और कांग्रेस की स्थानीय रणनीति की सीधी परीक्षा बन चुका है। मतदान के बाद इसका जवाब ईवीएम से मिलेगा।
भीतरघात बनेगा सबसे बड़ा फैक्टर?
चुनाव प्रचार के दौरान दोनों प्रमुख दलों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष की चर्चाएं लगातार सामने आती रहीं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी बना हुआ है कि क्या कुछ नाराज कार्यकर्ता मतदान के दिन पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगे या उनकी खामोशी किसी प्रत्याशी का गणित बिगाड़ सकती है। कई चुनावों में ऐसे हालात परिणाम बदल चुके हैं और दतिया में भी इसी संभावना पर नजर है।
भाजपा का भरोसा सरकार और संगठन
भाजपा ने पूरे प्रचार अभियान में डबल इंजन सरकार, विकास कार्य, सड़क, बिजली, पानी, महिला हितैषी योजनाओं और मजबूत संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रचार की कमान संभाली। पार्टी का संदेश साफ रहा कि विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए भाजपा को समर्थन दिया जाए।
कांग्रेस का दांव-स्थानीय मुद्दे और सत्ता विरोधी माहौल
कांग्रेस ने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के कथित दुरुपयोग जैसे मुद्दों को चुनाव के केंद्र में रखा। पार्टी ने इसे स्थानीय जनता की आवाज बनाम सत्ता की ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई नेताओं ने लगातार जनसभाएं कीं।
तीसरा कोण कितना असर डालेगा?
इस चुनाव में आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव भी मैदान में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उनकी मौजूदगी कुछ सामाजिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा। इसलिए मुकाबले को पूरी तरह एकतरफा मानना जल्दबाजी होगी।
जातीय और स्थानीय समीकरण भी अहम
दतिया का चुनावी गणित हमेशा बहुस्तरीय रहा है। यहां ब्राह्मण, अहिरवार-जाटव, कुशवाहा-काछी, यादव, लोधी सहित कई समाजों के वोट निर्णायक माने जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एक-दो प्रतिशत वोटों का झुकाव भी परिणाम बदल सकता है। इसलिए हर दल ने अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में पूरी ताकत लगाई है।
अब फैसला 2.20 लाख मतदाताओं के हाथ
दतिया विधानसभा क्षेत्र में कुल 2 लाख 20 हजार 344 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें 1 लाख 16 हजार 88 पुरुष, 1 लाख 4 हजार 246 महिला और 10 अन्य मतदाता शामिल हैं। इसके अलावा 1,372 दिव्यांग, 1,237 वरिष्ठ मतदाता (80 वर्ष से अधिक) और 443 सर्विस वोटर भी चुनावी तस्वीर तय करने में भूमिका निभाएंगे। कुल 21 प्रत्याशी मैदान में हैं और मतगणना 3 अगस्त को होगी।
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