धार भोजशाल विवाद में आया पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और ब्रिटिश उच्चायुक्त का पत्र

Sanjay Gupta | Apr 24, 2026, 13:16 IST
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धार भोजशाला को लेकर हाईकोर्ट इंदौर में सुनवाई जारी है। इसी दौरान अब कमाल मौलाना पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने हाईकोर्ट में एक पत्र रखा है। यह पत्र 11 फरवरी 2003 का है

धार भोजशाला को लेकर चल रहे विवाद में अब एक पत्र भी सबूत के तौर पर पेश किया गया है। इस पत्र के जरिए बताने की कोशिश की गई है कि वाग्देवी प्रतिमा को लेकर जो बात चल रही है, वह भोजशाला की नहीं है।



इसके पहले भी मुस्लिम पक्ष ने दावा किया था कि यह प्रतिमा जो ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है वह भोजशाल की जगह उस परिसर के बाहर सिटी पैलेस से मिली थी। अब इसे लेकर नाया दावा किया गया है।



2003 में उच्चायायुक्त ने सीएम दिग्विजय को लिखा था पत्र

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वाग्देवी नहीं बल्कि यह प्रतिमा जैन देवी अंबिका की

पत्र में आगे लिखा गया है कि प्रतिमा को लेकर यह भ्रम 1920 के दशक में रूपम पत्रिका में प्रकाशित एक लेख से उत्पन्न हुआ है। शिलालेख के अपूर्ण पाठ के आधार पर इस लेख ने गलत तरीके से दावा किया कि वह प्रतिमा सरस्वती की है।



स्थिति 1980 के दशक में स्पष्ट हुई जब मुंबई के डॉ. किरित मनकोडी ने पूरे शिलालेख को पढ़ा और प्रकाशित किया था। पूर्ण शिलालेख में सरस्वती, एक त्रिमूर्ति और अंबिका की आकृति के निर्माण का वर्णन है।



यही अंबिका की प्रतिमा ब्रिटिश संग्रहालय में है। इसमें देवी को एक शिशु और एक शेर के साथ दिखाया गया है, जो दोनों अंबिका के प्रतीक हैं। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रिटिश संग्रहालय में मौजूद प्रतिमा जैन देवी अंबिका की है।



जैन समाज ने भी लगा रखा है दावा

इस पत्र से जैन समाज के दावे को बल मिलने की संभावना है। कारण है कि जैन समाज ने भी इस परिसर को लेकर दावा किया हुआ है। इसे लेकर उनके द्वार भी हाईकोर्ट में याचिका दायर की हुई है, जिस पर सुनवाई होना बाकी है।



मुस्लिम पक्ष का दावा, इसे तो हमने बसाया

उधर अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने तर्क दिया कि राजा भोज की 1055 में मृत्यु के बाद धार कई बार लूटा गया था। गुजरात और दक्षिण के राजाओं ने हमले किए जिससे शहर खंडर हो गया था।



जब 1305 में मुस्लिम आए तब शहर खंडर था और उन्होंने ही इसे बसाया है। धार में हुए आक्रमण धर्म से संबंधित नहीं थे यह पूरी तरह से वर्चस्व और सत्ता की लड़ाई थी। इसमें मंदिर को तोड़कर, मूर्तियां लेकर अपना वर्चस्व बताया जाता था।



याचिकाकर्ता और वकील का पक्ष

याचिकाकर्ता अब्दुल समद और उनके नूर मोहम्मद शेथ ने तर्क रखे थे। वहीं भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की ओर से एडवोकेट अविरल विकास खरे ने कोर्ट को बताया कि, वर्ष 1904 से भोजशाला परिसर संरक्षित स्मारक है। इस पर केंद्र सरकार का अधिकार है। इसलिए निजी स्वामित्व दावा संभव नहीं है।



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