भोजशाला पर फैसला और जुमे की नमाज से धार में बढ़ी सुरक्षा, 1200 पुलिस बल तैनात

Sanjay Gupta | May 15, 2026, 10:55 IST
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धार भोजशाला का फैसला आज, यानी शुक्रवार 15 मई को आने वाला है। वहीं शुक्रवार जुमे की नमाज का दिन भी होता है। ऐसे में धार जिला प्रशासन और पुलिस कानून-व्यवस्था को लेकर सतर्क हैं। सुरक्षा बढ़ा दी गई है और 1200 से ज्यादा जवान तैनात किए गए हैं।

इंदौर हाईकोर्ट आज, शुक्रवार 15 मई को धार भोजशाला मामले में अंतिम फैसला सुना रहा है। इस मामले की सुनवाई 6 अप्रैल से लगातार चल रही थी।



अब सभी याचिकाकर्ता और इंटरविनर की दलीलों को सुनने के बाद फैसला जारी किया जा रहा है। मुख्य सवाल यह है कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है, जैन मंदिर है या फिर पाठशाला।



धार भोजशाला मामले में फैसला दोपहर ढाई बजे के बाद आने की संभावना है। जस्टिस विजय शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच दोपहर डेढ़ बजे तक लिस्टेड केस की सुनवाई करेगी।



इसके बाद लंच का समय है। फिर दोपहर साढ़े तीन बजे बार एसोसिएशन की तरफ से आइसक्रीम पार्टी होती है, जो समर वैकेशन से पहले की परंपरा है। ऐसे में संभावना है कि फैसला दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे के बीच अपलोड हो सकता है।



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एसपी ने कहा प्रतिबंधात्मक धारा लगी

एसपी सचिन शर्मा ने द सूत्र को बताया कि कानून व्यवस्था पर पूरी नजर है। प्रतिबंधात्मक धारा पूर्व से ही लगी है। वहीं धार में सुबह से ही मीटिंग का दौर चल रहा है। लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाह नहीं फैलाने की अपील की गई है।



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12 लेयर में सुरक्षा

भोजशाला केस को लेकर धार में 12 लेयर में सुरक्षा व्यवस्था की गई है। साथ ही 1200 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात हैं। रिजर्व पुलिस बल और रैपिड एक्शन फोर्स भी तैयार है।



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मंदिर, मस्जिद या फिर पाठशाला

हिंदू पक्ष की ओर से इस मामले में मंदिर घोषित किए जाने की मांग की गई है। उधर मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद बताते हुए वक्फ संपत्ति के कारण अपना दावा कर रहे हैं। जैन पक्ष भी जैन मंदिर का दावा कर रहा है।



वहीं वाग्देवी की प्रतिमा को जैन धर्म की अंबिका देवी प्रतिमा कहा गया है। वहीं एक अन्य पक्ष ने कानून व्यवस्था बनाए रखने की मांग की है। मंदिर के दावे को मुस्लिम ने यह कहकर खारिज किया कि वहां कभी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई।



हिंदू पक्ष ने मस्जिद का दावा खासकर एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मस्जिद पुराने स्ट्रक्चर को तोड़कर बनाई गई थी। ऐसा लगता है कि पहले यह संस्कृत पाठशाला थी और इसके कई दस्तावेज भी रिकॉर्ड में मौजूद हैं।



हर पक्ष अपने-अपने दावे, प्रमाण और सुप्रीम कोर्ट के केस का हवाला दे रहा है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि कोर्ट इसे मंदिर घोषित करेगा, मस्जिद मानेगा या फिर पुराने पाठशाला के तौर पर मान्यता देगा।



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इन सभी अधिवक्ताओं ने रखे हैं तर्क

इस मामले में शासन की तरफ से एजी प्रशांत सिंह मौजूद हैं। हिंदू पक्ष की ओर मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल की तरफ वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन, विनय जोशी और पार्थ यादव हैं।



एएसआई की तरफ वरिष्ठ अधिवक्ता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सुनील जैन थे। मुस्लिम पक्ष की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, अजहर वारसी और नूर अहमद मौजूद थे। एक अन्य याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने दलीलें दीं। वहीं, एक और याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता एके चितले और कार्तिक चितले उपस्थित थे।



हिंदू फ्रंट की ओर से लगी थी याचिका

साल 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट रंजनाजी अग्निहोत्री एवं उनके साथियों द्वारा याचिका दायर हुई थी। उच्च न्यायालय इंदौर में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय कर हिंदू समाज के पूर्ण आधिपत्य के लिए याचिका लगाई गई थी।



इस पर हाईकोर्ट ने आदेश दिए और वहां 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे हुआ। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला गया। वहां से हाईकोर्ट को केस की सुनवाई तय समय में करने के लिए कहा गया।



इसके बाद सभी याचिकाएं लिंक करके सभी को सुना गया। इसमें जैन समाज ने भी याचिका दायर की और कहा कि यह जैन मंदिर है। वहीं मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद है।



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हिंदू पक्ष की ओर से तर्क और मांग

हिंदू समाज की मांग है कि भोजशाला में अनुच्छेद 25 के तहत पूजा का अधिकार उन्हें मिले। वहीं मुस्लिम समाज को भोजशाला परिसर में कोई भी धार्मिक गतिविधि करने की अनुमति न दी जाए।



मांग है कि केंद्र सरकार भोजशाला के लिए एक ट्रस्ट बनाए, जिससे इसका संचालन और प्रबंधन किया जा सके। ट्रस्ट को यह निर्देश दिया जाए कि मां सरस्वती की प्रतिमा की पूजा और अर्चना लगातार होती रहे। साथ ही, भोजशाला परिसर में मुस्लिम समाज द्वारा की जा रही नमाज बंद हो।



इसके अलावा, भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को रद्द किया जाए और हिंदू समाज को रोजाना पूजा करने का अधिकार मिले। साथ ही, ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाकर धार के भोजशाला में स्थापित की जाए।



मुस्लिम पक्ष का दावा

वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह मस्जिद है। साल 1935 से यह वक्फ संपत्ति है। यदि मंदिर होता तो मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होती लेकिन इसके कोई प्रमाण नहीं है।



कैरेक्टर तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। यहां पर वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है। वैज्ञानिक सर्वे में कार्बन डेटिंग का उपयोग नहीं हुआ। ऐसे में तय नहीं है कि यह परमारकालीन निर्माण है। पूरा सर्वे गलत है।



यह सिविल वाद है और कायदे से इसकी सुनवाई जिला कोर्ट में होना चाहिए। इसलिए याचिका ही मेंटेनेबल नहीं है। जो प्रतिमा वाग्देवी की बताई जा रही है, वह इस परिसर में मिली ही नहीं थी।



सोहार्द्र पूर्ण माहौल बनाए रखने की मांग

वहीं अन्य याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि फैसला जो भी आए, लेकिन ऐसा दिशा-निर्देश दिया जाए कि भोजशाला में हमेशा शांतिपूर्ण और सोहार्द्र पूर्ण माहौल बना रहे। यह हिंदू-मुस्लिम का सवाल नहीं है, बल्कि संविधान और कानून-व्यवस्था का मामला है।



इसलिए कोर्ट से कहा गया है कि ऐसे निर्देश हों कि भविष्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति पैदा न हो।



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