भोजशाला अब अयोध्या मॉडल पर होगी विकसित, फैसला राम मंदिर जैसा, माहौल बिगाड़ने पर होगी सख्ती- सीएम
मध्यप्रदेश के धार जिले की भोजशाला हिंदुओं की हो गई है। इसे मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना गया है। यह फैसला अयोध्या के राम मंदिर जैसा ही हुआ है। इसमें एएसआई (ASI) रिपोर्ट, वर्शिप एक्ट इन सभी बातों को लिया गया है। वहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि इसे अयोध्या जैसा ही विकसित करेंगे।
माहौल बिगाड़ने वाले चिह्नित, सख्ती होगी- सीएम
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि धार क्षेत्र को अयोध्या मॉडल पर विकसित किया जाएगा। कोर्ट ने भी फैसले में अयोध्या का उदाहरण दिया है। सुविधाएं विकसित करने पर रोक नहीं लगाई गई है भले ही वह एएसआई (ASI) संरक्षित स्थल है।
वहीं मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि धर्म की आड़ में उपद्रव करने वाले चिह्नित हैं, यदि माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई तो सख्ती से निपटेंगे। साथ ही मुख्यमंत्री ने कहा कि हाईकोर्ट के हर आदेश का पालन होगा और दोनों पक्षों से बात कर रास्ता निकाला जाएगा। मां वाग्देवी की प्रतिमा लंदन से लाने के लिए केंद्र से आग्रह करेंगे और राज्य सरकार प्रयास करेगी।
मस्जिद के लिए जमीन मांगेंगे तो विचार करेंगे
मुख्यमंत्री ने यह भी साफ किया कि यदि मुस्लिम पक्ष मस्जिद के लिए जमीन मांगेगा तो इस पर विचार किया जाएगा। हाईकोर्ट के आदेश में भी है कि इसके लिए आवेदन करना होगा और राज्य सरकार विचार करेगी। उधर मुस्लिम पक्ष के सुप्रीम कोर्ट जाने की खबरों के बीच हिंदू पक्ष ने दो कैविएट दायर कर दी है।
इस तरह अयोध्या जैसा भोजशाला का फैसला
दोनों ही फैसले में काफी समानता है। कई बिंदुओं को एक जैसा लिया गया है और इसी आधार पर यह फैसला हुआ है। हाईकोर्ट जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने अयोध्या फैसले का हवाला दिया है।
- एएसआई (ASI) रिपोर्ट मान्य: अयोध्या और भोजशाला दोनों ही फैसलों में एएसआई (ASI) रिपोर्ट ही अहम आधार बनी है।
- गैर-इस्लामी स्ट्रक्चर: दोनों ही जगह पाया गया कि मंदिर व पूर्व हिंदू संरचना के स्ट्रक्चर पर नया निर्माण हुआ है।
- लगातार पूजा, आस्था अहम: अयोध्या में भी लगातार पूजा के प्रमाण थे, वहीं भोजशाला में भी लगातार सरस्वती पूजा हो रही थी।
- मूर्ति नहीं होने से धार्मिक चरित्र खत्म नहीं: अयोध्या फैसले में कहा गया कि मूर्ति नहीं होने से धार्मिक चरित्र खत्म नहीं होता। वहीं भोजशाला में भले ही प्रतिमा नहीं थी लेकिन शिलालेख पर उदाहरण थे। मूर्ति लंदन में होना माना गया है।
- लंबे उपयोग से अधिकार सिद्ध नहीं: अयोध्या फैसले में माना कि भले ही लंबे समय से दूसरा पक्ष उपयोग कर रहा है लेकिन इससे अधिकार नहीं बनता है। केवल नमाज से दूसरे पक्ष के अधिकार खत्म नहीं होते हैं।
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